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गरिमा सैकिया गर्ग ने टियोक के ‘जुबिन सेउज सापोरी’ का भावुक दौरा किया : दिवंगत जुबिन गर्ग की स्मृति में 10,000 शिमलू (सेमल) के पौधे लगाने का अभियान, गिद्धों की वापसी का सपना

टियोक, 19 मई : असम के प्रसिद्ध लोक कलाकार स्वर्गीय जुबिन गर्ग की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने जोरहाट जिले के टियोक के जांजीमुख स्थित बूढ़ालुइत नदी की सापोरी (नदी द्वीप) में युवाओं द्वारा विकसित ‘जुबिन सेउज सापोरी’ का दौरा किया। नाव से नदी पार कर पहुंची गरिमा ने वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को करीब से देखा, युवाओं के पर्यावरण संरक्षण प्रयासों की सराहना की और स्वयं एक पौधा लगाकर अभियान में शामिल हुईं।

‘जुबिन सेउज सापोरी’ का जन्म

बूढ़ालुइत नदी की सापोरी सदियों से अपनी बदलती कहानी के लिए जानी जाती है। कभी हरे-भरे इलाकों को निगल लेती है, तो कभी रातोंरात नया द्वीप रच देती है। टियोक के शगुनपरा गांव के सामने बूढ़ालुइत नदी ने हाल ही में एक विशाल नई सापोरी बनाई है।

शगुनपरा का नाम प्राचीन काल में यहां रहने वाले गिद्धों (शगुन) के कारण पड़ा था। ऊंचे पेड़ों पर गिद्ध घोंसले बनाते थे, लेकिन समय के साथ गिद्ध विलुप्तप्राय हो गए। अब गांव के युवा इस नई सापोरी को फिर से हरा-भरा बनाने और यहां गिद्धों की वापसी का सपना देख रहे हैं।

रूपक टायूंग के नेतृत्व में स्थानीय युवाओं ने लगभग 10,000 शिमलू (सेमल) के पौधे लगाए हैं। इन पेड़ों के बड़े होने पर गिद्ध फिर से यहां बसेरा बना सकेंगे। इस पर्यावरणीय पहल को असम के हार्ट थ्रोब जुबिन गर्ग के नाम पर ‘जुबिन सेउज चापोरी’ नाम दिया गया है, क्योंकि जुबिन प्रकृति से गहरा लगाव रखते थे।

पौधारोपण के दौरान गांववासियों ने “जय जुबिन दा” के नारों के साथ जुबिन के लोकप्रिय गीत गाए।

गरिमा का भावुक दौरा

खबर प्रकाशित होने के बाद गरिमा सैकिया गर्ग स्वयं इस स्थान को देखने पहुंचीं। उन्होंने नाव से बूढ़ालुइत नदी पार की और सापोरी पर पहुंचकर युवाओं के प्रयास देखे। गरिमा ने खुद एक शिमलू का पौधा लगाया और कहा कि “जुबिन प्रकृति से बेहद प्रेम करते थे। वे हमेशा प्रकृति के बीच जीवित रहेंगे। इस चापोरी को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। गांववासियों और युवाओं का यह प्रयास सराहनीय है।”

गरिमा ने गांववालों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह पहल जुबिन की स्मृति को हमेशा जीवित रखेगी।

स्थानीय प्रतिक्रिया और महत्व

शगुनपरा गांव पहले नदी कटाव का शिकार हो चुका है। गांव का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया था। अब नई सापोरी पर हरे-भरे जंगल का सपना न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण बल्कि गांव की आजीविका और पर्यटन को बढ़ावा देने वाला भी है।

वन्यजीव प्रेमी और स्थानीय लोग इस अभियान को जुबिन गर्ग की विरासत से जोड़कर देख रहे हैं। यह पहल ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों की सापोरियों में गिद्धों के आवास बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

गरिमा सैकिया गर्ग के इस दौरे से युवाओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। वे और अधिक पौधे लगाने और चापोरी को पर्यटक स्थल बनाने की योजना बना रहे हैं। यह पहल न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की मिसाल है, बल्कि दिवंगत जुबिन गर्ग के प्रति असमिया जनता के अटूट लगाव को भी दर्शाती है। ‘जुबिन सेउज सापोरी’ पर पौधारोपण जारी है।

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