मानवता की मिसाल बने मोहनलाल शाह : खुद भूखे रहे, लेकिन 500 बाढ़ पीड़ितों का भरते रहे पेट : सोनारी राहत शिविर में अपने खर्च पर तीन समय का भोजन कराया, जनरेटर के डीजल से लेकर सेवा तक हर जिम्मेदारी निभाई
छोटे ठेले पर सिंगाड़ा-घुगनी बेचने वाले 'अजय' ने दिखाई बड़ी इंसानियत, बाढ़ पीड़ितों के लिए बने उम्मीद की किरण

न्यूज डेस्क, 23 जुलाई : प्राकृतिक आपदाएं केवल विनाश की कहानियां नहीं लिखतीं, बल्कि ऐसे साधारण लोगों को भी सामने लाती हैं जो अपने निस्वार्थ सेवा भाव से समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। ऊपरी असम के चराईदेव जिले के सोनारी नगर में जारी भीषण बाढ़ के बीच एक ऐसा ही नाम है मोहनलाल शाह, जिन्हें स्थानीय लोग प्यार से “अजय” के नाम से जानते हैं। आर्थिक रूप से साधारण जीवन जीने वाले अजय ने बाढ़ पीड़ितों की सेवा कर यह साबित कर दिया कि किसी की मदद करने के लिए धन नहीं, बल्कि बड़ा दिल होना जरूरी है।

ठेले पर सिंगाड़ा-घुगनी बेचकर चलाते हैं परिवार
मोहनलाल शाह सोनारी नगर पालिका कार्यालय के समीप एक छोटे से ठेले पर सिंगाड़ा और घुगनी बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनकी आय सीमित है और वे किसी बड़े व्यवसायी या संपन्न परिवार से नहीं हैं। इसके बावजूद जब सोनारी में बाढ़ ने सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया, तब उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना मानवता का हाथ बढ़ाया।
19 जुलाई से शुरू हुआ राहत शिविर
लगातार बारिश और बाढ़ के बाद 19 जुलाई 2026 से सोनारी नगर प्राथमिक विद्यालय में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राहत शिविर शुरू किया गया। प्रारंभिक दिन प्रशासन की ओर से शिविर में रह रहे लोगों को रात में खिचड़ी उपलब्ध कराई गई। अगले दिन यानी 20 जुलाई को दिन के समय भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से शिविर में रह रहे लोगों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया।
500 बाढ़ पीड़ितों के लिए अपने खर्च पर तैयार कराया भोजन
ऐसी स्थिति में मोहनलाल शाह आगे आए। उन्होंने अपने निजी संसाधनों और स्वयं के खर्च पर लगभग 500 बाढ़ पीड़ितों के लिए तीन समय खिचड़ी तैयार कराकर स्वयं वितरण किया। केवल भोजन ही नहीं, बल्कि खाना बनाने से लेकर वितरण तक की पूरी व्यवस्था में वे स्वयं जुटे रहे। उन्होंने किसी सरकारी सहायता या प्रचार की प्रतीक्षा नहीं की, बल्कि जरूरत को समझते हुए तत्काल सेवा का कार्य शुरू कर दिया।
जनरेटर के डीजल का खर्च भी खुद उठाया
राहत शिविर में बिजली और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए जनरेटर में लगने वाले डीजल का खर्च भी मोहनलाल शाह ने स्वयं वहन किया। शिविर में रह रहे लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए वे लगातार व्यवस्थाओं में लगे रहे। स्थानीय लोगों के अनुसार, मुख्यमंत्री के राहत शिविर के दौरे तक भी अजय लगातार शिविर में रहकर सेवा कार्य करते रहे।
‘धन से नहीं, दिल से अमीर’
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मोहनलाल शाह आर्थिक रूप से भले ही संपन्न नहीं हैं, लेकिन उनका सेवा भाव उन्हें समाज के सबसे समृद्ध लोगों की श्रेणी में खड़ा करता है। बाढ़ जैसी विकट परिस्थिति में उन्होंने जाति, धर्म, भाषा और समुदाय से ऊपर उठकर केवल इंसानियत का परिचय दिया। लोगों का कहना है कि ऐसे कार्य समाज में आपसी विश्वास और सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं।
बाढ़ के बीच राहत कार्य तेज
चराईदेव और सोनारी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ के बाद जिला प्रशासन, NDRF, SDRF, भारतीय सेना तथा अन्य एजेंसियां लगातार राहत एवं बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं। विभिन्न स्कूलों और सार्वजनिक भवनों में राहत शिविर संचालित किए जा रहे हैं, जहां प्रभावित परिवारों को भोजन, पेयजल, चिकित्सा सुविधा और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा ने भी हाल ही में सोनारी के राहत शिविरों का दौरा कर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और राहत कार्यों की समीक्षा की।
मानवता की सबसे बड़ी सीख
मोहनलाल शाह की कहानी इस बात का प्रमाण है कि समाज की सबसे बड़ी ताकत सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील नागरिक भी होते हैं जो संकट की घड़ी में बिना किसी अपेक्षा के दूसरों का सहारा बनते हैं। एक छोटे ठेले पर सिंगाड़ा-घुगनी बेचने वाला यह युवा आज सोनारी के बाढ़ पीड़ितों के लिए केवल भोजन देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि उम्मीद, संवेदना और मानवता का प्रतीक बन गया है। ऐसी निस्वार्थ सेवा यह संदेश देती है कि आपदा के समय सबसे बड़ी पहचान न धर्म होती है, न भाषा और न ही आर्थिक स्थिति—सबसे बड़ी पहचान केवल इंसानियत होती है।




