नौवीं कक्षा में नई भाषा का बोझ न डालें : सुप्रीम कोर्ट ने कहा—छठी से शुरू हो तीसरी भाषा की पढ़ाई, नौवीं तक हो पूरी : CBSE की तीन-भाषा नीति पर शीर्ष अदालत की अहम टिप्पणी : विद्यार्थियों के शैक्षणिक तनाव पर जताई चिंता
तमिलनाडु में नवोदय विद्यालय खोलने के मामले की सुनवाई 11 अगस्त तक टली

न्यूज डेस्क, 16 जुलाई : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE की तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षणिक दबाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि विद्यार्थियों को नौवीं कक्षा में अचानक कोई नई तीसरी भाषा पढ़ाना तनावपूर्ण हो सकता है। तीसरी भाषा की पढ़ाई पांचवीं या छठी कक्षा से शुरू की जानी चाहिए और नौवीं कक्षा तक इस भाषा से संबंधित निर्धारित अध्ययन पूरा हो जाना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि नौवीं कक्षा में विद्यार्थियों पर बोर्ड परीक्षा और भविष्य की पढ़ाई का दबाव बढ़ना शुरू हो जाता है, इसलिए उसी समय नई भाषा जोड़ना उचित नहीं होगा।
‘नौवीं कक्षा में नई भाषा शुरू मत कीजिए’
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान CBSE स्कूलों में तीसरी भाषा की पढ़ाई का मुद्दा उठा। इस दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि तीसरी भाषा की पढ़ाई पांचवीं या छठी कक्षा में शुरू कराई जा सकती है, लेकिन नौवीं कक्षा तक इसे पूरा कर लेना चाहिए।
पीठ ने विद्यार्थियों के दबाव का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की कि नौवीं कक्षा में नई भाषा शुरू करने से बच्चों पर अनावश्यक मानसिक और शैक्षणिक बोझ पड़ सकता है। अदालत ने केंद्र सरकार के अधिवक्ता से इस विषय पर सरकार को उचित सलाह देने को भी कहा।
नौवीं कक्षा से बढ़ जाता है परीक्षा और करियर का दबाव
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि आठवीं कक्षा के अंतिम चरण से ही विद्यार्थियों पर पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य के विषय चयन का दबाव बढ़ने लगता है। नौवीं कक्षा में उन्हें माध्यमिक स्तर के कठिन पाठ्यक्रम के साथ बोर्ड परीक्षा की तैयारी भी शुरू करनी पड़ती है। ऐसे समय में नई भाषा अनिवार्य करने से विद्यार्थियों के लिए परिस्थितियां और अधिक कठिन हो सकती हैं।
अदालत का जोर इस बात पर था कि भाषा सीखने की प्रक्रिया क्रमिक होनी चाहिए। विद्यार्थियों को कम उम्र और मध्य विद्यालय स्तर पर नई भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, न कि माध्यमिक कक्षाओं में अचानक अतिरिक्त विषय का भार डाला जाए।
यह टिप्पणी है, अभी अंतिम न्यायिक निर्देश नहीं
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की यह बात सुनवाई के दौरान व्यक्त की गई मौखिक टिप्पणी और सुझाव है। इसे अभी CBSE की नीति को रद्द करने वाला अंतिम फैसला या देशभर के स्कूलों के लिए बाध्यकारी नया आदेश नहीं माना जाना चाहिए।
CBSE की तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली अलग याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। मई 2026 में शीर्ष अदालत ने इस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर CBSE और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT से जवाब मांगा था। अदालत ने उस समय स्कूलों में शिक्षकों, पाठ्यपुस्तकों और विभिन्न भाषाओं की उपलब्धता से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी चिंता जताई थी।
क्या है CBSE की संशोधित तीन-भाषा व्यवस्था?
CBSE की 2026 की संशोधित व्यवस्था के तहत छठी से नौवीं कक्षा तक तीन भाषाओं के अध्ययन की रूपरेखा लागू करने की बात कही गई है। इनमें कम-से-कम दो भाषाएं भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। नीति को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के अनुरूप बताया गया है।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं को अनिवार्य करने की व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से लागू की गई, जिसके बाद अभिभावकों, शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के एक वर्ग ने इसके समय, पाठ्यक्रम, शिक्षक उपलब्धता और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को लेकर आपत्तियां उठाईं।
नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं याचिकाएं
CBSE की नई तीन-भाषा व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया है कि नौवीं कक्षा में तीसरी भाषा को अनिवार्य करना विद्यार्थियों के लिए अचानक और कठिन बदलाव है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि सभी स्कूलों के पास प्रत्येक प्रस्तावित भाषा के प्रशिक्षित शिक्षक, पाठ्यसामग्री और परीक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने मई में इन मुद्दों पर केंद्र, CBSE और NCERT का पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की थी। जुलाई में अदालत ने यह भी संकेत दिया कि नीति लागू नहीं करने के कारण शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति उत्पन्न हुई तो वह संरक्षण देने पर विचार कर सकती है।
नवोदय विद्यालय विवाद की सुनवाई में उठा भाषा नीति का विषय
तीसरी भाषा को लेकर यह टिप्पणी तमिलनाडु सरकार की उस याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें राज्य सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें तमिलनाडु के प्रत्येक जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने की दिशा में कदम उठाने को कहा गया था।
मद्रास हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में तमिलनाडु सरकार को राज्य के सभी जिलों में नवोदय विद्यालय स्थापित करने की अनुमति देने, उपयुक्त भूमि की पहचान करने और प्रारंभिक व्यवस्था उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी और मामला शीर्ष अदालत में लंबित रहा।
‘तमिलनाडु के विद्यार्थियों को केंद्रीय विद्यालयों से वंचित न करें’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के नवोदय विद्यालयों के प्रति विरोध पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि इन विद्यालयों के संचालन और अन्य खर्चों का वहन केंद्र सरकार करती है तथा राज्य सरकार को मुख्य रूप से भूमि उपलब्ध करानी होती है।
अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर केंद्रीय विद्यालयों का विरोध नहीं होना चाहिए कि उन्हें केंद्र सरकार संचालित करती है। पीठ ने तमिलनाडु सरकार को केंद्र के साथ बातचीत कर समाधान निकालने और राज्य के विद्यार्थियों को केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ने के अवसर से वंचित नहीं करने की सलाह दी।
भाषा विवाद न बनाने की पहले भी दी थी सलाह
दिसंबर 2025 में भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और तमिलनाडु सरकार से कहा था कि नवोदय विद्यालयों के प्रश्न को केवल भाषा विवाद के रूप में न देखा जाए। अदालत ने दोनों पक्षों से सहयोगात्मक रुख अपनाने और भूमि की आवश्यकता सहित व्यावहारिक मुद्दों पर बातचीत करने को कहा था।
तमिलनाडु में लंबे समय से दो-भाषा नीति को प्राथमिकता दी जाती रही है, जबकि नवोदय विद्यालयों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की तीन-भाषा व्यवस्था को लेकर राज्य और केंद्र के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। इसी कारण नवोदय विद्यालयों की स्थापना का मुद्दा केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित न रहकर भाषा और शैक्षणिक स्वायत्तता से भी जुड़ गया है।
तमिलनाडु सरकार ने निर्देश लेने के लिए मांगा समय
तमिलनाडु सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित विषय पर बातचीत जारी है और राज्य सरकार को अपनी आगे की नीति स्पष्ट करने के लिए निर्देश प्राप्त करने हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है। उस दिन तमिलनाडु सरकार से नवोदय विद्यालयों की स्थापना और उससे जुड़े भाषा नीति संबंधी मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट करने की अपेक्षा है।
अभिभावकों और स्कूलों के लिए क्या है इसका अर्थ?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से CBSE की वर्तमान व्यवस्था स्वतः समाप्त नहीं हुई है। स्कूलों और विद्यार्थियों को बोर्ड की आधिकारिक अधिसूचनाओं और आगे आने वाले न्यायिक आदेशों का पालन करना होगा।
हालांकि, अदालत की टिप्पणी ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर सामने रखा है कि तीसरी भाषा किस कक्षा से शुरू की जाए, उसे कितने वर्षों तक पढ़ाया जाए और नई व्यवस्था लागू करने से पहले शिक्षकों, पाठ्यपुस्तकों तथा विद्यार्थियों की क्षमता का किस प्रकार आकलन किया जाए।
विद्यार्थियों के हित को केंद्र में रखने का स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का मूल संदेश यह है कि शिक्षा नीति बनाते समय भाषा संबंधी राजनीतिक या प्रशासनिक विवादों से अधिक विद्यार्थियों की उम्र, सीखने की क्षमता और मानसिक दबाव को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
तीसरी भाषा सीखने के उद्देश्य पर अदालत ने आपत्ति नहीं जताई, बल्कि इसे नौवीं कक्षा में अचानक शुरू करने के समय और तरीके पर चिंता व्यक्त की। अब सभी की नजर CBSE, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर रहेगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि तीन-भाषा नीति के क्रियान्वयन में कोई बदलाव या चरणबद्ध व्यवस्था की जाती है अथवा नहीं।




