राजकारेंग की ऐतिहासिक ‘मीठा पुखरी’ उपेक्षा की शिकार : जिस जल को कभी आहोम स्वर्गदेव करते थे उपयोग, वही विरासत आज जलकुंभी और जंगली वनस्पतियों से ढकी : तलातल घर परिसर में छिपी है आहोम राजवंश की अनमोल जल विरासत : राज परिवार की रसोई से लेकर पेयजल तक इसी पुखरी पर था निर्भर
‘सोनतोला पुखरी’ के नाम से भी प्रसिद्ध यह ऐतिहासिक तालाब : मोआमरिया विद्रोह से जुड़ी सोने-चांदी की लोक कथाओं को आज भी समेटे हुए

शिवसागर, 7 जुलाई : असम के गौरवशाली आहोम साम्राज्य की ऐतिहासिक राजधानी रहे रंगपुर (वर्तमान शिवसागर) की धरती आज भी सैकड़ों वर्षों पुराने इतिहास और विरासत की गवाह है। यहां स्थित तलातल घर और राजकारेंग केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि आहोम राजाओं की विकसित प्रशासनिक व्यवस्था, अनोखी वास्तुकला, सुरक्षा प्रणाली और जीवनशैली के जीवंत प्रमाण माने जाते हैं।
इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों के बीच मौजूद है एक ऐसा जल स्रोत, जिसकी कहानी आज भी अधिकतर लोगों और पर्यटकों से अनजान है। यह है राजकारेंग परिसर की ऐतिहासिक ‘मीठा पुखरी (तालाब)’, जिसका पानी कभी आहोम स्वर्गदेव और राज परिवार के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। लेकिन दुर्भाग्य से आज वही ऐतिहासिक जल स्रोत उपेक्षा और बदहाली की स्थिति में पहुंच गया है।

आहोम राज परिवार के जीवन से जुड़ा था मीठा पुखरी का पानी
इतिहासकारों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, तलातल घर परिसर के उत्तरी हिस्से में स्थित यह पुखरी आहोम शासनकाल के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण जल स्रोत हुआ करती थी।
बताया जाता है कि इसी पुखरी का पानी आहोम स्वर्गदेव, राज परिवार और राजमहल में रहने वाले लोगों द्वारा दैनिक उपयोग में लिया जाता था। यह जल केवल पीने के लिए ही नहीं, बल्कि राज परिवार के भोजन निर्माण और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए भी उपयोग किया जाता था।

चांगमाईशाल यानी राजकीय रसोई तक पहुंचता था इसी पुखरी का पानी
तलातल घर के निकट स्थित था ‘चांगमाईशाल’, यानी आहोम राज परिवार की पारंपरिक रसोई। इसी स्थान पर स्वर्गदेव और राज परिवार के सदस्यों के लिए भोजन तैयार किया जाता था।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इस राजकीय रसोई में भी भोजन तैयार करने के लिए मीठा पुखरी के जल का उपयोग किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि यह पुखरी केवल एक सामान्य तालाब नहीं, बल्कि आहोम राज व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

स्वर्गदेव राजेश्वर सिंह के काल में रंगपुर पहुंचा था वैभव के शिखर पर
आहोम इतिहास के अनुसार, स्वर्गदेव राजेश्वर सिंह (1751–1769) के शासनकाल में रंगपुर राजधानी अपने विकास और वैभव के चरम पर थी।
लगभग 17 वर्षों से अधिक के उनके शासनकाल में राजकारेंग और तलातल घर क्षेत्र आहोम प्रशासन, संस्कृति और शक्ति का प्रमुख केंद्र रहा। इसी समय राजमहल परिसर की जल व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था और निर्माण कार्यों को विशेष महत्व दिया गया था।
माना जाता है कि इसी कालखंड में मीठा पुखरी राज परिवार के प्रमुख जल स्रोतों में शामिल थी।

जयसागर पुखरी से भी जुड़ी बताई जाती है ऐतिहासिक जल व्यवस्था
स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार, इस पुखरी का संबंध एशिया के सबसे बड़े मानव निर्मित जलाशयों में गिने जाने वाले जयसागर पुखरी से भी बताया जाता है।
कहा जाता है कि आहोम शासनकाल में विशेष जल आपूर्ति व्यवस्था के जरिए पानी का प्रबंधन किया जाता था। इस व्यवस्था में इस्तेमाल किए गए पुराने पाइपों और संरचनाओं के कुछ अवशेष आज भी क्षेत्र में मिलने की बातें कही जाती हैं।
यह इस बात का प्रमाण माना जाता है कि सैकड़ों वर्ष पहले भी आहोम राजाओं ने जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में अत्यंत विकसित तकनीक अपनाई थी।

‘सोनतोला पुखरी’ नाम के पीछे छिपी है सोने-चांदी की लोक कथा
इस ऐतिहासिक तालाब को स्थानीय स्तर पर ‘सोनतोला पुखरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार, आहोम शासनकाल के अशांत दौर और मोआमरिया विद्रोह के समय राजमहल की बहुमूल्य संपत्तियों और सोने-चांदी की वस्तुओं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इस पुखरी में छिपाए जाने की बातें कही जाती हैं।
इन्हीं कथाओं और मान्यताओं के चलते समय के साथ यह पुखरी ‘सोनतोला पुखरी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हो गई।

जिस पानी को पीते थे स्वर्गदेव, आज वही जल स्रोत बदहाली में
दुखद स्थिति यह है कि जिस पुखरी का पानी कभी आहोम स्वर्गदेव और राज परिवार के उपयोग में आता था, वही ऐतिहासिक जल स्रोत आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
वर्तमान में तालाब का बड़ा हिस्सा जलकुंभी, शैवाल, कचू और अन्य जलीय वनस्पतियों से ढक चुका है। नियमित सफाई और देखभाल के अभाव में इसकी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व धीरे-धीरे प्रभावित होता जा रहा है।

हजारों पर्यटक आते हैं तलातल घर, लेकिन पुखरी के इतिहास से रहते हैं अनजान
हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक तलातल घर और राजकारेंग देखने पहुंचते हैं। वे आहोम स्थापत्य कला और भव्य निर्माण शैली को करीब से देखते हैं, लेकिन इसी परिसर में मौजूद मीठा पुखरी की ऐतिहासिक भूमिका से अधिकांश लोग अनजान रह जाते हैं।
इतिहास केवल महलों, किलों और दीवारों तक सीमित नहीं होता। किसी भी सभ्यता से जुड़े तालाब, जल व्यवस्था, रास्ते और छोटे-छोटे स्मृति स्थल भी उस दौर की तकनीकी क्षमता और जीवनशैली के महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं।

संरक्षण और सौंदर्यीकरण की उठी मांग
स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का मानना है कि संबंधित विभाग को इस ऐतिहासिक पुखरी की सफाई, वैज्ञानिक संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए।
यदि इस जल विरासत को सही तरीके से संरक्षित किया जाए, तो यह न केवल आहोम इतिहास की एक महत्वपूर्ण पहचान के रूप में फिर से उभर सकती है, बल्कि तलातल घर आने वाले पर्यटकों के लिए भी एक नया ऐतिहासिक आकर्षण बन सकती है।

अब बड़ा सवाल यही है कि — क्या संबंधित विभाग राजकारेंग की दीवारों के पीछे छिपी इस अनमोल आहोम जल विरासत को बचाने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाएगा?




