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“मामा… हमें एक पुल चाहिए” : मासूम बच्चों की पुकार कब सुनेगी सरकार? रोज मौत को चुनौती देकर नाव से स्कूल पहुंचने को मजबूर छात्र-छात्राएं : शिवसागर के बेतबारी और बकता मौजा के बीच दिसांग नदी पर आज तक नहीं बन सका स्थायी पुल : हजारों ग्रामीणों ने लगाई विकास की गुहार

शिवसागर, 26 जून : ऊपरी असम के ऐतिहासिक शिवसागर जिले के बेतबारी मौजा और बकता मौजा के लोगों की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर चर्चा में है। यहां बहने वाली दिसांग नदी पर आज तक स्थायी पुल का निर्माण नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप हजारों ग्रामीणों को आज भी नदी पार करने के लिए हाथ से चलाई जाने वाली छोटी नाव पर निर्भर रहना पड़ता है। सबसे अधिक परेशानी स्कूली बच्चों, मरीजों, महिलाओं और बुजुर्गों को झेलनी पड़ रही है। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच यह क्षेत्र आज भी बुनियादी संपर्क सुविधा से वंचित है।

“मामा… हमें एक पुल चाहिए” : बच्चों की भावुक अपील

“मामा… हमें एक पुल चाहिए।” यह शब्द केवल मासूम बच्चों की इच्छा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की पीड़ा को बयां करते हैं। विद्यालय जाने वाले बच्चों का कहना है कि उन्हें हर दिन नदी पार करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। उनका सपना केवल इतना है कि वे बिना किसी भय के सुरक्षित तरीके से स्कूल पहुंच सकें।

बच्चों और युवाओं के बीच “मामा” के नाम से लोकप्रिय असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा को की गई बच्चों की यह भावुक अपील अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है और लोगों का कहना है कि सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

हाथ से चलने वाली छोटी नाव ही बनी जीवनरेखा

इकरातोली क्षेत्र में दिसांग नदी पर पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों के लिए हाथ से चलाई जाने वाली छोटी नाव ही आवागमन का एकमात्र साधन बनी हुई है। प्रतिदिन दर्जनों लोग इसी नाव से नदी पार कर अपने काम, बाजार, अस्पताल और विद्यालय तक पहुंचते हैं।

बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने पर यह सफर और अधिक खतरनाक हो जाता है। तेज बहाव और बदलते मौसम के बीच छोटी नाव में सफर करना किसी जोखिम से कम नहीं माना जाता।

हर सुबह मौत से मुकाबला कर स्कूल पहुंचते हैं बच्चे

स्थानीय लोगों के अनुसार सबसे अधिक परेशानी स्कूली छात्र-छात्राओं को होती है। प्रतिदिन सुबह दर्जनों बच्चे छोटी नाव में बैठकर नदी पार करते हैं। नाव का आकार छोटा होने के कारण संतुलन बनाए रखना भी कठिन होता है।

तेज बहाव, अचानक बदलता मौसम और बढ़ता जलस्तर हर दिन किसी बड़े हादसे की आशंका पैदा करता है। कई छोटे बच्चे डर के कारण रोते हुए नाव में बैठते हैं, लेकिन पढ़ाई जारी रखने की मजबूरी उन्हें यह खतरा उठाने के लिए विवश करती है।

मानसून में कई दिनों तक बंद हो जाती है पढ़ाई

बरसात के दौरान जब दिसांग नदी का जलस्तर बढ़ जाता है तो कई बार नाव का संचालन पूरी तरह रोक दिया जाता है। ऐसी स्थिति में छात्र-छात्राएं कई दिनों तक विद्यालय नहीं पहुंच पाते।

ग्रामीणों का कहना है कि इससे बच्चों की पढ़ाई, परीक्षाओं की तैयारी और भविष्य प्रभावित होता है। उनका मानना है कि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब बच्चों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी बनी बड़ी चुनौती

पुल नहीं होने का सबसे गंभीर असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। किसी मरीज की तबीयत अचानक बिगड़ने पर उसे भी इसी छोटी नाव के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। रात के समय अथवा खराब मौसम में स्थिति और अधिक भयावह हो जाती है।

गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाना ग्रामीणों के लिए सबसे कठिन कार्य बन जाता है। लोगों का कहना है कि इलाज में थोड़ी सी देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है।

सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कुछ भी नहीं

ग्रामीणों का आरोप है कि नदी पार कराने वाली नाव में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट जैसी मूलभूत सुविधा तक उपलब्ध नहीं है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी कारणवश नाव दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो यात्रियों के सुरक्षित बचने की संभावना बेहद कम हो सकती है। उन्होंने प्रशासन से कई बार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।

कृषि, व्यापार और रोजगार पर भी पड़ रहा असर

दिसांग नदी पर पुल नहीं होने का असर केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि छोटे व्यापारियों को सामान ढोने में अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ता है।

स्थानीय युवाओं का कहना है कि यदि यहां स्थायी पुल का निर्माण हो जाए तो क्षेत्र में व्यापार, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

हर चुनाव में वादा, लेकिन पुल अब भी सपना

ग्रामीणों का कहना है कि इकरातोली के निकट पुल निर्माण की मांग वर्षों पुरानी है। हर चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधि पुल बनाने का आश्वासन देते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह मुद्दा फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।

लोगों का कहना है कि जब तक स्थायी पुल का निर्माण नहीं होगा, तब तक क्षेत्र के समग्र विकास की कल्पना अधूरी ही रहेगी।

विकास की योजनाओं के बीच उपेक्षित क्षेत्र

राज्य सरकार द्वारा हाल के वर्षों में विभिन्न नदियों पर सड़क और पुल निर्माण परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई है। शिवसागर जिले में ऐतिहासिक 1935 में निर्मित डिखौ पुल आज भी इंजीनियरिंग विरासत का प्रतीक माना जाता है।

इसके बावजूद इकरातोली क्षेत्र में दिसांग नदी पर आज तक स्थायी पुल नहीं बन सका है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास की योजनाओं का लाभ इस क्षेत्र तक अभी नहीं पहुंच पाया है।

सरकार और प्रशासन से ग्रामीणों की मांग

क्षेत्र के लोगों ने राज्य सरकार, लोक निर्माण विभाग, जिला प्रशासन तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि इकरातोली के निकट दिसांग नदी पर शीघ्र स्थायी पुल निर्माण की स्वीकृति प्रदान की जाए।

साथ ही जब तक पुल का निर्माण नहीं हो जाता, तब तक सुरक्षित नाव सेवा, लाइफ जैकेट, प्रशिक्षित नाविक तथा आपातकालीन बचाव व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी संभावित दुर्घटना से लोगों की जान बचाई जा सके।

यह केवल पुल नहीं, हजारों लोगों के भविष्य का सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक पुल का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा प्रश्न है।

मासूम बच्चों की यह पुकार आज पूरे क्षेत्र की आवाज़ बन चुकी है—”हमें पढ़ना है… आगे बढ़ना है… लेकिन इसके लिए पहले हमें एक सुरक्षित पुल चाहिए।”

ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो किसी भी दिन एक बड़ी दुर्घटना पूरे क्षेत्र को झकझोर सकती है। अब सभी की निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिकी हैं कि आखिर बच्चों की यह मासूम पुकार कब सुनी जाएगी।

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