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असम के तेल संसाधनों पर बढ़ा विवाद : ओएनजीसी की नीतियों के खिलाफ शिवसागर में जनाक्रोश : नागरिक सभा का निर्णय : 19 जून को धरना, जुलाई में जिला आयुक्त कार्यालय घेराव का ऐलान : ओएनजीसी पर असम विरोधी नीतियों का गंभीर आरोप

“स्थानीय युवाओं को रोजगार दो, तेल क्षेत्रों का निजीकरण बंद करो” — आटासू की हुंकार

शिवसागर, 7 जून : असम के प्रमुख तेल उत्पादक जिलों में शामिल शिवसागर में शनिवार को तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड (ओएनजीसी) की नीतियों के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश देखने को मिला। ऑल ताई आहोम स्टूडेंट्स यूनियन (आटासू) के आह्वान पर शिवसागर शहर के युवादल सभागार में आयोजित नागरिकों की एक विशाल जनसभा में ओएनजीसी पर स्थानीय हितों की अनदेखी, नई नियुक्तियों पर रोक, तेल क्षेत्रों के निजीकरण तथा महत्वपूर्ण कार्यालयों को असम से बाहर स्थानांतरित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। सभा में विभिन्न जातीय-सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, शिक्षाविद, सेवानिवृत्त ओएनजीसी अधिकारी, पत्रकार, समाजसेवी तथा बड़ी संख्या में जागरूक नागरिक उपस्थित रहे।

सभा में वक्ताओं ने कहा कि छह दशक से अधिक समय से असम की धरती से तेल और प्राकृतिक गैस निकालकर देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली ओएनजीसी अब धीरे-धीरे असम की भूमिका और अधिकारों को कमजोर करने की दिशा में बढ़ रही है। उनका आरोप था कि कंपनी की हालिया नीतियों से स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसर लगातार कम हुए हैं और असम के हितों की अनदेखी की जा रही है।

सभा का उद्घाटन करते हुए गड़गांव कॉलेज के प्रिंसिपल तथा शिवसागर प्रेस क्लब के अध्यक्ष डॉ. सब्यसाची महंत ने कहा कि ओएनजीसी को क्रमशः निजी क्षेत्र की ओर धकेलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उन्होंने कहा कि एक समय ओएनजीसी असम के हजारों युवाओं के लिए रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम था, लेकिन वर्तमान में नई भर्ती लगभग बंद हो चुकी है। जो सीमित भर्ती होती भी है, वह असम के बाहर आयोजित की जाती है और बाद में बाहरी राज्यों के कर्मचारियों को यहां स्थानांतरित कर दिया जाता है।

डॉ. महंत ने आरोप लगाया कि उत्पादन घटने का हवाला देकर ओएनजीसी ने असम के कई तेल क्षेत्रों को निजी कंपनियों के हाथों सौंप दिया है। उनके अनुसार वर्तमान में ओएनजीसी जहां स्वयं लगभग 13 तेल क्षेत्रों का संचालन कर रही है, वहीं 17 तेल क्षेत्र निजी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। उन्होंने कहा कि इससे लोगों के मन में यह आशंका पैदा हो रही है कि कहीं भविष्य में पूरे तेल उद्योग के निजीकरण की योजना तो नहीं बनाई जा रही।

उन्होंने आगे कहा कि शिवसागर की भूमि, जल और पर्यावरण का उपयोग कर दशकों से तेल और गैस का उत्पादन किया जा रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों को उसके अनुरूप लाभ नहीं मिला। उनके अनुसार शिवसागर के लोगों ने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हुए अपनी भूमि ओएनजीसी को सौंपी थी। ऐसे में यहां के लोगों का भी इस संसाधन से होने वाले लाभ में न्यायसंगत हिस्सा होना चाहिए।

सभा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए आटासू के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत गोगोई ने कहा कि यह नागरिक सभा ओएनजीसी की कथित स्थानीय-विरोधी नीतियों के खिलाफ आयोजित की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि ओएनजीसी में हजारों पद खाली पड़े हैं, लेकिन असम के शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा रही। उन्होंने कहा कि एक समय असम परिसंपत्ति (असम एसेट) में लगभग 10 हजार कर्मचारी कार्यरत थे, जबकि वर्तमान में कर्मचारियों की संख्या घटकर करीब 1800 रह गई है। लगातार घटती मानव संसाधन क्षमता और भर्ती प्रक्रिया पर रोक को उन्होंने अत्यंत चिंताजनक बताया।

ओएनजीसी के सेवानिवृत्त अधिकारी पुनाराम मिली ने कहा कि आधुनिक तकनीक और स्वचालन के कारण कई क्षेत्रों में मानव संसाधन की आवश्यकता कम हुई है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर समाप्त कर दिए जाएं। उन्होंने कहा कि ओएनजीसी की सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय युवाओं के लिए नए अवसर और कौशल विकास कार्यक्रम शुरू करे।

सभा में शिवसागर कॉमर्स कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सौमारज्योति महंत तथा वरिष्ठ पत्रकार मनोज बोरठाकुर ने शिवसागर को आधिकारिक रूप से “ऑयल सिटी ऑफ असम” घोषित करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि असम के तेल उद्योग का इतिहास, विकास और आर्थिक संरचना शिवसागर से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में आज तक इस शहर को आधिकारिक तेल नगरी का दर्जा न मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है।

विशिष्ट नागरिक एनामुद्दीन अहमद ने कहा कि असम के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ निजी पूंजीपतियों को देने के बजाय स्थानीय जनता तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने ओएनजीसी समर्थित च्युकाफा मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक जनोन्मुखी तथा सुलभ बनाने की मांग भी उठाई।

नागरिक सभा में ओएनजीसी के समक्ष कई महत्वपूर्ण मांगें रखी गईं। इनमें नई भर्ती प्रक्रिया तत्काल शुरू करने, स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार देने, शिवसागर से किसी भी कार्यालय का स्थानांतरण रोकने, तेल क्षेत्रों का निजी कंपनियों को हस्तांतरण बंद करने, नाजिरा क्षेत्र की ठेका प्रबंधन व्यवस्था यथावत रखने, प्रभावित क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करने, पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने, स्थानीय कला-संस्कृति को संरक्षण देने, खेल अवसंरचना के विकास में भागीदारी बढ़ाने तथा ओएनजीसी और राजाबारी स्थित सुकाफा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल की स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर एवं सुलभ बनाने जैसी मांगें शामिल थीं।

सभा के अंत में ओएनजीसी के खिलाफ चरणबद्ध जनांदोलन की घोषणा की गई। आटासू नेतृत्व ने बताया कि आगामी 19 जून को धरना प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा, जबकि इसके बाद जुलाई माह में शिवसागर जिला आयुक्त कार्यालय का घेराव किया जाएगा। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

नागरिक सभा के समापन पर बसंत गोगोई ने कहा कि असम के संसाधनों, शिवसागर के अधिकारों और स्थानीय युवाओं के रोजगार की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक स्थानीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक ओएनजीसी की नीतियों के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा। जनसभा ने एक बार फिर असम में प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार, रोजगार, निजीकरण और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

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