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असम की बेटी ने रचा इतिहास : लखीमपुर की रूपामणि गढ़ ने फतह किया माउंट एवरेस्ट : असम की पहली महिला बनकर विश्व की सबसे ऊंची चोटी पर लहराया तिरंगा

आईटीबीपी के पहले ऑल-वूमेन इंटरनेशनल एवरेस्ट अभियान में शामिल होकर असम की बेटी ने बढ़ाया देश का मान, पूरे राज्य में खुशी और गर्व का माहौल

न्यूज डेस्क, 23 मई : असम के लिए यह गौरव, साहस और प्रेरणा का ऐतिहासिक क्षण है। लखीमपुर जिले के लीलाबाड़ी की रहने वाली रूपामणि गढ़ ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर इतिहास रच दिया है। 8,848.86 मीटर ऊंची विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटी पर पहुंचने वाली वह असम की पहली महिला बन गई हैं। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल पूरे असम बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) के पहले सर्व-महिला अंतरराष्ट्रीय माउंट एवरेस्ट अभियान की सदस्य के रूप में रूपामणि गढ़ ने 21 मई को एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। यह उपलब्धि भारतीय महिला शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और अदम्य इच्छाशक्ति का नया प्रतीक बन गई है।

मौत के रास्ते को पार कर हासिल की दुनिया की सबसे बड़ी जीत

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई दुनिया के सबसे कठिन और खतरनाक अभियानों में गिनी जाती है। पर्वतारोहियों को बर्फीले तूफानों, माइनस तापमान, ऑक्सीजन की भारी कमी, ग्लेशियरों की खतरनाक दरारों और “डेथ जोन” जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार 8 हजार मीटर से ऊपर का क्षेत्र “डेथ जोन” कहलाता है, जहां शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और हर कदम जीवन-मृत्यु का संघर्ष बन जाता है। लेकिन असम की बेटी रूपामणि गढ़ ने अदम्य साहस, कठिन प्रशिक्षण और मानसिक दृढ़ता के बल पर सभी चुनौतियों को पार करते हुए यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।

आईटीबीपी के पहले ऑल-वूमेन एवरेस्ट अभियान की बड़ी सफलता

यह अभियान भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल द्वारा “नारी शक्ति” को समर्पित विशेष मिशन के रूप में आयोजित किया गया था। 14 सदस्यीय इस दल में 11 महिला पर्वतारोही और तकनीकी एवं सहयोगी सदस्य शामिल थे। अभियान दल ने नेपाल की दक्षिणी कोल (South Col) मार्ग से एवरेस्ट शिखर तक पहुंचने का कठिन सफर तय किया।

आईटीबीपी लंबे समय से हिमालयी अभियानों और उच्च हिमालयी सुरक्षा कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है, लेकिन पहली बार पूरी तरह महिला पर्वतारोहियों की टीम बनाकर एवरेस्ट अभियान चलाना सुरक्षा बलों के इतिहास में भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

असम की दो बेटियों ने बढ़ाया राज्य का गौरव

इस ऐतिहासिक अभियान में असम की एक और महिला पर्वतारोही भनीता तिमुंगपी ने उप-अभियान नेता के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। हालांकि उन्होंने शिखर तक चढ़ाई नहीं की, लेकिन पूरे अभियान के समन्वय और नेतृत्व में उनकी भूमिका बेहद अहम रही।

एक ही अभियान में असम की दो महिलाओं की मौजूदगी ने पूरे राज्य को विशेष गौरव का अवसर दिया है।

साधारण किसान परिवार की बेटी बनी ‘एवरेस्ट क्वीन’

रूपामणि गढ़ की सफलता की कहानी संघर्ष, मेहनत और सपनों को सच करने की मिसाल बन गई है। उनका जन्म असम के लखीमपुर जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। रूपामणि गढ़ के पिता जयसिंह गढ़ खेती-किसानी से जुड़े हैं। वहीं माता कमलावती आंगनवाड़ी सहायिका हैं। उनके परिवार की आर्थिक परिस्थितियां बेहद साधारण थीं।

 

रूपामणि गढ़ की बचपन से ही साहसिक गतिविधियों में गहरी रुचि थी। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद रूपामणि ने अपने सपनों को कभी नहीं छोड़ा। गांव के साधारण माहौल से निकलकर उन्होंने अपनी मेहनत और संकल्प के दम पर विश्व की सबसे ऊंची चोटी तक का सफर तय किया।

कॉलेज से लेकर एवरेस्ट तक का सफर

रूपामणि गढ़ ने कला संकाय में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2020 में आईटीबीपी जॉइन किया। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने पर्वतारोहण के अपने जुनून को जारी रखा।

कठिन प्रशिक्षण, नियमित अभ्यास और विभिन्न पर्वतारोहण अभियानों में भाग लेते हुए उन्होंने अपनी क्षमता को लगातार मजबूत किया। बाद में आईटीबीपी के विशेष पर्वतारोहण प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होकर उन्होंने उच्च हिमालयी अभियानों के लिए खुद को तैयार किया।

एवरेस्ट अभियान में पर्यावरण संरक्षण का संदेश

यह अभियान केवल पर्वतारोहण तक सीमित नहीं था। आईटीबीपी की टीम ने “हिमालय बचाओ – ग्लेशियर बचाओ” अभियान के तहत पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।

अभियान के दौरान टीम ने एवरेस्ट क्षेत्र से गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा और प्लास्टिक अपशिष्ट भी एकत्रित किया। इस पहल का उद्देश्य हिमालयी पर्यावरण को सुरक्षित रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता फैलाना था।

विशेषज्ञों का कहना है कि एवरेस्ट क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण और ग्लेशियरों के पिघलने की समस्या आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुकी है।

मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने दी बधाई

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने रूपामणि गढ़ की इस उपलब्धि को “असम के लिए गर्व का ऐतिहासिक क्षण” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि “असम की बेटी ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी को छू लिया है। यह उपलब्धि पूरे राज्य के लिए गर्व का विषय है और युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है।”

मुख्यमंत्री सहित राज्य के कई मंत्रियों, सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों ने रूपामणि को शुभकामनाएं दीं।

सोशल मीडिया पर ‘एवरेस्ट बेटी’ के नाम से सम्मान

रूपामणि गढ़ की सफलता के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें “असम की बेटी”, “एवरेस्ट गर्ल” और “एवरेस्ट क्वीन ऑफ असम” जैसे नामों से सम्मानित किया जा रहा है।

लाखों लोग उनकी सफलता की कहानी साझा कर रहे हैं और युवा पीढ़ी के लिए उन्हें प्रेरणा का स्रोत बता रहे हैं।

असम में साहसिक खेलों को मिलेगा नया प्रोत्साहन

विशेषज्ञों का मानना है कि रूपामणि की सफलता से असम और पूर्वोत्तर भारत में साहसिक खेलों के प्रति युवाओं का आकर्षण बढ़ेगा।

अब तक पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों ने बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग और फुटबॉल जैसे खेलों में राष्ट्रीय पहचान बनाई है, लेकिन पर्वतारोहण में असम की उपस्थिति सीमित रही है। रूपामणि गढ़ की सफलता इस क्षेत्र में नई शुरुआत मानी जा रही है।

 

महिलाओं के लिए बनीं नई प्रेरणा

सामाजिक कार्यकर्ताओं और खेल विशेषज्ञों का कहना है कि रूपामणि गढ़ ने साबित कर दिया कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं।

एक छोटे ग्रामीण परिवार से निकलकर एवरेस्ट तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि भारतीय महिला शक्ति की जीत है। उनकी कहानी देशभर की लड़कियों को बड़े सपने देखने और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की प्रेरणा दे रही है।

आईटीबीपी की पर्वतारोहण परंपरा भी रही मजबूत

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल को देश का “हिमवीर” बल कहा जाता है। आईटीबीपी दशकों से हिमालयी सीमाओं पर तैनाती के साथ-साथ पर्वतारोहण अभियानों में भी अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।

आईटीबीपी की टीमें अब तक कई बार माउंट एवरेस्ट सहित दुनिया की प्रमुख चोटियों पर तिरंगा फहरा चुकी हैं। लेकिन इस बार पहली बार पूरी महिला टीम द्वारा एवरेस्ट अभियान का सफल संचालन ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

पूरे देश के लिए प्रेरणा बनीं रूपामणि

आज रूपामणि गढ़ केवल असम की बेटी नहीं रहीं, बल्कि पूरे देश की महिला शक्ति और युवा साहस का प्रतीक बन चुकी हैं।

उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर सपने बड़े हों, मेहनत सच्ची हो और आत्मविश्वास मजबूत हो, तो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी झुक सकती है।

असम के आकाश में आज गर्व का नया सूर्योदय हुआ है — और उस सूर्योदय का नाम है रूपामणि गढ़।

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