संघर्ष की छोटी-सी दुकान से मेडिकल कॉलेज तक: बिना कोचिंग मयूर पोद्दार ने लिखी सफलता की प्रेरक कहानी : NEET में 610 अंक और 6268वीं रैंक हासिल कर गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में बनाई जगह, शिवसागर का नाम किया रोशन : ढाई साल की उम्र में सिर से उठा पिता का साया, छोटी-सी दुकान चलाकर मां मीरा पोद्दार ने बेटे-बेटी की पढ़ाई और सपनों को रखा जिंदा : पहले बेटी हर्षिता बनीं चार्टर्ड अकाउंटेंट, अब बेटे मयूर के डॉक्टर बनने का सपना होगा साकार—वर्षों के संघर्ष और त्याग को मिली नई पहचान
मैट्रिक में 93.5% और हायर सेकेंडरी साइंस में 94.4% अंक : बिना कोचिंग के NEET में शानदार प्रदर्शन ने बढ़ाया शिवसागर सीनियर सेकेंडरी स्कूल का गौरव : प्रिंसिपल तरुलता सैकिया भुइयां ने 25 हजार रुपये का चेक और फुलाम गामोछा देकर किया सम्मानित : शिक्षकों और विद्यार्थियों ने उज्ज्वल भविष्य की दी शुभकामनाएं

शिवसागर, 11 सितंबर : सफलता की कुछ कहानियां केवल अंकों, रैंक और उपलब्धियों तक सीमित नहीं होतीं। उनके पीछे वर्षों का संघर्ष, अभाव में पलते सपने, एक मां का त्याग और परिस्थितियों से हार न मानने का साहस छिपा होता है। शिवसागर के प्रतिभाशाली छात्र मयूर पोद्दार की सफलता भी ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है। बचपन में पिता को खोने, सीमित आर्थिक संसाधनों और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए किसी औपचारिक कोचिंग का सहारा न मिलने के बावजूद मयूर ने अपनी मेहनत, आत्मानुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर NEET में 610 अंक हासिल किए और अब काउंसलिंग में उन्हें प्रतिष्ठित गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए सीट आवंटित हुई है।
मयूर की इस उपलब्धि ने केवल उनके परिवार को ही खुशी नहीं दी है, बल्कि शिवसागर सीनियर सेकेंडरी स्कूल (शिवसागर जूनियर कॉलेज) के साथ पूरे शिवसागर को गौरवान्वित किया है। यह सफलता उस मां के लंबे संघर्ष की भी उपलब्धि है, जिसने पति को खोने के बाद छोटी-सी दुकान के सहारे परिवार संभाला, लेकिन कठिन से कठिन दौर में भी अपने बच्चों की शिक्षा और उनके सपनों से समझौता नहीं किया।

NEET में 610 अंक, 99.68 पर्सेंटाइल और 6268वीं रैंक
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 16 जुलाई को घोषित NEET परिणाम में मयूर पोद्दार ने 610 अंक प्राप्त किए थे। उनका पर्सेंटाइल 99.68 रहा, जबकि उन्होंने 6268वीं रैंक हासिल की। शानदार NEET प्रदर्शन के बाद अब काउंसलिंग में मयूर को गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए सीट आवंटित होने से परिवार और विद्यालय में खुशी का माहौल है।
मयूर की सफलता की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए किसी मेडिकल कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया। सीमित संसाधनों के बीच अपनी पढ़ाई, अभ्यास और आत्मविश्वास को आधार बनाकर उन्होंने प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने का रास्ता बनाया।
उनकी उपलब्धि ऐसे हजारों विद्यार्थियों के लिए संदेश है, जो यह मानते हैं कि बड़े शहर, महंगी कोचिंग और अत्यधिक संसाधनों के बिना बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करना मुश्किल है। मयूर ने साबित किया कि सही दिशा में लगातार मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता हो तो सीमित साधन प्रतिभा की राह रोक नहीं सकते।

ढाई वर्ष की उम्र में पिता को खोया, मां के कंधों पर आ गई पूरी जिम्मेदारी
मयूर की सफलता के पीछे उनकी मां मीरा पोद्दार के संघर्ष की एक भावुक और प्रेरणादायक कहानी है। मयूर, स्वर्गीय संदीप पोद्दार और मीरा पोद्दार के पुत्र हैं। वर्ष 2010 में जब मयूर महज ढाई वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। जिस उम्र में एक बच्चे को पिता की उंगली पकड़कर दुनिया को समझना शुरू करना चाहिए, उसी उम्र में मयूर के सिर से पिता का साया उठ गया।
पति के निधन के बाद परिवार को संभालने की पूरी जिम्मेदारी मीरा पोद्दार के कंधों पर आ गई। सामने बच्चों का भविष्य था और दूसरी तरफ घर चलाने की आर्थिक चुनौती। परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कठिनाइयों के आगे हार स्वीकार नहीं की।
छोटी-सी गुमटी बनी परिवार का सहारा, बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी
परिवार का भरण-पोषण करने और बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए मीरा पोद्दार ने एक छोटी-सी गुमटी की दुकान को अपनी आजीविका का सहारा बनाया। सीमित आमदनी के बीच घर की जरूरतें पूरी करना और साथ ही बच्चों को अच्छी शिक्षा देना आसान नहीं था। फिर भी उन्होंने अपने बच्चों के सपनों को परिस्थितियों के आगे छोटा नहीं होने दिया।
छोटी दुकान से होने वाली कमाई के बीच उन्होंने हर संभव कोशिश की कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। समय बीतता गया, बच्चे आगे बढ़ते गए और मां का संघर्ष धीरे-धीरे उनकी उपलब्धियों में बदलता गया।
आज जब मयूर को गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का अवसर मिला है, तो यह सिर्फ एक बेटे की सफलता नहीं, बल्कि उस मां की तपस्या का परिणाम भी है जिसने वर्षों तक अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

पहले बेटी हर्षिता बनीं CA, अब बेटा डॉक्टर बनने की राह पर
मीरा पोद्दार के संघर्ष का परिणाम पहले बेटी हर्षिता पोद्दार की सफलता के रूप में सामने आया। हर्षिता ने वर्ष 2024 में चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बनकर परिवार का गौरव बढ़ाया। अब मयूर के मेडिकल कॉलेज पहुंचने से परिवार की सफलता में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है।
जिस मां ने पति के निधन के बाद अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए छोटी-सी दुकान को सहारा बनाया, उनकी बेटी आज चार्टर्ड अकाउंटेंट है और बेटा डॉक्टर बनने की राह पर बढ़ चुका है। परिवार के लिए यह उपलब्धि वर्षों की कठिन मेहनत, धैर्य और त्याग के बाद आए उस सुखद पड़ाव की तरह है, जहां पीछे मुड़कर देखने पर संघर्ष के हर दिन का अर्थ दिखाई देता है।
स्कूली से ही लगातार शानदार रहा मयूर का प्रदर्शन
शिवसागर शहर के सिंह दौल्ला पथ निवासी मयूर पोद्दार बचपन से ही पढ़ाई में प्रतिभाशाली रहे हैं। उन्होंने होली नेम स्कूल से मैट्रिक परीक्षा 93.5 प्रतिशत अंक के साथ उत्तीर्ण की थी। इसके बाद उन्होंने शिवसागर सीनियर सेकेंडरी स्कूल में साइंस स्ट्रीम से अपनी पढ़ाई जारी रखी।
हायर सेकेंडरी परीक्षा में भी मयूर ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए 94.4 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद उन्होंने अपना लक्ष्य मेडिकल शिक्षा को बनाया और NEET की तैयारी शुरू की।
मैट्रिक में 93.5 प्रतिशत, हायर सेकेंडरी साइंस में 94.4 प्रतिशत और फिर NEET में 610 अंक—मयूर का यह शैक्षणिक सफर उनकी निरंतरता और मेहनत को दर्शाता है।

बिना मेडिकल कोचिंग सफलता ने उपलब्धि को बनाया और खास
आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए महंगी कोचिंग को अक्सर सफलता की महत्वपूर्ण जरूरत माना जाता है। ऐसे माहौल में मयूर की उपलब्धि इसलिए विशेष है क्योंकि उन्होंने किसी मेडिकल कोचिंग के बिना NEET में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।
मयूर ने परिस्थितियों और सीमित संसाधनों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय मेहनत को अपनी ताकत बनाया। पिता की अनुपस्थिति में मां के संघर्ष को बेहद करीब से देखते हुए बड़े हुए मयूर के लिए पढ़ाई केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं रही, बल्कि परिवार के सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी बन गई।
उनकी कहानी यह संदेश देती है कि संसाधनों का महत्व अपनी जगह है, लेकिन कठिन परिश्रम, आत्मानुशासन और लक्ष्य के प्रति दृढ़ता सफलता की दिशा तय करने में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

विद्यालय में हुआ अभिनंदन, 25 हजार रुपये का चेक देकर बढ़ाया हौसला
मयूर की उपलब्धि से शिवसागर सीनियर सेकेंडरी स्कूल में भी उत्साह और गर्व का माहौल है। विद्यालय परिवार ने उनकी सफलता को संस्थान के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए विशेष रूप से सम्मानित किया।
विद्यालय की प्रिंसिपल तरुलता सैकिया भुइयां ने मयूर को 25 हजार रुपये का चेक प्रदान किया। इसके साथ ही उन्हें असम की पारंपरिक संस्कृति और सम्मान के प्रतीक फुलाम गामोछा से अभिनंदित किया गया।
विद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने मयूर की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। विद्यालय परिवार के लिए यह क्षण इसलिए भी विशेष रहा कि उनके संस्थान से पढ़कर निकला छात्र अब प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने जा रहा है।

शिक्षकों के लिए गर्व, विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बने मयूर
विद्यालय के शिक्षकों ने मयूर की उपलब्धि को उनकी मेहनत, आत्मानुशासन और पढ़ाई के प्रति समर्पण का परिणाम बताया। बिना औपचारिक मेडिकल कोचिंग के NEET जैसी अत्यंत प्रतिस्पर्धी परीक्षा में शानदार प्रदर्शन और गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में सीट हासिल करना विद्यालय के अन्य विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरणा बन गया है।
शिक्षकों और विद्यार्थियों ने उनकी सफलता पर खुशी व्यक्त करते हुए ईश्वर के प्रति आभार जताया तथा कामना की कि मयूर चिकित्सा शिक्षा में भी इसी लगन और अनुशासन को बनाए रखें।
मां के संघर्ष को बेटे की सफलता ने दिया सबसे खूबसूरत जवाब
मयूर की कहानी में आंकड़े प्रभावशाली हैं—93.5 प्रतिशत, 94.4 प्रतिशत, NEET में 610 अंक और 6268वीं रैंक। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे की कहानी उससे कहीं अधिक बड़ी है। इसमें एक ढाई साल के बच्चे से पिता का साया छिन जाने का दर्द है; पति को खोने के बाद परिवार को संभालने के लिए संघर्ष करती मां है; छोटी-सी दुकान से होने वाली आय के बीच बच्चों को पढ़ाने का संकल्प है; और कठिन परिस्थितियों को स्वीकार कर हार मानने के बजाय उनसे आगे निकलने का जज्बा है।
आज बेटी हर्षिता के CA बनने के बाद मयूर के डॉक्टर बनने की दिशा में कदम बढ़ाने से मीरा पोद्दार की वर्षों की मेहनत को एक और सुखद मंजिल मिली है। जिस छोटी-सी दुकान ने मुश्किल दिनों में परिवार की जरूरतों और बच्चों की शिक्षा का बोझ उठाया, उसी संघर्ष की छांव से अब एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और एक भावी डॉक्टर की सफलता की कहानी सामने आई है।

एक छात्र की उपलब्धि से बढ़कर संघर्ष, शिक्षा और उम्मीद की कहानी
मयूर पोद्दार का गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत शैक्षणिक उपलब्धि नहीं है। यह उन परिवारों के लिए उम्मीद की कहानी है, जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन बच्चों के सपने बड़े हैं। यह उन माताओं के संघर्ष को सम्मान देती है, जो कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देती हैं। साथ ही यह विद्यार्थियों को बताती है कि विपरीत परिस्थितियां भविष्य का अंतिम फैसला नहीं करतीं।

अब मयूर के सामने चिकित्सा शिक्षा का नया और चुनौतीपूर्ण सफर है। परिवार, शिक्षक और शुभचिंतक उम्मीद कर रहे हैं कि जिस लगन और मेहनत से उन्होंने अब तक की बाधाओं को पार किया है, उसी दृढ़ता के साथ वह मेडिकल की पढ़ाई पूरी करेंगे और भविष्य में एक सफल चिकित्सक बनकर समाज की सेवा करेंगे।
शिवसागर की एक छोटी-सी दुकान से शुरू हुए संघर्ष की इस कहानी ने अब गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज तक का सफर तय किया है। मां के त्याग, बेटे की मेहनत और शिक्षा पर अटूट विश्वास से मिली यह सफलता बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों—सपनों को जिंदा रखा जाए और उनके लिए लगातार मेहनत की जाए, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता जरूर बन सकता है।




