रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्वविद्यालय में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई गई महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव तिथि : श्रीमंत शंकरदेव परिसर में गूंजा हरिनाम, विष्णुप्रिया नामती दल की भक्तिमय प्रस्तुति ने बनाया आध्यात्मिक वातावरण : शिक्षक-शिक्षिकाओं और छात्र-छात्राओं ने हरिनाम में लिया भाग; महापुरुष के भक्ति, समानता, मानवता और सामाजिक सद्भाव के चिरंतन संदेश को किया याद
एकशरण नामधर्म से लेकर बरगीत, अंकिया नाट, भाओना और सत्रिया संस्कृति तक शंकरदेव के अतुलनीय योगदान का स्मरण : नई पीढ़ी को असम की समृद्ध आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का माध्यम बना विश्वविद्यालय का आयोजन

होजाई, 12 सितंबर : स्थानीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्वविद्यालय के श्रीमंत शंकरदेव परिसर में शनिवार को श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण वातावरण में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की तिथि मनाई गई। विश्वविद्यालय की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में महापुरुष शंकरदेव के महान आदर्शों, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक सुधार तथा असमिया समाज, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया।

विष्णुप्रिया नामती दल के हरिनाम से भक्तिमय हुआ परिसर
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण होजाई जिले के धलपुखुरी स्थित विष्णुप्रिया नामती दल द्वारा प्रस्तुत भक्तिमय हरिनाम रहा। नामती दल ने जब विश्वविद्यालय परिसर में हरिनाम की प्रस्तुति शुरू की तो पूरा वातावरण भक्ति और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर हो उठा। हरिनाम की मधुर और भक्तिपूर्ण ध्वनि ने विश्वविद्यालय परिसर को उत्सवमय वातावरण में बदल दिया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं और छात्र-छात्राओं ने भी उत्साह एवं श्रद्धा के साथ हरिनाम में भाग लिया। आमंत्रित नामती दल और विश्वविद्यालय परिवार की सामूहिक सहभागिता ने आयोजन को केवल औपचारिक स्मृति कार्यक्रम न रहने देकर इसे असम की जीवंत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का सुंदर उत्सव बना दिया।
धर्मगुरु के साथ महान समाज सुधारक और सांस्कृतिक नवजागरण के अग्रदूत
उल्लेखनीय है कि महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव केवल एक महान धर्मगुरु ही नहीं थे, बल्कि वे असमिया समाज के महान समाज सुधारक, साहित्यकार, नाटककार, संगीतज्ञ और सांस्कृतिक नवजागरण के अग्रदूत भी थे। उन्होंने अपने विचारों, साहित्य, संगीत, नाट्य परंपरा और आध्यात्मिक आंदोलन के माध्यम से असम के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर अमिट छाप छोड़ी।
एकशरण नामधर्म, नाम-प्रसंग, बरगीत, अंकिया नाट, भाओना और सत्रिया संस्कृति के माध्यम से महापुरुष शंकरदेव ने असमिया समाज-जीवन को एक विशिष्ट सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पहचान प्रदान की। उनके द्वारा स्थापित वैष्णव परंपरा ने समाज को भक्ति के सूत्र में जोड़ने के साथ-साथ सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों को भी मजबूत आधार दिया।
भक्ति, समानता और मानवता का संदेश आज भी प्रासंगिक
महापुरुष शंकरदेव के भक्ति, समानता, मानवता, सहिष्णुता, सामाजिक सद्भाव और नैतिक जीवन से जुड़े आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक माने जाते हैं। विश्वविद्यालय के शिक्षक-छात्र समुदाय और आमंत्रित नामती दल द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत हरिनाम इन चिरंतन आदर्शों के प्रति गहरी श्रद्धा तथा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का सुंदर उदाहरण बना।
आयोजन के माध्यम से यह संदेश भी सामने आया कि महापुरुष शंकरदेव की शिक्षाएं केवल धार्मिक या ऐतिहासिक संदर्भों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी सद्भाव और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण समाज के निर्माण में भी उनका दर्शन आज महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
शिक्षा के साथ इतिहास, साहित्य और लोकसंस्कृति का सुंदर समन्वय
शंकरदेव तिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण के साथ असम के इतिहास, विरासत, साहित्य, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा और लोकसंस्कृति का सुंदर समन्वय स्थापित किया। विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थान में इस प्रकार के आयोजन ने शिक्षा के साथ सांस्कृतिक चेतना और अपनी विरासत के प्रति जिम्मेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया।
विशेष रूप से नई पीढ़ी के बीच महापुरुष शंकरदेव के जीवन-दर्शन, सामाजिक विचारों और सांस्कृतिक योगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में यह आयोजन महत्वपूर्ण रहा। छात्र-छात्राओं की सक्रिय भागीदारी ने यह संदेश दिया कि असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में शैक्षणिक संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
नई पीढ़ी और असम की सांस्कृतिक विरासत के बीच आत्मीय सेतु
रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्वविद्यालय के श्रीमंत शंकरदेव परिसर में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक महापुरुष की पुण्य स्मृति तक सीमित नहीं रहा। यह असमिया समाज की सांस्कृतिक पहचान, आध्यात्मिक चेतना और समृद्ध विरासत के साथ विश्वविद्यालय की नई पीढ़ी के आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक बन गया।
हरिनाम की भक्तिमय ध्वनि, शिक्षक-छात्रों की सहभागिता और महापुरुष शंकरदेव के कालजयी आदर्शों के स्मरण के बीच संपन्न इस आयोजन ने असम की महान वैष्णव परंपरा तथा सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रद्धा, संस्कृति और शिक्षा के सुंदर संगम का संदेश दिया।




