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साधारण जीवनशैली का असाधारण इंसान था शिवसागर का ‘कांछा दा’ : इंसानियत की मिसाल बना शिवसागर, जाति-धर्म से ऊपर उठकर लोगों ने दी अपने प्रिय ‘कांचा दा’ को अंतिम श्रद्धांजलि

शिवसागर, 24 मई : असम के ऐतिहासिक शहर शिवसागर में एक बार फिर इंसानियत, अपनापन और सामाजिक एकता की ऐसी मिसाल देखने को मिली, जिसने यह साबित कर दिया कि खून के रिश्तों से कहीं बड़ा रिश्ता मानवता का होता है।

शहर के हर वर्ग, हर समुदाय और हर उम्र के लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं, जब शिवसागर की पहचान बन चुके “कांछा दा” इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए।

सुदर्शन छेत्री, जिन्हें पूरा शिवसागर प्यार से “कांछा दा” के नाम से जानता था, किसी बड़े मंच के सितारे या चर्चित हस्ती नहीं थे। फिर भी वे शहर के हजारों लोगों के दिलों में अपनी अलग जगह रखते थे। उनकी सादगी, मुस्कान और अपनापन ही उनकी असली पहचान थी।

बताया जाता है कि “कांछा दा” ने अपने जीवन का लंबा समय शिवसागर शहर के नाट्यमंदिर के सामने सड़क किनारे एक छोटी सी दुकान के सहारे बिताया। साधारण जीवन जीने वाले “कांछा दा” का दिन लोगों से बातचीत, हंसी-मजाक और अपनत्व बांटते हुए गुजरता था। धीरे-धीरे वे केवल एक दुकानदार नहीं, बल्कि शहर की भावनाओं का हिस्सा बन गए थे।

बीते 15 मई को शिवसागर सिविल अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई। जिन लोगों ने उन्हें वर्षों तक रोज देखा था, उनके लिए यह खबर किसी अपने के बिछड़ने से कम नहीं थी। उनकी मृत्यु के बाद शिवसागर में जो दृश्य देखने को मिला, वह सामाजिक एकता और मानवीय संवेदना की अनोखी तस्वीर बन गया।

जाति, धर्म, भाषा और समुदाय से ऊपर उठकर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए और एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अंतिम विदाई दी गई। शिवसागर के थाना घाट स्थित शांतिवन मुक्तिद्वार श्मशान घाट में उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

रविवार को भी उनकी मृत्यु के दशवें दिन एक अनूठी मिसाल कायम करते हुए शहर के जाति, धर्म, भाषा और समुदाय के जागरूक लोगों द्वारा धार्मिक रीति नीति नियम का पालन करते हुए श्रद्धापूर्वक उनके आद्यश्राद्ध कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए और शहर के बोर्डिंग रोड़ स्थित शिवसागर नाट्य मंदिर के सामने उनकी दुकान के सामने ही सुदर्शन छेत्री उर्फ “कांछा दा” की याद में एक सार्वजनिक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ।

जिसमें शहर के अनेक गणमान्य लोगों सहित बड़ी संख्या में आम नागरिकों ने हिस्सा लिया। लोगों ने “कांछा दा” की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

इस दौरान कई लोगों ने भावुक होकर उनके साथ बिताए पलों को याद किया। किसी ने कहा कि “कांछा दा” हमेशा मुस्कुराकर लोगों का स्वागत करते थे, तो किसी ने उन्हें गरीबों और जरूरतमंदों का सच्चा साथी बताया। कई लोगों ने कहा कि उन्होंने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया और हर व्यक्ति को समान स्नेह दिया।

श्रद्धांजलि सभा में ब्राजील सूतिया, प्रदीप बोरगोहांई, डॉ. उत्पल दत्त, पार्थ प्रदीप बोरा, शरत हजारिका, रातुल बरुवा, प्रवीण शर्मा, राजा बोरठाकुर, बकुल विजय सूतिया, घनश्याम गोगोई, खोकन घोष, पवित्र बोरा, दिनेश भुइयां सहित उपस्थित अनेकों गणमान्य लोगों ने कहा कि “कांछा दा” ने यह साबित कर दिया कि किसी व्यक्ति की महानता उसके धन या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और मानवता से तय होती है।

शिवसागरवासियों ने अपने प्रिय “कांछा दा” को जिस सम्मान और प्रेम के साथ विदाई दी, उसने पूरे समाज को एक गहरा संदेश दिया — इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी अच्छाइयां और लोगों के दिलों में बनाई गई जगह हमेशा जीवित रहती है।

आज “कांछा दा” भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन शिवसागर की गलियों, नाट्यमंदिर के आसपास के माहौल और लोगों की यादों में उनकी मुस्कुराती हुई छवि हमेशा जीवित रहेगी।

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