गुवाहाटी के प्रतिष्ठित स्कूलों में AI डीपफेक कांड से मचा हड़कंप : SFS और DPS में छात्राओं-शिक्षिकाओं की कथित अश्लील AI तस्वीरें वायरल, टेलीग्राम पर बिक्री के आरोप : अभिभावकों में भारी आक्रोश, साइबर जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

गुवाहाटी, 12 जून : असम की राजधानी गुवाहाटी से एक बेहद गंभीर और चिंताजनक साइबर अपराध का मामला सामने आया है, जिसने शिक्षा जगत, अभिभावकों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच व्यापक चिंता पैदा कर दी है। महानगर के दो प्रतिष्ठित विद्यालयों—SFS और DPS—से जुड़ी कथित AI डीपफेक गतिविधियों ने न केवल छात्राओं और शिक्षिकाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि स्कूल परिसरों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दुरुपयोग की भयावह तस्वीर भी सामने रख दी है।
SFS स्कूल में कथित डीपफेक तस्वीरों का मामला
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गुवाहाटी के प्रतिष्ठित SFS स्कूल के कुछ छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने AI तकनीक की मदद से छात्राओं और शिक्षिकाओं की तस्वीरों को अश्लील रूप देकर डीपफेक सामग्री तैयार की। आरोप है कि इन तस्वीरों को सोशल मीडिया और निजी डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से साझा किया गया तथा कुछ मामलों में इन्हें टेलीग्राम के जरिए पैसों के बदले बेचे जाने का प्रयास भी किया गया।
इस घटना के सामने आने के बाद छात्राओं, शिक्षिकाओं और अभिभावकों के बीच भारी आक्रोश देखा जा रहा है। कई अभिभावकों का कहना है कि यह केवल स्कूल अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि महिलाओं और नाबालिग छात्राओं की गरिमा, निजता और मानसिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर अपराध है।
DPS में भी सामने आ चुकी है समान घटना
मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि कुछ दिन पहले गुवाहाटी के ही एक अन्य प्रतिष्ठित विद्यालय DPS में भी इसी प्रकार की घटना सामने आने की चर्चा रही थी। वहां भी एक छात्र पर छात्राओं और शिक्षिकाओं की कथित AI-निर्मित अश्लील तस्वीरें बनाकर वायरल करने का आरोप लगा था।
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि AI आधारित डीपफेक तकनीक अब केवल सेलिब्रिटीज या सार्वजनिक हस्तियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्कूलों और नाबालिग विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी है। इससे शिक्षा संस्थानों के सामने एक नई डिजिटल चुनौती खड़ी हो गई है।
टेलीग्राम के जरिए तस्वीरों की बिक्री का आरोप
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कथित रूप से तैयार की गई आपत्तिजनक तस्वीरों को टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर धन के बदले साझा और बेचा गया। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो मामला केवल डीपफेक निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें साइबर शोषण, आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार, आर्थिक लाभ के लिए डिजिटल अपराध तथा नाबालिगों से जुड़े गंभीर साइबर अपराधों की धाराएं भी जुड़ सकती हैं।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी गतिविधियां डिजिटल ब्लैकमेलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न का रूप भी ले सकती हैं, जिसके दूरगामी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकते हैं।
AI डीपफेक : तकनीक का खतरनाक दुरुपयोग
विशेषज्ञों के अनुसार, डीपफेक तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की एक उन्नत प्रणाली है, जिसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को संपादित कर वास्तविक जैसा दिखने वाला नकली कंटेंट तैयार किया जा सकता है।
स्कूलों और कॉलेजों में इस तकनीक का दुरुपयोग नई चिंता का विषय बनता जा रहा है। साधारण तस्वीरों को AI टूल्स के माध्यम से आपत्तिजनक रूप देकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
देशभर में बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
गुवाहाटी का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से AI डीपफेक से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में कक्षा 9 के दो छात्रों पर एक महिला शिक्षक की AI-जनरेटेड आपत्तिजनक तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। इसी प्रकार दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और अन्य महानगरों में भी महिलाओं और छात्राओं की तस्वीरों के दुरुपयोग से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक की बढ़ती पहुंच के साथ ऐसे मामलों में वृद्धि की आशंका भी बढ़ रही है।
कानून क्या कहता है ?
भारत में डीपफेक से संबंधित अलग और व्यापक कानून विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन वर्तमान कानूनी ढांचे के अंतर्गत भी ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 67, 67A और बच्चों से संबंधित मामलों में धारा 67B के तहत अश्लील और यौन रूप से आपत्तिजनक सामग्री का निर्माण, प्रसारण और वितरण दंडनीय अपराध है। इसके अलावा महिलाओं की गरिमा, निजता और मानहानि से जुड़े मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराएं भी लागू हो सकती हैं।
यदि पीड़ित नाबालिग हों, तो मामला और अधिक गंभीर श्रेणी में आ सकता है।
अभिभावकों ने उठाई सख्त कार्रवाई की मांग
घटना सामने आने के बाद अभिभावकों ने संबंधित विद्यालयों से तत्काल और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि दोषी पाए जाने वाले छात्रों के विरुद्ध केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पूरे मामले की जांच साइबर सेल और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा की जानी चाहिए।
कई अभिभावकों ने स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा, साइबर कानून और AI के जिम्मेदार उपयोग को लेकर अनिवार्य जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने की भी मांग की है।
राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत की सुविधा
गृह मंत्रालय के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर महिलाओं और बच्चों से जुड़े साइबर अपराधों की शिकायत दर्ज की जा सकती है। इसके अलावा साइबर धोखाधड़ी और ऑनलाइन अपराधों की रिपोर्टिंग के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 भी उपलब्ध है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को बिना देरी किए शिकायत दर्ज करानी चाहिए ताकि डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जा सके।
शिक्षा संस्थानों के लिए चेतावनी
गुवाहाटी की यह घटना देशभर के स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है। AI, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का गलत उपयोग अब सीधे छात्रों और शिक्षकों को प्रभावित कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा संस्थानों को अब केवल अकादमिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि डिजिटल नैतिकता, साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन जिम्मेदारी को भी शिक्षा प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल इस मामले में पुलिस, साइबर सेल अथवा संबंधित विद्यालयों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर सामने आए आरोपों तथा दावों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।
हालांकि, यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि AI तकनीक का दुरुपयोग किस प्रकार समाज, शिक्षा व्यवस्था और व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।




