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भारत के तीन किशोरों अव्याना मेहता, एरियाना अग्रवाल और विवान छावछारिया ने आईआईटी गुवाहाटी के सहयोग से रचा इतिहास : इमली के बीजों से तैयार की ऐसी तकनीक, जो पीने के पानी से हटाएगी माइक्रोप्लास्टिक : ‘प्लास-स्टिक’ नवाचार से भारत पहली बार बना ‘द अर्थ प्राइज 2026’ का ग्लोबल विजेता

आईआईटी गुवाहाटी के सहयोग से विकसित कम लागत वाली तकनीक करोड़ों लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल की नई उम्मीद बनकर उभरी

न्यूज डेस्क, 27 जून : दुनिया आज जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण और स्वच्छ पेयजल की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। वैज्ञानिक वर्षों से इन समस्याओं के समाधान खोजने में जुटे हैं, लेकिन कई बार ऐसे समाधान किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला से नहीं बल्कि जिज्ञासु और संवेदनशील युवाओं की सोच से निकलकर सामने आते हैं। भारत के तीन 16 वर्षीय विद्यार्थियों ने यही कर दिखाया है। उन्होंने इमली के बेकार समझे जाने वाले बीजों से ऐसी अभिनव तकनीक विकसित की है, जो पीने के पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कणों को कम लागत में हटाने में सक्षम है। इस खोज ने न केवल वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है, बल्कि भारत को पहली बार विश्व के प्रतिष्ठित ‘द अर्थ प्राइज 2026’ का ग्लोबल विजेता भी बना दिया है।

अव्याना मेहता, एरियाना अग्रवाल और विवान छावछारिया द्वारा विकसित ‘प्लास-स्टिक (Plas-Stick)’ आज पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षित पेयजल के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल मानी जा रही है। यह तकनीक विशेष रूप से उन करोड़ों लोगों के लिए आशा की नई किरण बन सकती है, जिनके पास आधुनिक जल शुद्धिकरण प्रणाली उपलब्ध नहीं है।

जब एक छोटे बच्चे ने बदल दी तीन छात्रों की सोच

हर बड़ी खोज के पीछे एक छोटी-सी प्रेरणा होती है। प्लास-स्टिक की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। तीनों छात्र एक सामाजिक परियोजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र के एक विद्यालय पहुंचे थे। वहां उन्होंने एक छोटे बच्चे को बड़े प्लास्टिक के कंटेनर से सीधे पानी पीते देखा। उस बच्चे को यह भी पता नहीं था कि जिस पानी को वह पी रहा है, उसमें आंखों से दिखाई न देने वाले माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं।

इस दृश्य ने तीनों विद्यार्थियों को गहराई से प्रभावित किया। बाद में उन्होंने बताया कि उसी क्षण उन्हें एहसास हुआ कि यह केवल विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समान अवसर और मानव जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा एक गंभीर सामाजिक प्रश्न है। उन्होंने तय किया कि ऐसा समाधान विकसित किया जाए जिसे ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी आसानी से अपना सकें।

माइक्रोप्लास्टिक : दुनिया के सामने बढ़ता अदृश्य खतरा

आज प्लास्टिक पृथ्वी के लगभग हर कोने में पहुंच चुका है। समय के साथ यही प्लास्टिक टूटकर अत्यंत छोटे-छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। इनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है। ये प्लास्टिक की बोतलों, पैकेजिंग सामग्री, सिंथेटिक कपड़ों, टायरों, औद्योगिक कचरे और घरेलू प्लास्टिक उत्पादों से उत्पन्न होते हैं।

हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इन्हें केवल नदियों, समुद्रों और झीलों में ही नहीं बल्कि पीने के पानी, बोतलबंद पानी, समुद्री भोजन, नमक, मानव रक्त, फेफड़ों, प्लेसेंटा और यहां तक कि मस्तिष्क के ऊतकों तक में पाया है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ माइक्रोप्लास्टिक को भविष्य की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों में से एक मान रहे हैं।

दुनिया में अब भी अरबों लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित

संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ की रिपोर्टों के अनुसार आज भी दुनिया में लगभग 2.1 अरब लोग सुरक्षित पेयजल की नियमित सुविधा से वंचित हैं। भारत सहित अनेक देशों में आज भी लाखों परिवार तालाबों, झरनों, खुले कुओं और असुरक्षित जल स्रोतों पर निर्भर हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों को प्रतिदिन कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों में महंगे फिल्टर और अत्याधुनिक जल शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित करना व्यावहारिक नहीं है। यही वह चुनौती थी, जिसका समाधान खोजने के लिए इन तीन छात्रों ने काम शुरू किया।

क्या है ‘प्लास-स्टिक’ और कैसे करता है काम ?

प्लास-स्टिक इमली के फेंके जाने वाले बीजों से तैयार किया गया एक विशेष बायोडिग्रेडेबल चुंबकीय पाउडर है। इस परियोजना को विकसित करने और वैज्ञानिक रूप से परखने में आईआईटी गुवाहाटी के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

इस तकनीक की कार्यप्रणाली अत्यंत सरल है। दूषित पानी में इस पाउडर को मिलाकर कुछ समय तक हिलाया जाता है। लगभग 30 मिनट के भीतर पानी में मौजूद सूक्ष्म माइक्रोप्लास्टिक कण इस पाउडर से चिपककर बड़े-बड़े गुच्छों में बदल जाते हैं। इसके बाद एक साधारण हाथ में पकड़े जाने वाले चुंबक की सहायता से इन गुच्छों को आसानी से पानी से अलग किया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में न बिजली की आवश्यकता होती है, न महंगे फिल्टर की और न ही किसी हानिकारक रसायन की।

इमली के बीज क्यों चुने गए ?

तीनों छात्रों ने शुरुआत से ही यह तय कर लिया था कि समाधान ऐसा होना चाहिए जो कम लागत वाला, आसानी से उपलब्ध और पर्यावरण के अनुकूल हो। शोध के दौरान उनका ध्यान इमली के बीजों पर गया, जिन्हें सामान्यतः बेकार समझकर फेंक दिया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया कि इन बीजों में प्राकृतिक पॉलीसैकराइड और चिपकने वाले जैविक यौगिक मौजूद होते हैं, जो माइक्रोप्लास्टिक कणों को एक-दूसरे से जोड़कर बड़े समूहों में बदल देते हैं। इस कारण उन्हें पानी से अलग करना बेहद आसान हो जाता है। यह तकनीक कृषि अपशिष्ट के उपयोग का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है।

असफलताओं से सीखते हुए मिली सफलता

आज प्लास-स्टिक जितना सरल दिखाई देता है, उसे विकसित करना उतना आसान नहीं था। तीनों छात्रों ने लगभग तीन से चार महीने तक लगातार प्रयोग किए। अनेक बार परीक्षण असफल रहे, रासायनिक अनुपात बदले गए, पाउडर की संरचना में संशोधन किया गया और बार-बार परिणामों का विश्लेषण किया गया। हर असफल प्रयोग ने उन्हें नई सीख दी और अंततः यही प्रयास इस वैश्विक उपलब्धि में बदल गया।

एक ईमेल से खुला आईआईटी गुवाहाटी तक का रास्ता

परियोजना के दौरान तीनों छात्रों ने बिना किसी व्यक्तिगत परिचय के एक मैटेरियल साइंटिस्ट और आईआईटी स्नातक को ईमेल भेजकर मार्गदर्शन मांगा। उनकी पहल सफल रही और उन्हें विशेषज्ञों का सहयोग मिला। बाद में यह सहयोग आईआईटी गुवाहाटी के उद्गम इनक्यूबेशन सेंटर तक पहुंचा, जिसने प्लास-स्टिक परियोजना को औपचारिक समर्थन और वैज्ञानिक मान्यता प्रदान की। यही सहयोग इस परियोजना को प्रयोगशाला स्तर से आगे ले जाने में निर्णायक साबित हुआ।

राजस्थान के गांवों से शुरू हुआ जनजागरूकता अभियान

तीनों छात्रों ने अपनी खोज को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने राजस्थान के महापुरा, झुंझुनूं और चूरू जिलों के विद्यालयों में जाकर विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच जागरूकता अभियान चलाया। अब तक वे लगभग 8,000 विद्यार्थियों और शिक्षकों तक पहुंच चुके हैं। स्कूलों में उन्होंने पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लाइव प्रदर्शन के माध्यम से दिखाया और समझाया कि प्लास-स्टिक कैसे काम करता है। स्थानीय समुदायों का विश्वास जीतने के लिए उन्होंने अभिभावकों और शिक्षकों के साथ विशेष संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किए।

स्थानीय प्रशासन के सहयोग से बढ़ा अभियान

छात्रों के अनुसार परियोजना को गति तब मिली जब झुंझुनूं के जिला कलेक्टर और चूरू के शिक्षा मंत्री ने इस पहल का समर्थन किया। प्रशासनिक सहयोग मिलने के बाद अनेक विद्यालयों ने स्वयं उन्हें आमंत्रित करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे एक विद्यालय दूसरे विद्यालय के लिए प्रेरणा बनता गया और यह अभियान स्वतः विस्तार पाता गया।

‘द अर्थ प्राइज’ क्या है ?

द अर्थ प्राइज दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरणीय नवाचार प्रतियोगिताओं में से एक है। इसे 13 से 19 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के लिए आयोजित किया जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 2019 में स्विट्जरलैंड के जिनेवा स्थित द अर्थ फाउंडेशन ने की थी। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य युवाओं को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से जुड़े व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। विजेताओं को वैश्विक स्तर पर विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, तकनीकी सहायता और कुल 100,000 अमेरिकी डॉलर की सहायता राशि उपलब्ध कराई जाती है।

भारत ने पहली बार जीता वैश्विक खिताब

वर्ष 2026 में भारतीय टीम पहले एशिया क्षेत्र की विजेता बनी। इसके लिए उन्हें 12,500 अमेरिकी डॉलर की प्रारंभिक सहायता राशि प्रदान की गई। इसके बाद विश्वभर के सात क्षेत्रीय विजेताओं के बीच हुए सार्वजनिक मतदान में लगभग 23 हजार लोगों ने मतदान किया और भारतीय टीम को ग्लोबल विजेता चुना। यह पहली बार है जब भारत की किसी टीम ने द अर्थ प्राइज का वैश्विक खिताब अपने नाम किया है।

पुरस्कार राशि से होगा परियोजना का विस्तार

तीनों छात्रों ने बताया कि पुरस्कार राशि का उपयोग स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण, स्थानीय उत्पादन केंद्र स्थापित करने, प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने, चुंबक और अन्य उपकरण उपलब्ध कराने, बहुभाषी निर्देश पुस्तिकाएं तैयार करने तथा माइक्रोप्लास्टिक के सुरक्षित पुनर्चक्रण पर किया जाएगा। उनका लक्ष्य वर्ष 2026 के अंत तक इस परियोजना का लाभ लेने वाले लोगों की संख्या 8,000 से बढ़ाकर लगभग 40,000 तक पहुंचाना है।

निकाले गए माइक्रोप्लास्टिक का भी होगा उपयोग

प्लास-स्टिक तकनीक केवल माइक्रोप्लास्टिक हटाने तक सीमित नहीं है। निकाले गए माइक्रोप्लास्टिक को फेंकने के बजाय उसे पुनर्चक्रित कर कंपोजिट टाइल, कोस्टर और अन्य उपयोगी उत्पादों में बदलने की योजना बनाई गई है। इस प्रकार यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक समग्र समाधान प्रस्तुत करती है।

भविष्य के सपने और सामाजिक सोच

अव्याना मेहता पर्यावरण नीति और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करना चाहती हैं। विवान छावछारिया अर्थशास्त्र, वित्त और सतत विकास के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने का सपना देखते हैं। वहीं एरियाना अग्रवाल ग्रीन फाइनेंस और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कार्य करना चाहती हैं, ताकि पर्यावरणीय परियोजनाओं को वित्तीय मजबूती मिल सके।

दुनिया के लिए प्रेरणा बने भारतीय किशोर

द अर्थ फाउंडेशन के संस्थापक पीटर मैकगैरी ने कहा कि प्लास-स्टिक ठीक वैसा ही नवाचार है, जिसके लिए द अर्थ प्राइज की स्थापना की गई थी। उनके अनुसार यह परियोजना साबित करती है कि यदि युवाओं को सही दिशा, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और अवसर मिले तो वे वैश्विक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोज सकते हैं।

अव्याना, एरियाना और विवान की यह उपलब्धि केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा भी है। इमली के बेकार समझे जाने वाले बीजों से शुरू हुई यह यात्रा आज दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल की नई उम्मीद बन चुकी है।

यह कहानी बताती है कि परिवर्तन की शुरुआत किसी बड़ी प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच, दृढ़ संकल्प और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना से होती है। भारत के इन तीन किशोरों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति और नवाचार का संगम हो तो छोटी-सी पहल भी वैश्विक परिवर्तन का आधार बन सकती है।

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