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स्कूलों में ‘कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन’ लागू करने की तैयारी, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें मंजूर : बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’, POCSO, सहमति और सुरक्षित व्यवहार की भी दी जाएगी शिक्षा : अदालत की मंजूरी के बाद होगा अमल

न्यूज डेस्क, 14 जुलाई : भारत में लंबे समय से सामाजिक झिझक और विवाद का विषय रही कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन (Comprehensive Sex Education-CSE) को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है और अदालत की मंजूरी मिलने के बाद देशभर के स्कूलों और कॉलेजों में आयु-उपयुक्त (Age-Appropriate) कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन लागू किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को किसने और कब दी जानकारी ?

13 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने केंद्र सरकार की ओर से यह जानकारी दी। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर ली है और अदालत की अनुमति मिलने के बाद इसे लागू किया जाएगा।

क्या है पूरा मामला ?

यह मामला नाबालिग गर्भधारण, किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों के POCSO कानून के तहत अपराध के रूप में दर्ज होने तथा बच्चों को यौन शोषण से बचाने के उपायों से जुड़ा है। इन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। अब केंद्र ने अदालत को बताया है कि वह समिति की प्रमुख सिफारिशों से सहमत है।

26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने क्या सिफारिश की ?

केंद्र सरकार द्वारा गठित 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अतिरिक्त सचिव ने की। समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के प्रतिनिधि शामिल थे। समिति ने सुझाव दिया कि कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन और बाल यौन शोषण (Child Sexual Abuse) से जुड़ी शिक्षा को स्कूलों के मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।

क्या-क्या पढ़ाया जाएगा ?

प्रस्तावित पाठ्यक्रम केवल प्रजनन प्रणाली तक सीमित नहीं होगा, बल्कि उम्र के अनुसार वैज्ञानिक और व्यवहारिक शिक्षा दी जाएगी।

इसमें शामिल हो सकते हैं—

– किशोरावस्था में शारीरिक और मानसिक बदलाव
– व्यक्तिगत स्वच्छता और प्रजनन स्वास्थ्य
– गुड टच और बैड टच की पहचान
– शरीर की निजता (Body Safety) और व्यक्तिगत सीमाएं
– सहमति (Consent) का महत्व
– लैंगिक समानता और सम्मानजनक व्यवहार
– POCSO कानून की जानकारी
– बाल यौन शोषण की पहचान और शिकायत की प्रक्रिया
– ऑनलाइन सुरक्षा और साइबर शोषण से बचाव
– सुरक्षित संबंध और जिम्मेदार व्यवहार

विशेषज्ञों ने कहा है कि बच्चों को ऐसी जानकारी उम्र के अनुरूप दी जानी चाहिए ताकि वे असुरक्षित परिस्थितियों की पहचान कर समय रहते मदद मांग सकें।

प्राथमिक कक्षाओं से शुरू करने का सुझाव

समिति ने सिफारिश की है कि प्राथमिक स्तर से ही प्रशिक्षित विशेषज्ञ शिक्षक इन विषयों पर पढ़ाएं। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सप्ताह में कम से कम दो बार 15 से 20 मिनट की अनिवार्य कक्षाएं आयोजित की जाएं। इसके अलावा अभिभावकों और शिक्षकों के लिए नियमित जागरूकता बैठकें भी आयोजित करने की बात कही गई है, ताकि बच्चों के विकास और यौन शिक्षा के महत्व को समझाया जा सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जोड़ने की सिफारिश

रिपोर्ट में कहा गया है कि किशोर शिक्षा कार्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप विकसित किया जाए। साथ ही POCSO कानून और बाल सुरक्षा से जुड़ी जागरूकता को भी किशोर शिक्षा मॉड्यूल में शामिल किया जाए।

क्यों माना जा रहा है ऐतिहासिक कदम ?

भारत में सेक्स एजुकेशन लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। कई राज्यों में पहले इस तरह के कार्यक्रमों का विरोध हुआ था और कुछ राज्यों ने इन्हें सीमित या बंद भी किया था। ऐसे में पहली बार केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष व्यापक यौन शिक्षा को औपचारिक रूप से स्वीकार करना शिक्षा और बाल सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

अब आगे क्या होगा ?

फिलहाल कॉम्प्रिहेंसिव सेक्स एजुकेशन लागू नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अदालत की मंजूरी मिलने के बाद इन सिफारिशों को लागू किया जाएगा। यदि अदालत रिपोर्ट स्वीकार करती है, तो NCERT, शिक्षा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और राज्य सरकारों के सहयोग से चरणबद्ध तरीके से नए मॉड्यूल, शिक्षकों के प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

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