14 दिवसीय कठोर तपस्या पूर्ण कर अनोप चन्द सेठिया बने समाज के लिए प्रेरणा स्रोत : मारवाड़ी सम्मेलन धुबड़ी के अध्यक्ष ने संयम, त्याग और आत्मसाधना की अनुपम मिसाल पेश की : दो बार वर्षीतप, दो मासखमण और 1 से 15 तक की तपस्या श्रृंखला पूर्ण : मातृ प्रेरणा, गुरुकृपा और जैन साधना के प्रति अटूट समर्पण का अद्भुत उदाहरण

धुबड़ी, 28 जून : जैन धर्म की महान तपस्या परंपरा, आत्मसंयम, त्याग और आध्यात्मिक साधना की गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाते हुए मारवाड़ी सम्मेलन धुबड़ी शाखा के अध्यक्ष श्री अनोप चन्द सेठिया ने अपनी 14 दिवसीय कठोर तपस्या सफलतापूर्वक पूर्ण कर न केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त की, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा का एक उज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत किया है। उनकी इस तपस्या की पूर्णाहुति पर धुबड़ी सहित विभिन्न स्थानों से समाजबंधुओं, धर्मप्रेमियों और शुभचिंतकों ने उन्हें बधाई एवं अनुमोदना प्रेषित करते हुए उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक जीवन की मंगलकामनाएँ व्यक्त कीं।

जैन दर्शन में तप को आत्मा की निर्मलता का सर्वोच्च साधन माना गया है। ऐसी मान्यता है कि तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, वचन और काया को संयमित कर आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की आध्यात्मिक साधना है। श्री अनोप चन्द सेठिया की यह तपस्या इसी महान जैन परंपरा का सजीव उदाहरण बनकर सामने आई है।
तप नहीं, आत्मशुद्धि की साधना
श्री सेठिया की यह 14 दिवसीय तपस्या केवल उपवास तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि, क्षमा, संयम, त्याग, सहनशीलता और आध्यात्मिक जागरण की एक गंभीर साधना रही। इस अवधि में उन्होंने सांसारिक आकर्षणों से स्वयं को दूर रखते हुए धर्माराधना, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, नवकार मंत्र जाप और आत्ममंथन के माध्यम से अपने आध्यात्मिक जीवन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
धर्माचार्यों के अनुसार बाह्य तप शरीर को अनुशासित करता है, जबकि आंतरिक तप आत्मा को प्रकाशित करता है। यही कारण है कि जैन आगमों में तप को मोक्षमार्ग का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बताया गया है।
साधना का प्रभावशाली आध्यात्मिक सफर
श्री अनोप चन्द सेठिया की साधना यात्रा अत्यंत प्रेरणादायी रही है। उन्होंने अपने धार्मिक जीवन में अनेक कठिन तप सफलतापूर्वक सम्पन्न किए हैं।
उनकी साधना का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है —
दो बार वर्षीतप सम्पन्न।
दो मासखमण की कठोर साधना।
एक से पंद्रह तक की तपस्या श्रृंखला सफलतापूर्वक पूर्ण।
इस श्रृंखला में नौ उपवास की तपस्या दो बार सम्पन्न करने का दुर्लभ सौभाग्य।
जैन समाज में इस प्रकार की तपस्याओं को अत्यंत कठिन माना जाता है, क्योंकि इनमें केवल भोजन का त्याग ही नहीं, बल्कि मानसिक स्थिरता, आध्यात्मिक अनुशासन, इंद्रिय संयम और पूर्ण श्रद्धा की आवश्यकता होती है।

मातृ संस्कार बने आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी शक्ति
श्री अनोप चन्द सेठिया ने अपनी इस उपलब्धि का सम्पूर्ण श्रेय अपनी पूज्य मातुश्री के संस्कारों को दिया। उन्होंने भावुक होकर बताया कि उनकी मातुश्री ने अपने जीवनकाल में 27 वर्षीतप सम्पन्न कर जैन समाज में तपस्या का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था।
उनकी महान साधना से प्रभावित होकर परम पूज्य गुरुदेव द्वारा उन्हें “तपस्विनी श्राविका” के अलंकरण से सम्मानित किया गया था, जो सम्पूर्ण परिवार और समाज के लिए अत्यंत गौरव का विषय है।
श्री सेठिया ने कहा कि बचपन से ही उन्होंने अपनी मातुश्री के जीवन में तप, संयम, त्याग, सेवा और धर्मनिष्ठा को निकट से देखा। उन्हीं संस्कारों ने उनके भीतर भी साधना के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न की।
उन्होंने कहा कि आज यदि वे इस कठिन तपस्या को पूर्ण कर सके हैं तो उसके पीछे मातुश्री के आदर्श, शासनमाता की असीम कृपा तथा परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी का दिव्य आशीर्वाद एवं प्रेरणा ही सबसे बड़ी शक्ति रही है।

आचार्य श्री महाश्रमण की प्रेरणा ने बढ़ाया आध्यात्मिक उत्साह
श्री सेठिया ने विशेष रूप से कहा कि वर्तमान तेरापंथ धर्मसंघ के एकादश अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी द्वारा विश्वभर में दिए जा रहे अहिंसा, संयम, नैतिकता, सदाचार और मानवता के संदेश से उन्हें सदैव आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती रही है।
आचार्य श्री के प्रवचनों से प्रेरित होकर उन्होंने अपने जीवन में तप, साधना, आत्मसंयम और सेवा को अधिक महत्व देने का संकल्प लिया, जिसका परिणाम यह 14 दिवसीय तपस्या रही।
समाज के स्नेह और अनुमोदना के प्रति जताया आभार
श्री अनोप चन्द सेठिया ने अपनी तपस्या के दौरान निरंतर उनका उत्साहवर्धन करने वाले समाजबंधुओं, मित्रों, शुभचिंतकों और धर्मप्रेमियों के प्रति भावपूर्ण आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि मेरी तपस्या के दौरान जिन भाई-बहनों, समाजबंधुओं एवं शुभचिंतकों ने सुख-साता पूछकर अनुमोदना की, उनका स्नेह, आशीर्वाद और मंगलभाव मेरे लिए अमूल्य प्रेरणा का स्रोत है। मैं आप सभी के प्रति हृदय से कोटिशः धन्यवाद एवं आभार व्यक्त करता हूँ।
उन्होंने कहा कि साधना का मार्ग कभी भी अकेले नहीं चलता। समाज का स्नेह, गुरु का आशीर्वाद और परिवार का सहयोग साधक को निरंतर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।

जैन धर्म में तपस्या का आध्यात्मिक महत्व
जैन दर्शन में तप को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण का सर्वोच्च साधन माना गया है। भगवान महावीर स्वामी ने संयम, क्षमा, अपरिग्रह, अहिंसा और तप को जीवन का आधार बताया।
जैन आगमों के अनुसार तप से कर्मों की निर्जरा होती है तथा आत्मा निर्मल बनती है। वर्षीतप, मासखमण, उपवास, आयंबिल, एकासन, बेला, तेला, अठाई और अन्य तपस्याएँ केवल शरीर की परीक्षा नहीं बल्कि आत्मबल, धैर्य और आध्यात्मिक चेतना की साधना हैं।
धर्माचार्यों का कहना है कि आज के भौतिकतावादी युग में जब जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और उपभोगवाद की ओर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे समय में तपस्या मनुष्य को आत्मनियंत्रण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करती है।
युवाओं के लिए प्रेरणा बना यह आध्यात्मिक उदाहरण
समाज के वरिष्ठजनों का मानना है कि श्री अनोप चन्द सेठिया की यह साधना विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यदि कोई व्यक्ति धर्म, संयम और आत्मानुशासन के ऐसे कठिन मार्ग का चयन करता है तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय संदेश है कि सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मविजय में भी निहित है।

सेवा, संयम और साधना के पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प
तपस्या की पूर्णाहुति के अवसर पर श्री अनोप चन्द सेठिया ने भगवान महावीर की अहिंसा एवं संयम की शिक्षाओं का स्मरण करते हुए सभी के सुख, स्वास्थ्य, शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक उन्नति की मंगलकामना की।
उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मकल्याण, सेवा, सदाचार, धर्मपालन और मानवता की भावना को जीवन में उतारना है। उन्होंने भविष्य में भी संयम, साधना, सेवा और समाजहित के कार्यों में निरंतर सक्रिय रहने का संकल्प व्यक्त किया।
उन्होंने अंत में कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में थोड़ा-सा भी संयम, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन अपनाए, तो परिवार, समाज और राष्ट्र—तीनों में शांति, सद्भाव और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना संभव है। श्री अनोप चन्द सेठिया की यह 14 दिवसीय तपस्या केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि जैन धर्म की सनातन तप परंपरा, गुरु भक्ति, मातृ संस्कार और आत्मोन्नति की प्रेरणादायी गाथा बन गई है।
NE NEWS 24×7 परिवार की ओर से तपस्या की बहुत बहुत अनुमोदना।




