बाढ़ पीड़ितों के हक में शिवसागर में आटासू का प्रदर्शन, केंद्र से 10 हजार करोड़ के विशेष पैकेज की मांग : हजारों बाढ़ प्रभावितों के साथ बोर्डिंग फील्ड से निकली विशाल रैली, जिला आयुक्त कार्यालय के सामने जोरदार प्रदर्शन : हर प्रभावित परिवार को 4 से 5 लाख रुपये तक सहायता देने की मांग, हजारों पात्र परिवारों को अब भी 15 हजार की तात्कालिक राहत नहीं मिलने का आरोप : “एक सप्ताह में वंचित परिवारों को राहत नहीं मिली तो दिसपुर घेराव, मांगें अनसुनी रहीं तो ऊपरी असम बंद”—बसंत गोगोई
विनाशकारी बाढ़ के कारणों की IIT विशेषज्ञों व भूवैज्ञानिकों से जांच की मांग : कथित अवैध कोयला-पत्थर खनन और नदी के बदलते प्रवाह पर उठाए सवाल : दिखौ के 18 किलोमीटर खुले तटबंध सहित लगभग 100 किलोमीटर तटबंध तंत्र के पुनर्निर्माण की मांग : दिसांग, दरिका और मिटोंग के पुराने तटबंधों को भी मजबूत करने पर जोर

शिवसागर, 10 सितंबर : शिवसागर और चराईदेव जिलों में 19 जुलाई को आई विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हजारों परिवारों के पुनर्वास, लंबित सरकारी सहायता के भुगतान, वास्तविक नुकसान के अनुरूप पर्याप्त मुआवजा और बाढ़ से तबाह बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण की मांग को लेकर बुधवार को शिवसागर में ऑल ताई आहोम स्टूडेंट्स यूनियन (आटासू) के नेतृत्व में विशाल जनप्रदर्शन किया गया। संगठन ने केंद्र सरकार से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का विशेष आर्थिक पैकेज देने की मांग उठाई।
आयोजकों के अनुसार, प्रदर्शन में शिवसागर सहित विभिन्न बाढ़ प्रभावित इलाकों से आए पांच हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। सुबह से ही शिवसागर के बोर्डिंग फील्ड में बाढ़ प्रभावितों की भीड़ जुटने लगी थी। इसके बाद आटासू के नेतृत्व में निकली विशाल रैली शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए जिला आयुक्त कार्यालय पहुंची, जहां प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों के समर्थन में जोरदार प्रदर्शन किया।

बोर्डिंग फील्ड से डीसी कार्यालय तक विशाल रैली
19 जुलाई की विनाशकारी बाढ़ के करीब 52 दिन बाद आयोजित इस आंदोलन के लिए सुबह लगभग आठ बजे से ही बाढ़ प्रभावित लोगों का बोर्डिंग फील्ड पहुंचना शुरू हो गया था। करीब साढ़े ग्यारह बजे विशाल जुलूस वहां से रवाना हुआ।
रैली केपी चाराली, एटी रोड, एएसटीसी तीन आली, हॉस्पिटल रोड और दौलमुख चाराली सहित शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए जिला आयुक्त कार्यालय के सामने पहुंची। वहां आंदोलन एक बड़ी विरोध सभा में तब्दील हो गया।
प्रदर्शनकारियों ने “बाढ़ प्रभावितों के साथ घटिया राजनीति बंद करो”, “सरकार हमारे दर्द और आंसुओं को समझे”, “हमें जीने का अधिकार दो”, “10 हजार करोड़ रुपये का पैकेज मंजूर करो”, “अवैध कोयला-पत्थर खनन बंद करो”, “बाढ़ पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा दो” और “तटबंधों का निर्माण करो” जैसे नारे लगाए।

‘बाढ़ ने हजारों परिवारों को वर्षों पीछे धकेल दिया’
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आटासू के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत गोगोई ने कहा कि 19 जुलाई को दिखौ, दरिका और क्षेत्र की अन्य नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ ने शिवसागर और आसपास के इलाकों में अभूतपूर्व तबाही मचाई।
उन्होंने कहा कि हजारों परिवारों के घरों में पानी घुसा, लोग विस्थापित हुए तथा मकानों, दुकानों, खेती, पशुधन और अन्य संपत्तियों को व्यापक नुकसान पहुंचा। उनका कहना था कि इस आपदा ने अनेक परिवारों को आर्थिक रूप से वर्षों पीछे धकेल दिया और बड़ी संख्या में लोग अब भी अपना जीवन दोबारा पटरी पर लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि राहत एवं पुनर्वास की मौजूदा प्रक्रिया प्रभावित परिवारों की वास्तविक जरूरत और उन्हें हुए नुकसान के अनुरूप नहीं है।

हजारों परिवारों को 15 हजार की राहत नहीं मिलने का आरोप
आटासू ने आरोप लगाया कि बाढ़ के तत्काल बाद सरकार द्वारा प्रभावित परिवारों के लिए घोषित 15 हजार रुपये की तात्कालिक आर्थिक सहायता भी हजारों पात्र लोगों तक अब तक नहीं पहुंची है।
बसंत गोगोई ने राहत वितरण की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे मामलों की शिकायतें सामने आई हैं, जहां एक ही परिवार के तीन भाई अलग-अलग मकानों में रहते हैं और तीनों मकान बाढ़ से प्रभावित हुए, लेकिन एक व्यक्ति को सहायता मिल जाने के आधार पर अन्य को राहत से वंचित किया गया।
संगठन ने मांग की कि अलग-अलग मकानों में रहने वाले वास्तविक प्रभावित परिवारों का निष्पक्ष सत्यापन किया जाए और प्रत्येक पात्र परिवार तक घोषित सरकारी सहायता पहुंचाई जाए।

सर्वे हुआ, लेकिन वास्तविक नुकसान का मुआवजा कहां?
आटासू का कहना है कि प्रशासन की ओर से बाढ़ में घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, पशुधन और अन्य संपत्तियों को हुए नुकसान का सर्वेक्षण कराया गया था, लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि विस्तृत क्षति के एवज में मिलने वाली पर्याप्त सहायता अब तक प्रभावित परिवारों तक नहीं पहुंची है।
संगठन ने कहा कि सरकार केवल 15 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी न माने। वास्तविक नुकसान का आकलन कर बाढ़ प्रभावित परिवारों के दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए पर्याप्त आर्थिक पैकेज उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

प्रत्येक गंभीर प्रभावित परिवार को 4 से 5 लाख तक सहायता की मांग
आटासू ने मांग उठाई कि बाढ़ में गंभीर नुकसान झेलने वाले प्रत्येक परिवार को उसकी वास्तविक क्षति के अनुरूप कम से कम चार से पांच लाख रुपये तक की सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
संगठन का कहना है कि घर, खेती, पशुधन, व्यवसाय और आजीविका के साधन खो चुके परिवारों को केवल तात्कालिक राहत से फिर से खड़ा करना संभव नहीं है। इसलिए राहत के साथ एक व्यवस्थित और पर्याप्त पुनर्वास योजना आवश्यक है।

‘एक सप्ताह में पैसा दें, नहीं तो दिसपुर घेराव’
बसंत गोगोई ने सरकार और प्रशासन को स्पष्ट समयसीमा देते हुए कहा कि आगामी एक सप्ताह के भीतर 15 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता से वंचित सभी पात्र बाढ़ प्रभावितों को भुगतान किया जाए और लंबित मुआवजे की प्रक्रिया तेज की जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा नहीं होने पर बाढ़ प्रभावित लोगों को साथ लेकर दिसपुर स्थित सचिवालय के घेराव का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
गोगोई ने कहा कि इसके बावजूद यदि सरकार मांगों को नजरअंदाज करती रही तो आने वाले करीब 20 दिनों के भीतर व्यापक बंद आंदोलन जैसे कठोर लोकतांत्रिक कार्यक्रम की दिशा में संगठन आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि बाढ़ पीड़ितों को उनका अधिकार और पर्याप्त पुनर्वास मिलने तक आटासू आंदोलन से पीछे नहीं हटेगा।

जिला प्रशासन से राहत का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग
आटासू अध्यक्ष ने शिवसागर जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होनी चाहिए कि कोई भी वास्तविक बाढ़ पीड़ित सरकारी सहायता से वंचित न रहे।
संगठन ने प्रशासन से सार्वजनिक रूप से बताने की मांग की कि जिले में कुल कितने प्रभावित परिवारों की पहचान की गई, उनमें से कितने परिवारों को 15 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता दी जा चुकी है और कितने परिवार अब भी भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

19 जुलाई की जलप्रलय आखिर क्यों आई? विशेषज्ञ जांच की मांग
विशाल प्रदर्शन में 19 जुलाई की विनाशकारी बाढ़ के वास्तविक कारणों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। आटासू का कहना है कि आपदा के इतने दिन बाद भी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दिखौ में अचानक आई प्रलयंकारी बाढ़ पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों का परिणाम थी या मानवीय गतिविधियों ने उसकी तीव्रता बढ़ाने में कोई भूमिका निभाई।
संगठन ने पहाड़ी क्षेत्रों में कथित अनियंत्रित एवं अवैज्ञानिक कोयला और पत्थर खनन के संभावित प्रभाव की वैज्ञानिक जांच की मांग की।
बसंत गोगोई ने आशंका जताई कि कथित अवैध और अवैज्ञानिक खनन से दिखौ नदी के प्राकृतिक प्रवाह तथा उसके जलग्रहण क्षेत्र पर प्रभाव पड़ा हो सकता है। हालांकि संगठन की ओर से उठाई गई इस आशंका की पुष्टि वैज्ञानिक जांच के बाद ही हो सकेगी।

IIT विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की उच्चस्तरीय समिति बनाने की मांग
आटासू ने सरकार से आईआईटी के विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल कर उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने की मांग की है।
संगठन चाहता है कि समिति नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति, वर्षा, गाद जमाव, जलग्रहण क्षेत्र, खनन गतिविधियों और अन्य संभावित कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन करे तथा यह पता लगाए कि अचानक आई इतनी भीषण बाढ़ के पीछे कौन से प्रमुख कारण जिम्मेदार थे।
आंदोलनकारियों का कहना है कि केवल राहत और मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि बाढ़ के मूल कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ तो भविष्य में ऐसी आपदा दोबारा आने का खतरा बना रहेगा।

नदी का प्रवाह बदलने और खुले तटबंधों पर सवाल
बसंत गोगोई ने दावा किया कि 19 जुलाई की बाढ़ पारंपरिक रूप से किसी एक स्थान पर तटबंध टूटने के बाद आने वाली सामान्य बाढ़ जैसी नहीं थी। उन्होंने कथित अवैध खनन के कारण नदी के प्रवाह में संभावित बदलाव और खुले तटबंध वाले हिस्सों से पानी बड़े भूभाग में फैलने की आशंका जताते हुए इसकी विस्तृत जांच की मांग की।
संगठन ने विशेषज्ञ अध्ययन के आधार पर नदी प्रबंधन की वैज्ञानिक योजना तैयार करने, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कथित अवैध गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करने और भविष्य की बाढ़ से बचाव के लिए दीर्घकालिक नीति बनाने की मांग की।
दिखौ के 18 किलोमीटर खुले तटबंध के निर्माण पर जोर
आटासू ने सरकार से दिखौ नदी के वर्तमान करीब 18 किलोमीटर खुले तटबंध क्षेत्र में तटबंध निर्माण कराने की मांग की है। इसके साथ ही संगठन ने दिखौ से जुड़े लगभग 100 किलोमीटर के तटबंध तंत्र का व्यापक पुनर्निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण करने की मांग उठाई।
संगठन ने दिसांग, दरिका और मिटोंग नदियों के पुराने और कमजोर तटबंधों का भी तकनीकी सर्वेक्षण कर आवश्यक मरम्मत एवं पुनर्निर्माण कराने पर जोर दिया।
आटासू का कहना है कि बाढ़ के बाद केवल क्षतिग्रस्त हिस्सों की अस्थायी मरम्मत करने से स्थायी समाधान संभव नहीं है। नदियों, तटबंधों, जलनिकासी व्यवस्था और बाढ़ प्रभावित इलाकों की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन योजना तैयार करनी होगी।

केंद्र से 10 हजार करोड़ के विशेष पैकेज की मांग
बसंत गोगोई ने कहा कि बाढ़ ने शिवसागर और चराईदेव के गांवों, सड़कों, कृषि क्षेत्रों, छोटे कारोबारों तथा अन्य बुनियादी ढांचे को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाया है। उनके मुताबिक, इतने व्यापक पुनर्निर्माण को सामान्य सरकारी योजनाओं के जरिए पूरा करना संभव नहीं होगा।
इसी आधार पर आटासू ने केंद्र सरकार से 10 हजार करोड़ रुपये का विशेष पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण पैकेज मंजूर करने की मांग की है। संगठन ने ऊपरी असम में आई इस भीषण बाढ़ की गंभीरता को राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त महत्व दिए जाने की भी मांग की।
सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष पर भी साधा निशाना
बसंत गोगोई ने आरोप लगाया कि सरकार बाढ़ प्रभावित परिवारों की पीड़ा को अपेक्षित गंभीरता से नहीं ले रही है। उन्होंने कहा कि एक तरफ स्थानीय और मूलनिवासी लोगों के हितों की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर हजारों प्रभावित परिवार अब भी घोषित राहत के लिए भटक रहे हैं।
उन्होंने विपक्षी दलों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं पर केवल राजनीतिक बयानबाजी करने के बजाय सभी राजनीतिक दलों को प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए।

ऊपरी असम मुस्लिम कल्याण परिषद ने भी दिया समर्थन
विशाल आंदोलन को ऊपरी असम मुस्लिम कल्याण परिषद ने भी समर्थन दिया। परिषद की केंद्रीय समिति के अध्यक्ष मनीरूल इस्लाम बड़ा ने कहा कि ऊपरी असम में इतने बड़े स्तर पर आई जलप्रलय के कारणों का पता लगाने के लिए अब तक वैज्ञानिक और तकनीकी स्तर पर पर्याप्त पहल नहीं होना चिंताजनक है।
उन्होंने आईआईटी विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की सहायता से बाढ़ के वास्तविक कारणों की जांच कराने तथा उसके आधार पर भविष्य के लिए ठोस समाधान तैयार करने की मांग की।
मनीरूल इस्लाम बड़ा ने केंद्र सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि ऊपरी असम के बाढ़ प्रभावित परिवारों की पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित गंभीरता नहीं मिली। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग सरकारी सहायता के लिए भीषण गर्मी में सड़क पर उतरने को मजबूर हुए हैं।
परिषद ने घोषणा की कि बाढ़ प्रभावितों को उनका उचित अधिकार मिलने तक लोकतांत्रिक आंदोलन को समर्थन जारी रहेगा। साथ ही उसने केंद्र से 10 हजार करोड़ रुपये के विशेष पुनर्वास पैकेज की मांग का समर्थन किया।
व्यापारिक समुदाय ने भी उठाई उचित क्षतिपूर्ति की मांग
प्रदर्शन में शिवसागर के व्यवसायी एवं संयुक्त मारवाड़ी समाज के संयोजक विनोद अग्रवाल तथा शिवसागर सम्मिलित व्यवसायी संघ के अध्यक्ष बकुल बरठाकुर ने भी बाढ़ प्रभावित लोगों को पर्याप्त क्षतिपूर्ति दिए जाने की मांग का समर्थन किया।
व्यापारिक समुदाय की ओर से कहा गया कि आपदा ने केवल आवासीय इलाकों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि स्थानीय कारोबार, दुकानों और हजारों लोगों की आजीविका भी प्रभावित हुई है। इसलिए राहत एवं पुनर्वास नीति तैयार करते समय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को हुए वास्तविक नुकसान को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

तात्कालिक राहत से आगे स्थायी पुनर्वास की लड़ाई
कुल मिलाकर बुधवार का विशाल जनप्रदर्शन केवल 15 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता तक सीमित नहीं रहा। आंदोलन में व्यापक पुनर्वास, वास्तविक नुकसान के अनुरूप 4 से 5 लाख रुपये तक सहायता, केंद्र से 10 हजार करोड़ रुपये का विशेष पैकेज, बाढ़ के कारणों की वैज्ञानिक जांच, कथित अवैध कोयला-पत्थर खनन की जांच एवं रोकथाम, दिखौ सहित प्रमुख नदियों के तटबंधों का पुनर्निर्माण तथा दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन नीति जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए।
आटासू ने सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि घोषित सहायता से वंचित पात्र परिवारों को शीघ्र राहत नहीं मिली और पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस निर्णय नहीं लिए गए तो आंदोलन को शिवसागर से आगे दिसपुर तक ले जाया जाएगा। संगठन के अनुसार, इसके बाद भी समाधान नहीं निकलने की स्थिति में आंदोलन को और व्यापक तथा कठोर रूप दिया जाएगा।




