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श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दर्शन पर राष्ट्रीय मंथन : चंद्रकमल बेजबरुआ महाविद्यालय, टियोक में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : देशभर के विद्वानों ने महापुरुषों के दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर रखा विचार

"शंकरदेव और माधवदेव के कार्य एवं आदर्श असमिया समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं" — डॉ. जितेन हजारिका

टियोक, 29 जून : असम की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत के दो महान स्तंभ महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं महापुरुष माधवदेव के दर्शन, विचारधारा और समकालीन प्रासंगिकता पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शनिवार को चंद्रकमल बेजबरुआ महाविद्यालय, टियोक में भव्य शुभारंभ हुआ। महाविद्यालय के महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव अनुसंधान एवं अध्ययन केंद्र तथा श्रीमंत शंकरदेव संघ, जोरहाट जिला शाखा की साहित्य शाखा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय “समकालीन परिप्रेक्ष्य में श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दर्शन का समग्र मूल्यांकन” (A Deep Insight into the Philosophy of Srimanta Sankaradeva and Madhabdeva in the Present Day Context) रखा गया है।

देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, साहित्यकारों और विद्वानों की सहभागिता से आरंभ हुई इस संगोष्ठी ने असम की महान वैष्णव परंपरा तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा पर गंभीर अकादमिक विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति ने किया उद्घाटन

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. विजय कृष्ण पाचनी की अध्यक्षता में आयोजित उद्घाटन समारोह का शुभारंभ डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जितेन हजारिका ने दीप प्रज्वलित कर किया।

अपने उद्घाटन भाषण में डॉ. हजारिका ने कहा कि राष्ट्रीय संगोष्ठी जैसे शैक्षणिक आयोजन महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव के विचारों एवं आदर्शों का नए दृष्टिकोण से पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों महापुरुषों के कार्य, दर्शन और आदर्श आज भी असमिया समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं तथा वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

महापुरुषों की शिक्षाएं आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रही हैं

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव विश्वविद्यालय, नगांव के आचार्य एवं श्रीमंत शंकरदेव संघ के पदाधिकारी डॉ. भवेंद्र नाथ डेका ने कहा कि असमिया समाज का परम सौभाग्य है कि महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव जैसे संतों का मार्गदर्शन उसे प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि दोनों महापुरुषों की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षाएं आज भी समाज को सही दिशा प्रदान कर रही हैं।

देशभर के विद्वानों ने रखे अपने विचार

समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित पंजाब विश्वविद्यालय के भाषा संकाय की डीन एवं हिंदी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. योजना रावत ने कहा कि श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव की महान रचनाएं केवल असम ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि इन महापुरुषों की साहित्यिक एवं दार्शनिक धरोहर आज भी मानवता को नई दिशा देती है।

वहीं विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के असमिया विभाग की विभागाध्यक्ष एवं श्रीमंत शंकरदेव पीठ की समन्वयक डॉ. संगीता शइकिया ने अपने संबोधन में कहा कि आज असमिया भाषा जिस समृद्ध स्वरूप में विकसित हुई है, उसमें श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव का अमूल्य योगदान निहित है। उनकी साहित्यिक परंपरा ने असमिया भाषा, संस्कृति और समाज को नई पहचान प्रदान की।

कार्यक्रम में असम कृषि विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर अध्ययन निदेशक डॉ. अनुप कुमार दास तथा श्रीमंत शंकरदेव संघ के प्रधान सचिव कुशल ठाकुरिया भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

‘श्रीमंत शंकरदेव और मानवतावाद’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

उद्घाटन समारोह के दौरान महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव डॉ. रातुल चंद्र बोरा की शोधपरक पुस्तक “श्रीमंत शंकरदेव और मानवतावाद” का लोकार्पण डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जितेन हजारिका द्वारा किया गया।

इसके साथ ही संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. जयंत पाठक एवं नितुल गोगोई द्वारा संपादित शोध-पत्रों के सार-संकलन का भी औपचारिक विमोचन किया गया।

बरगीत से हुआ शुभारंभ, स्वागत भाषण ने बांधा समां

कार्यक्रम का संचालन महाविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. मयूरी चेतिया ने किया।

उद्घाटन की शुरुआत श्रीमंत शंकरदेव संघ, जोरहाट स्थित शंकरी संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य प्रशांत शइकिया के निर्देशन में प्रस्तुत सामूहिक बरगीत से हुई, जिसने पूरे सभागार को भक्तिमय वातावरण से भर दिया।

इसके पश्चात अनुसंधान केंद्र के निदेशक एवं आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. विनयव्रत राजखोवा ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा और उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला।

चार तकनीकी सत्रों में हुआ गहन अकादमिक विमर्श

उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित चार तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

इन सत्रों में महिला समानता, मानवतावाद, अहिंसा, सहिष्णुता, पर्यावरण नैतिकता, नव-वैष्णववाद, पारिवारिक नैतिक संस्कार, अर्थशास्त्र, खाद्य संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, भारतीय ज्ञान परंपरा, शंकरी साहित्य, प्रदर्शन कला, धार्मिक सुधार, अन्य धर्मों के प्रति दृष्टिकोण, माधवदेव की ‘नामघोषा’, बाल जीवन, प्रकृति, आध्यात्मिकता, नैतिकता, गुरु-भक्ति तथा दास्य-भक्ति जैसे विविध विषयों पर गहन शोधपरक चर्चा हुई।

तकनीकी सत्रों का संचालन महाविद्यालय के रेक्टर डॉ. विनयव्रत राजखोवा तथा वाणिज्य विभाग के सेवानिवृत्त सहायक प्राध्यापक डॉ. देवानंद बरुआ ने किया। संसाधन विशेषज्ञ के रूप में डॉ. संगीता शइकिया एवं डॉ. रातुल चंद्र बोरा ने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।

समापन समारोह में हुआ अनेक शिक्षाविद शामिल

रविवार को आयोजित समापन समारोह में असम महिला विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. विनोद चंद्र बोरा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं जोरहाट केंद्रीय महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. दुलेन सइकिया तथा गड़गांव महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची महंत विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखेंगे।

ISBN युक्त शोधग्रंथ का होगा प्रकाशन

संगोष्ठी की आयोजन समिति ने जानकारी दी कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत चयनित शोध-पत्रों का एक ISBN युक्त शोधग्रंथ असम के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रकाशित किया जाएगा। इस शोधग्रंथ का औपचारिक लोकार्पण आगामी 25 अगस्त को महाविद्यालय के 68वें स्थापना दिवस के अवसर पर किया जाएगा।

ध्वजारोहण के साथ हुआ आयोजन का शुभारंभ

राष्ट्रीय संगोष्ठी के औपचारिक कार्यक्रमों से पूर्व प्रातःकाल महाविद्यालय परिसर में आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. विनयव्रत राजखोवा ने ध्वजारोहण कर दो दिवसीय शैक्षणिक आयोजन का शुभारंभ किया।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के माध्यम से महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दर्शन, साहित्य, मानवतावादी दृष्टिकोण और सांस्कृतिक योगदान पर गंभीर अकादमिक विमर्श को नई गति मिली है। शिक्षाविदों का मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सहायक सिद्ध होंगे, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों और मानवीय आदर्शों से भी जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे।

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