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राजस्थानी लोकसंगीत के सजग प्रहरी के.सी. मालू का निधन : ‘वीणा’ के स्वर-साधक ने दुनिया को सुनाई राजस्थान की आत्मा : 80 वर्ष की आयु में दिल्ली में हृदय गति रुकने से ली अंतिम सांस : पांच हजार से अधिक लोकगीतों के संरक्षण, 221 विवाह गीतों के दुर्लभ संग्रह और ‘घूमर’, ‘चीरमी’ व ‘कांगसियो’ जैसे कालजयी प्रस्तुतियों से रचा सांस्कृतिक इतिहास

न्यूज डेस्क, 14 जुलाई : राजस्थानी लोकसंगीत, लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक माध्यमों के सहारे देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले विख्यात संगीत संरक्षक, निर्माता तथा वीणा म्यूजिक एवं वीणा कैसेट्स के संस्थापक केशरी चंद ‘के.सी.’ मालू का निधन हो गया। वे लगभग 80 वर्ष के थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सोमवार देर रात दिल्ली में हृदय गति रुकने से उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही राजस्थान सहित देश-विदेश में बसे राजस्थानी और मारवाड़ी समाज, लोक कलाकारों, संगीत प्रेमियों तथा सांस्कृतिक संस्थाओं में शोक की लहर दौड़ गई।

उनकी अंतिम यात्रा मंगलवार अपराह्न करीब 4:30 बजे जयपुर के निर्माण नगर स्थित पार्श्वनाथ कॉलोनी में उनके निवास से पुरानी चुंगी, अजमेर रोड स्थित मोक्षधाम के लिए निर्धारित की गई। उनके निधन को केवल एक संगीत निर्माता की विदाई नहीं, बल्कि राजस्थान की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अवसान माना जा रहा है।

सुजानगढ़ की धरती से निकला लोकसंस्कृति का समर्पित साधक

केशरी चंद मालू का जन्म वर्ष 1946 में चूरू जिले के सुजानगढ़ में हुआ था। सुजानगढ़ की लोकपरंपराओं, मरुधरा की धुनों और मारवाड़ी भाषा की आत्मीयता ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के साथ साहित्य और जैन दर्शन का भी अध्ययन किया। शिक्षा, साहित्यिक रुचि और लोकजीवन से मिली सांस्कृतिक दृष्टि ने आगे चलकर उनके संगीत अभियान को व्यापक बौद्धिक आधार दिया।

मालू का मानना था कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, पारिवारिक संस्कार, उत्सव, पीड़ा, प्रेम, अध्यात्म और सामूहिक स्मृतियों के जीवित दस्तावेज होते हैं। यही कारण था कि उन्होंने व्यावसायिक संगीत की चमक-दमक के बीच राजस्थानी लोकधुनों की मौलिकता और गरिमा को सुरक्षित रखने को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया।

1987 में ‘वीणा’ की स्थापना, कैसेट युग से डिजिटल दुनिया तक लंबी यात्रा

वर्ष 1987 में उन्होंने राजस्थान के पारंपरिक संगीत को व्यवस्थित रूप से रिकॉर्ड, संरक्षित और प्रसारित करने के उद्देश्य से वीणा म्यूजिक की स्थापना की। संस्था का औपचारिक नाम ओरिएंटल ऑडियो विजुअल इलेक्ट्रॉनिक्स रहा, लेकिन संगीत प्रेमियों के बीच वह ‘वीणा’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। बाद में यह संस्था राजस्थानी लोक एवं भक्ति संगीत की सबसे प्रतिष्ठित प्रस्तुतियों में शामिल हो गई।

उस दौर में जब लोक कलाकारों की आवाज अक्सर गांवों, मेलों, विवाह समारोहों और सीमित मंचों तक ही रह जाती थी, मालू ने कैसेट, ऑडियो-वीडियो एल्बम, सीडी, मंचीय कार्यक्रम और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से उन्हें व्यापक श्रोतावर्ग तक पहुंचाया। उन्होंने पारंपरिक स्वरूप का सम्मान करते हुए लोकगीतों को आधुनिक रिकॉर्डिंग तकनीक से जोड़ा। इसी सांस्कृतिक सेतु के कारण राजस्थानी संगीत राजस्थान की सीमाओं से निकलकर भारत के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में बसे प्रवासी समाज तक पहुंचा।

पांच हजार से अधिक लोकगीतों को सहेजने का विराट अभियान

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में राजस्थान के पांच हजार से अधिक लोकगीतों को संरक्षित करने का कार्य शामिल है। यह प्रयास बड़े पैमाने पर बिना प्रत्यक्ष सरकारी सहायता के किया गया। इन प्रस्तुतियों में विवाह, तीज-त्योहार, गणगौर, घूमर, पनिहारी, विरह, श्रृंगार, वीरता, भक्ति और पारिवारिक संस्कारों से जुड़े गीत शामिल रहे।

लोकधुनों को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया में उन्होंने केवल लोकप्रिय गीतों को प्राथमिकता नहीं दी, बल्कि दूरदराज क्षेत्रों में प्रचलित उन धुनों, बोलियों और गीत-शैलियों को भी सामने लाने का प्रयास किया, जिनके विलुप्त होने का खतरा था। इस कार्य ने कई लोक कलाकारों को पहचान, सम्मान और आजीविका का मंच दिया।

‘घूमर’, ‘चीरमी’ और ‘कांगसियो’ ने बनाई वैश्विक पहचान

के.सी. मालू द्वारा निर्मित और प्रस्तुत ‘घूमर’, ‘चीरमी’ तथा ‘कांगसियो’ जैसे अनेक राजस्थानी संगीत एल्बम अत्यंत लोकप्रिय हुए। ‘घूमर’ श्रृंखला को विशेष रूप से व्यापक सफलता मिली और उसने राजस्थान के पारंपरिक घूमर नृत्य और संगीत को नई पीढ़ी तथा राष्ट्रीय दर्शकों के बीच स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘पल्लो लटके’, ‘म्हारी बहू ऐ’, ‘गोरबंद’, ‘बालम छोटो सो’, ‘कुएं पर एकली’ और ‘चूड़ी चमके’ जैसी प्रस्तुतियों को भी ‘वीणा’ के सांस्कृतिक संसार से व्यापक पहचान मिली। इनमें से कुछ लोकगीत बाद में लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों तक पहुंचे, जिससे राजस्थानी संगीत का प्रभाव राष्ट्रीय मनोरंजन जगत में और अधिक विस्तृत हुआ।

सीमा मिश्रा सहित अनेक कलाकारों को दिया सशक्त मंच

वीणा म्यूजिक के माध्यम से मालू ने अनेक लोक कलाकारों और गायकों को मंच प्रदान किया। विशेष रूप से प्रसिद्ध राजस्थानी गायिका सीमा मिश्रा को व्यापक पहचान दिलाने में संस्था की भूमिका उल्लेखनीय रही। वीणा से जुड़े संगीत कार्यों में लोक कलाकारों के साथ-साथ श्रेया घोषाल, कविता कृष्णमूर्ति, उदित नारायण, साधना सरगम और सुनिधि चौहान जैसे राष्ट्रीय स्तर के गायकों की भागीदारी भी रही।

उनकी कार्यशैली की विशेषता यह थी कि वे संगीत को केवल बाजार की वस्तु नहीं मानते थे। वे गीत के शब्द, बोली की शुद्धता, पारंपरिक धुन, वेशभूषा, नृत्य और दृश्य प्रस्तुति तक पर बारीकी से ध्यान देते थे। इसी कारण उनकी प्रस्तुतियों में लोकजीवन की प्रामाणिकता दिखाई देती थी।

221 विवाह गीतों का विश्वस्तरीय सांस्कृतिक दस्तावेज

के.सी. मालू ने राजस्थान की विवाह परंपराओं को सहेजने के लिए 221 राजस्थानी विवाह गीतों का विशाल संग्रह तैयार कराया। इसे दो ग्रंथों में प्रकाशित किया गया, जिनमें राजस्थानी के साथ हिंदी और अंग्रेजी भाषा का भी प्रयोग किया गया। इस संग्रह को चित्रों और सांस्कृतिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया गया तथा इससे जुड़ी 24 ऑडियो-वीडियो सीडी भी जारी की गईं। इसे विवाह गीतों के सबसे बड़े व्यवस्थित संकलनों में से एक माना गया।

इस परियोजना ने बन्ना-बन्नी, मायरा, विदाई, तोरण, मेहंदी और अन्य विवाह संस्कारों से जुड़े गीतों को दस्तावेजी रूप दिया। बदलती सामाजिक जीवनशैली और पारिवारिक परंपराओं के क्षरण के बीच यह कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभिलेख बन गया।

‘सुर संगम’ के माध्यम से शास्त्रीय और लोकसंगीत को प्रोत्साहन

मालू ने ‘सुर संगम’ नामक संस्था की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके माध्यम से संगीत प्रतिभाओं को मंच देने, भारतीय संगीत परंपरा को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक आयोजनों का वातावरण तैयार करने का प्रयास किया गया। संगीतकार नौशाद सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ उनके जुड़ाव का उल्लेख मिलता है।

उनकी दृष्टि लोक और शास्त्रीय संगीत को परस्पर विरोधी धाराओं के रूप में देखने की नहीं थी। वे दोनों को भारतीय सांस्कृतिक चेतना की पूरक अभिव्यक्तियां मानते थे। इसी सोच के तहत उन्होंने नई प्रतिभाओं और पारंपरिक कलाकारों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया।

अकाल पीड़ितों के लिए लता मंगेशकर नाइट से जुटाए एक करोड़ रुपये

संगीत को सामाजिक सेवा से जोड़ना भी के.सी. मालू की कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा था। वर्ष 1987 में राजस्थान के अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए जयपुर में लता मंगेशकर नाइट का आयोजन किया गया, जिसके माध्यम से करीब एक करोड़ रुपये की सहायता राशि जुटाई गई थी। उस समय यह आयोजन सांस्कृतिक जगत द्वारा मानवीय सहयोग की एक बड़ी मिसाल माना गया।

इस आयोजन ने यह प्रमाणित किया कि उनके लिए संगीत केवल कला का माध्यम नहीं, बल्कि संकट के समय समाज को जोड़ने और मानवीय संवेदना को सक्रिय करने की शक्ति भी था।

राजस्थान रत्न सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत

राजस्थानी भाषा, संगीत और संस्कृति के संरक्षण में असाधारण योगदान के लिए उन्हें राजस्थान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘राजस्थान रत्न’ सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें समग्र कला साधना सम्मान प्रदान किया, जबकि महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन की ओर से उन्हें डागर घराना पुरस्कार दिया गया।

इन सम्मानों से परे उनकी वास्तविक उपलब्धि वह सांस्कृतिक पूंजी थी, जिसे उन्होंने लाखों श्रोताओं और सैकड़ों कलाकारों के बीच निर्मित किया। कैसेट युग से लेकर डिजिटल स्ट्रीमिंग के दौर तक वीणा का संगीत सुनने वाली कई पीढ़ियां उनकी साधना की साक्षी हैं।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बताया कला जगत की अपूरणीय क्षति

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने के.सी. मालू के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने राजस्थानी लोकसंगीत और संस्कृति को नई पहचान दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया। मुख्यमंत्री ने उनके योगदान को अविस्मरणीय बताते हुए निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति करार दिया।

अशोक गहलोत बोले—पिछले सप्ताह ही हुई थी लंबी मुलाकात

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन्हें अपना पारिवारिक मित्र बताते हुए कहा कि पिछले सप्ताह ही जयपुर स्थित उनके आवास पर मालू से मुलाकात और लंबी बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि मालू ने अपना पूरा जीवन संगीत जगत को समर्पित किया और उनका आकस्मिक निधन सभी के लिए बड़ी क्षति है।

गहलोत ने दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिजनों को यह दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।

पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन ने अर्पित की श्रद्धांजलि

के.सी. मालू के निधन पर पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन परिवार ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी पावन स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। सम्मेलन के प्रांतीय अध्यक्ष कैलाश काबरा एवं महामंत्री रमेश चांडक ने कहा कि वीणा कैसेट के माध्यम से उन्होंने राजस्थानी लोकगीतों, भजनों और सांस्कृतिक विरासत को देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुंचाकर राजस्थान की लोकसंस्कृति को नई पहचान दिलाई।

संगठन ने कहा कि कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में उनका अतुलनीय योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। परमपिता परमेश्वर से दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देने तथा शोकाकुल परिजनों और असंख्य प्रशंसकों को यह अपार दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की गई।

‘वे मौन हुए, लेकिन संस्कारों की लहर बनी रहेगी’

श्रद्धांजलि संदेश में मालू को लोकभाषा और लोककला के शब्दों की मार्मिकता तथा रूमानियत को शिखर तक पहुंचाने वाला पथिक बताया गया। कहा गया कि वे आज भले ही संसार में मौन हो गए हों, लेकिन उनके द्वारा प्रवाहित अखंड सांस्कृतिक और संस्कारी लहरों की अमिट विरासत लोकजीवन के महासागर में सदैव विद्यमान रहेगी।

उनकी प्रस्तुतियों में राजस्थान की मिट्टी की सुगंध, पनघट की आहट, विवाह गीतों की आत्मीयता, मरुभूमि का विरह, लोकदेवताओं के प्रति आस्था और नारी मन की भावनाएं जिस प्रकार अभिव्यक्त हुईं, उसने राजस्थानी संगीत को भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई प्रदान की।

राज चौधरी ने कहा—पूर्वोत्तर में भव्य सांस्कृतिक आयोजन की थी योजना

पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी युवा मंच के प्रांतीय अध्यक्ष राज चौधरी ने कहा कि के.सी. मालू के निधन का समाचार केवल मारवाड़ी समाज के लिए नहीं, बल्कि लोकसंगीत, लोकनृत्य और भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है।

उन्होंने बताया कि कुछ माह पूर्व ही उनकी के.सी. मालू से मुलाकात हुई थी और उन्हें पूर्वोत्तर भारत आने का आमंत्रण दिया गया था। प्रस्तावित कार्यक्रम का उद्देश्य लोकसंस्कृति, मारवाड़ी भाषा और राजस्थानी सांस्कृतिक विरासत पर एक भव्य आयोजन करना था। राज चौधरी ने कहा कि मालू के अनुभव, समर्पण और सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्वोत्तर के समाज और युवा पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलता, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

उन्होंने कहा कि के.सी. मालू ने लोककलाओं को केवल संरक्षित नहीं किया, बल्कि उन्हें नए दौर के अनुरूप प्रस्तुत कर युवाओं और प्रवासी समाज से जोड़ा। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक व्यक्ति की दूरदृष्टि और समर्पण पूरे समाज की सांस्कृतिक दिशा बदल सकता है।

मंगलवार को जयपुर में निकलेगी अंतिम यात्रा

स्वर्गीय केशरी चंद मालू की अंतिम यात्रा मंगलवार, 14 जुलाई 2026 को अपराह्न 4:30 बजे जयपुर स्थित उनके निवास ‘मालू हाउस’, 18-19 शांतिनाथ, पार्श्वनाथ कॉलोनी, निर्माण नगर, अजमेर रोड से प्रारंभ होकर पुरानी चुंगी मोक्षधाम पहुंचेगी, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके शोकाकुल परिवार में भाई निर्मल कुमार मालू (अधिवक्ता) तथा पुत्र हेमजीत मालू, प्रसन्नजीत मालू, अजित मालू और अभिषेक मालू सहित अन्य परिजन शामिल हैं। परिवार ने उनके शुभचिंतकों, संगीत प्रेमियों और समाजबंधुओं से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का आग्रह किया है।

एक व्यक्ति नहीं, जीवंत सांस्कृतिक संस्थान थे के.सी. मालू

के.सी. मालू की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने आधुनिकता और परंपरा के बीच संवाद स्थापित किया। वे जानते थे कि लोकसंगीत को जीवित रखना है तो उसे संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं, बल्कि नई तकनीक, नए कलाकारों और नए श्रोताओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना होगा।

उन्होंने कैसेट से शुरू हुई यात्रा को सीडी, टेलीविजन, मंचीय प्रस्तुतियों और डिजिटल माध्यमों तक पहुंचते देखा और हर दौर में राजस्थानी संगीत की मूल आत्मा को केंद्र में रखा। उनके निधन से एक युग का अंत अवश्य हुआ है, लेकिन उनके द्वारा रिकॉर्ड और संरक्षित हजारों गीत, प्रकाशित ग्रंथ, मंच प्राप्त करने वाले कलाकार और ‘वीणा’ से जुड़ी करोड़ों स्मृतियां उनकी सांस्कृतिक उपस्थिति को जीवित रखेंगी।

राजस्थानी लोकधुनों का यह सजग प्रहरी आज भले ही मौन हो गया हो, लेकिन उसके द्वारा संसार को सुनाई गई मरुधरा की आवाज आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।

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