हिंदी दिवस पर हिंदी साहित्य सम्मेलन तेजपुर का विशेष समारोह, साहित्य-सृजन और रचनात्मकता पर हुआ सार्थक विचार-मंथन : मुख्य वक्ता संजीव गोस्वामी सहित साहित्यकारों ने साझा किए जीवन और सृजन के अनुभव, बताया—संवेदना और कल्पनाशीलता से जन्म लेती है रचनात्मक सोच
उषा किरण टिबरेवाल ने कविता-संग्रह ‘शब्द नि:शब्द’ और नाजो हातीकाकोती ने पुस्तक ‘वर्ण पिरामिड’ की प्रतियां सप्रेम भेंट कीं

तेजपुर, 14 सितंबर : हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी साहित्य सम्मेलन, तेजपुर की ओर से रविवार को एक विशेष समारोह एवं विचार-सत्र का आयोजन किया गया। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति सम्मान एवं अनुराग को समर्पित इस आयोजन में केवल हिंदी के प्रचार-प्रसार पर ही नहीं, बल्कि साहित्य-सृजन, रचनात्मकता, कल्पनाशीलता और मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलुओं पर भी सार्थक विचार-मंथन हुआ। कार्यक्रम में शहर के साहित्यकारों, कवियों और हिंदी साहित्य सम्मेलन के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

रचनात्मकता और कल्पनाशीलता बनी विचार-सत्र का केंद्र
समारोह की विशेषता यह रही कि इसमें वक्ताओं ने साहित्य और रचनात्मकता को केवल सैद्धांतिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के बजाय अपने व्यक्तिगत जीवन-अनुभवों से जोड़कर चर्चा की। उपस्थित साहित्यकारों एवं सम्मेलन के सदस्यों ने बताया कि उनके भीतर रचनात्मकता और कल्पनाशीलता का विकास किस प्रकार हुआ तथा जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों, अनुभवों और संवेदनाओं ने उन्हें साहित्य एवं सृजन की दुनिया की ओर कैसे प्रेरित किया।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य-सृजन किसी एक क्षण या परिस्थिति की उपज नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के जीवन में निरंतर घटित होने वाली घटनाएं, सामाजिक परिवेश, मानवीय रिश्ते, अनुभूतियां और कल्पना मिलकर उसकी रचनात्मक चेतना को आकार देते हैं।
संजीव गोस्वामी सहित साहित्यकारों ने साझा किए व्यक्तिगत अनुभव
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता संजीव गोस्वामी ने रचनात्मकता और कल्पनाशीलता के विकास से जुड़े अपने अनुभव एवं विचार साझा किए। उनके साथ साहित्यकार एवं कवयित्री उषा किरण टिबरेवाल, साहित्यकार नाजो हातीकाकोती तथा काव्य रचनाकार सचिवानंद जी ने भी अपने व्यक्तिगत अनुभवों और साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पहलुओं को उपस्थित लोगों के समक्ष रखा।
वक्ताओं ने अपने विचारों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि रचनात्मक सोच केवल कविता, कहानी या अन्य साहित्यिक विधाओं के लेखन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध व्यक्ति के संपूर्ण जीवन से है। मनुष्य अपने आसपास की दुनिया को किस दृष्टि से देखता और महसूस करता है, उसके अनुभव उसे किस प्रकार प्रभावित करते हैं तथा उसकी कल्पनाशीलता उन अनुभवों को किस तरह अभिव्यक्ति देती है—इन्हीं तत्वों से रचनात्मकता निरंतर विकसित होती रहती है।

‘शब्द नि:शब्द’ और ‘वर्ण पिरामिड’ की प्रतियां की गईं भेंट
हिंदी दिवस के इस विशेष अवसर पर साहित्यिक कृतियों के आदान-प्रदान का आत्मीय क्षण भी देखने को मिला। साहित्यकार एवं कवयित्री उषा किरण टिबरेवाल ने अपने नवीन कविता-संग्रह ‘शब्द नि:शब्द’ की प्रतियां हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष दिनेश वर्मा एवं कार्यक्रम के मुख्य वक्ता संजीव गोस्वामी को सप्रेम भेंट कीं।
इसी क्रम में साहित्यकार नाजो हातीकाकोती ने अपनी नई पुस्तक ‘वर्ण पिरामिड’ की प्रतियां भी अध्यक्ष दिनेश वर्मा और मुख्य वक्ता संजीव गोस्वामी को सप्रेम भेंट कीं। इस अवसर ने समारोह के साहित्यिक वातावरण को और अधिक आत्मीय एवं रचनात्मक स्वरूप प्रदान किया।
सम्मेलन के पदाधिकारियों और सदस्यों की रही उल्लेखनीय उपस्थिति
कार्यक्रम में हिंदी साहित्य सम्मेलन, तेजपुर के अध्यक्ष दिनेश वर्मा, कार्यकारी अध्यक्ष मदन मोहन सिंह, उपाध्यक्ष शिवकुमार मिश्रा एवं राजीव जैन, सचिव नवीन अग्रवाल, कोषाध्यक्ष हरिहर ठाकुर तथा सह-सचिव अरुण सिंह की विशेष उपस्थिति रही।
इसके अलावा बबलू कुमार झा, अजीत सिंह, शिवचरण कोइरी और विकाश मोहन सिंह सहित हिंदी साहित्य सम्मेलन के अनेक सदस्यों ने समारोह में भाग लिया। उपस्थित सदस्यों ने हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित इस तरह के विचारपरक कार्यक्रम को हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति नई पीढ़ी में रुचि एवं रचनात्मक चेतना विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

साहित्य मनुष्य की संवेदना और जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्ति
समारोह के दौरान सभी वक्ताओं के विचारों में एक साझा भाव प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि साहित्य और रचनात्मकता का मूल स्रोत मनुष्य की संवेदनशीलता, कल्पना और उसके जीवन-अनुभव हैं। व्यक्ति जो देखता, महसूस करता और अपने भीतर आत्मसात करता है, वही किसी न किसी रूप में उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का आधार बनता है।
हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित यह समारोह इस दृष्टि से विशेष रहा कि इसमें हिंदी भाषा के महत्व के साथ-साथ साहित्य-सृजन के पीछे काम करने वाली मानवीय अनुभूतियों और रचनात्मक प्रक्रिया पर भी खुलकर संवाद हुआ। साहित्यकारों के व्यक्तिगत अनुभवों, विचारों और आत्मीय संवाद ने आयोजन को महज औपचारिक हिंदी दिवस समारोह तक सीमित न रखते हुए एक सार्थक साहित्यिक विचार-मंच का स्वरूप प्रदान किया।




