जान जोखिम में डालकर सांपों को बचा रहे शिवसागर के ‘सर्पबंधु’ बलबिंदर सिंह : दो दशकों में 5 से 6 हजार सांपों के रेस्क्यू का दावा—बिना पारिश्रमिक प्रकृति संरक्षण में जुटे 40 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री : अपने समय और खर्च पर करते हैं रेस्क्यू व सुरक्षित पुनर्वास—पिछले 24 घंटे में घरों से बचाए पांच विषैले-अविषैले सांप : वन विभाग की मौजूदगी में पानी दिहिंग पक्षी अभयारण्य में किया मुक्त—सांप को मारने के बजाय प्रशिक्षित रेस्क्यूकर्ता को सूचना देने की अपील
‘सांप दिखे तो सुरक्षित दूरी से तस्वीर रखें, पहचान से उपचार में मिल सकती है मदद’—सरकार अथवा वन विभाग से अब तक सहायता नहीं मिलने की कही बात

शिवसागर, 30 सितंबर : सांप का नाम सुनते ही जहां अधिकांश लोगों के मन में भय पैदा हो जाता है, वहीं शिवसागर के 40 वर्षीय बलबिंदर सिंह पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से विषैले और अविषैले सांपों को सुरक्षित बचाकर प्राकृतिक आवास तक पहुंचाने के काम में जुटे हैं। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री बलबिंदर बिना किसी पारिश्रमिक के अपने समय और खर्च पर सर्प रेस्क्यू करते हैं। उनका दावा है कि इस लंबे सफर में वे विभिन्न प्रजातियों के करीब पांच से छह हजार सांपों को सुरक्षित रेस्क्यू कर चुके हैं।

प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति समर्पण ने दिलाई ‘सर्पबंधु’ की पहचान
प्रचार से दूर रहकर वर्षों से सर्प संरक्षण में जुटे बलबिंदर सिंह को स्थानीय स्तर पर अब ‘सर्पबंधु’ के नाम से भी जाना जाता है। बलबिंदर के मुताबिक, तेजपुर के सर्पबंधु सौरभ बोरकटकी की टीम ने उन्हें ‘सर्पबंधु’ की उपाधि दी थी और इसके बाद यह नाम धीरे-धीरे उनकी पहचान से जुड़ गया। उनके लिए सर्प रेस्क्यू आय का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है।
24 घंटे में पांच सांपों का रेस्क्यू—तीन विषैले, दो अविषैले
बलबिंदर सिंह ने पिछले 24 घंटों के दौरान शिवसागर के अलग-अलग इलाकों में स्थित आवासीय परिसरों से पांच सांपों को सुरक्षित रेस्क्यू किया। उनके अनुसार इनमें तीन विषैले और दो अविषैले सांप शामिल थे। आवासीय इलाकों से निकालने के बाद सांपों को आसपास कहीं छोड़ने के बजाय उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र तक पहुंचाया गया।
रेस्क्यू किए गए सभी पांच सांपों को दिसांगमुख के समीप स्थित पानी दिहिंग पक्षी अभयारण्य ले जाया गया, जहां शिवसागर वन विभाग की एक टीम की मौजूदगी में वन्यजीव संबंधी निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्हें प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रूप से मुक्त किया गया।

‘मेकुरी सोकुवा’ और दो ‘चकोरी फेटी’ समेत पांच सांप बचाए
बलबिंदर सिंह के अनुसार, रेस्क्यू किए गए तीन विषैले सांपों में एक ऐसा सांप था जिसे स्थानीय असमिया भाषा में ‘मेकुरी सोकुवा’ और अंग्रेजी में ‘Thai Cave Snake’ बताया गया, जबकि दो अत्यंत विषैले ‘चकोरी फेटी’ सांप थे, जिन्हें अंग्रेजी में ‘Monocled Cobra’ कहा जाता है।
इसके अलावा दो अविषैले सांपों को भी सुरक्षित बचाया गया। इनमें एक ‘धुंधुली गुम’ था, जिसे बलबिंदर ने अंग्रेजी में ‘Copper-headed Trinket Snake’ बताया, जबकि दूसरे ‘मुसूरा गुम’ को उन्होंने ‘Indian Red Snake’ बताया। सभी सांपों को वन विभाग की टीम की मौजूदगी में सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र में मुक्त किया गया।
‘सांप पकड़कर कहीं भी नहीं छोड़ते, सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र तक पहुंचाना जरूरी’
सर्प रेस्क्यू को लेकर लोगों में मौजूद एक धारणा पर बलबिंदर सिंह ने कहा कि कई लोग मानते हैं कि रेस्क्यू करने वाले सांपों को पकड़ने के बाद कहीं भी ले जाकर छोड़ देते हैं, जबकि उनके मामले में ऐसा नहीं है। उनका कहना है कि आबादी वाले इलाके से सांप को सुरक्षित निकालने के बाद उसे उपयुक्त प्राकृतिक एवं वन क्षेत्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
बलबिंदर के मुताबिक, इसके लिए कई बार उन्हें काफी दूर तक जाना पड़ता है। इसमें उनका समय लगता है और परिवहन समेत अन्य खर्च भी उन्हें स्वयं वहन करना पड़ता है। इसके बावजूद वे सांपों को आबादी वाले इलाके के आसपास छोड़ने के बजाय उपयुक्त प्राकृतिक क्षेत्र तक ले जाने को प्राथमिकता देते हैं। उनका उद्देश्य इंसान और सांप—दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

सर्पदंश में पहचान हो सकती है महत्वपूर्ण—सुरक्षित दूरी से तस्वीर लेने की सलाह
बलबिंदर सिंह ने सर्पदंश के मामलों में सांप की सही पहचान को महत्वपूर्ण बताते हुए लोगों से जागरूक रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि परिस्थितियां पूरी तरह सुरक्षित हों और बिना सांप के करीब गए संभव हो, तो दूर से उसकी तस्वीर ली जा सकती है। विशेष रूप से सर्पदंश की स्थिति में ऐसी तस्वीर चिकित्सकों अथवा विशेषज्ञों को सांप की प्रजाति की पहचान करने में मदद कर सकती है।
उन्होंने कहा कि सही पहचान से उपचार संबंधी निर्णय लेने में सुविधा हो सकती है और गलत पहचान की आशंका कम की जा सकती है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्पदंश की स्थिति में तस्वीर लेने के लिए सांप के करीब जाने, उसे पकड़ने या मारने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। प्राथमिकता पीड़ित व्यक्ति को बिना देरी उचित चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने की होनी चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री की नौकरी के साथ दो दशकों से जारी नि:शुल्क सेवा
पेशे से इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री बलबिंदर सिंह के लिए सर्प रेस्क्यू कोई व्यावसायिक काम नहीं है। उनका कहना है कि वे करीब दो दशकों से अधिक समय से बिना किसी पारिश्रमिक के इस काम में लगे हैं। सांप निकलने की सूचना मिलने पर वे अपने नियमित काम से समय निकालकर मौके पर पहुंचते हैं और सुरक्षित रेस्क्यू के बाद उसे प्राकृतिक आवास तक पहुंचाने का खर्च भी स्वयं उठाते हैं।
उनका दावा है कि इस अवधि में उन्होंने करीब पांच से छह हजार विभिन्न प्रजातियों के विषैले और अविषैले सांपों का रेस्क्यू किया है। बलबिंदर के मुताबिक, उनके लिए यह कार्य कमाई का जरिया नहीं, बल्कि प्रकृति और वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का हिस्सा है।

‘दो दशक की सेवा के बावजूद सरकारी सहायता नहीं’
बलबिंदर सिंह का कहना है कि इतने वर्षों से सर्प रेस्क्यू और संरक्षण का काम करने के बावजूद उन्हें अब तक वन विभाग अथवा सरकार की ओर से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता या औपचारिक सहयोग नहीं मिला है। इसके बावजूद वे अपने संसाधनों, समय और खर्च पर सांपों का रेस्क्यू तथा उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र में मुक्त करने का काम जारी रखे हुए हैं।
सांप दिखे तो मारें नहीं—सुरक्षित दूरी बनाकर विशेषज्ञ को दें सूचना
आवासीय इलाकों में सांप निकलने की घटनाओं के बीच बलबिंदर सिंह का प्रयास मानव-सर्प संघर्ष को कम करने पर केंद्रित है। उनका संदेश है कि घर या आसपास सांप दिखाई देने पर घबराकर उसे मारने या स्वयं पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोगों को सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए प्रशिक्षित सर्प रेस्क्यूकर्ता अथवा संबंधित विभाग को इसकी सूचना देनी चाहिए।
पिछले 24 घंटों में पांच सांपों को सुरक्षित बचाकर पानी दिहिंग पक्षी अभयारण्य में मुक्त करने की उनकी पहल इसी अभियान की एक और कड़ी है। करीब दो दशकों से बिना पारिश्रमिक हजारों सांपों को बचाने का दावा करने वाले शिवसागर के ‘सर्पबंधु’ बलबिंदर सिंह की यह मुहिम सांपों के संरक्षण के साथ-साथ लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने और मानव-सर्प संघर्ष को कम करने की दिशा में लगातार जारी है।




