शिवसागर में ‘डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा साहित्य पुरस्कार-2026’ प्रदान—जगन्नाथ बरुआ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया सम्मानित : ‘पद्धतिगत और व्यवस्थित शोध के जरिए डॉक्टरेट हासिल करने वाले पहले असमिया थे डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा’—पुरस्कार ग्रहण कर बोले डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया : ‘फारसी-उर्दू के प्रकांड विद्वान के साथ उदार, धर्मनिरपेक्ष और देशभक्त व्यक्तित्व थे डॉ. बोरा’—डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जितेन हजारिका
इतिहास, प्राच्यविद्या, शिक्षा और सामाजिक समन्वय में डॉ. बोरा के योगदान पर व्यापक चर्चा—नई पीढ़ी तक उनकी बौद्धिक विरासत पहुंचाने का आह्वान

शिवसागर, 22 सितंबर : असम के प्रख्यात प्राच्यविद्, इतिहासकार, शिक्षाविद्, शोधकर्ता और साहित्यकार डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा की जयंती के अवसर पर शिवसागर में आयोजित एक गरिमामय समारोह में ‘डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा साहित्य पुरस्कार-2026’ प्रदान किया गया। इस वर्ष यह प्रतिष्ठित सम्मान जगन्नाथ बरुआ विश्वविद्यालय के कुलपति तथा साहित्यकार डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया को प्रदान किया गया।
अरुणोदय साहित्य सभा और डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा स्मृति रक्षा समिति के संयुक्त तत्वावधान में शिवसागर प्रेस क्लब के सभागार में आयोजित समारोह में डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जितेन हजारिका ने डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया को पुरस्कार प्रदान किया।
साहित्य, उपन्यास, कहानी, गीत, नाटक और कविता सहित विभिन्न विधाओं में अपने लेखन के लिए चर्चित डॉ. सैकिया ने सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. बोरा के जीवन, शोध, शिक्षा, इतिहास और सामाजिक चिंतन पर विस्तार से प्रकाश डाला।

‘असमिया समाज के लिए चिरस्मरणीय है 22 सितंबर’
पुरस्कार ग्रहण करने के बाद डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया ने कहा कि असमिया समाज के लिए 22 सितंबर का दिन विशेष और चिरस्मरणीय है, क्योंकि 22 सितंबर 1899 को शिवसागर में डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा का जन्म हुआ था।
उन्होंने कहा कि ऐसी महान विभूति के नाम पर स्थापित साहित्य पुरस्कार के लिए चुना जाना उनके लिए सौभाग्य और सम्मान की बात है।
डॉ. सैकिया ने डॉ. बोरा को पद्धतिगत एवं व्यवस्थित शोध के जरिए डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाला पहला असमिया बताते हुए कहा कि उनकी उपलब्धियों और बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने व्यापक रूप से प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता है।

‘महान व्यक्तित्व अपने विचार और आदर्शों में जीवित रहते हैं’
डॉ. सैकिया ने कहा कि कोई महान व्यक्ति शारीरिक रूप से हमारे बीच न रहे, फिर भी उसका दर्शन, चिंतन, आदर्श और त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहता है।
उन्होंने कहा कि महान विभूतियों को याद करने का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके विचारों का अध्ययन, पुनर्मूल्यांकन और नई पीढ़ी तक उनका सार्थक प्रसार भी होना चाहिए।
उनके अनुसार, डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा के जीवन और कृतित्व पर जितना गहन अध्ययन होगा, असम के बौद्धिक और शैक्षणिक इतिहास के उतने ही महत्वपूर्ण पहलू सामने आएंगे।

फारसी और उर्दू के अध्ययन के पीछे थी व्यापक विश्वदृष्टि
डॉ. सैकिया ने डॉ. बोरा की भाषा और साहित्य साधना का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने ढाका में फारसी विषय में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और बाद में उर्दू में भी उच्च अध्ययन किया।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के सामने यह प्रश्न रखा जाना चाहिए कि आखिर डॉ. बोरा ने फारसी और उर्दू जैसी भाषाओं का गहन अध्ययन क्यों चुना।
डॉ. सैकिया के अनुसार, इसके पीछे अलग-अलग समाजों और संस्कृतियों से संवाद स्थापित करने तथा दुनिया को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने की डॉ. बोरा की गहरी बौद्धिक जिज्ञासा दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, समाजों और देशों से ज्ञान अर्जित कर उसे अपने देश और समाज के कल्याण में लगाना डॉ. बोरा की ज्ञान-साधना का महत्वपूर्ण पक्ष था। उनका सपना एक विकसित देश और आपसी सद्भाव से जुड़ा ऐसा असमिया समाज था, जिसकी शिक्षा तर्क, विवेक और व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित हो।

अमीर हसन दिहलवी पर किया था महत्वपूर्ण शोध
फारसी साहित्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए डॉ. सैकिया ने प्रसिद्ध फारसी कवि, विद्वान और सूफी अमीर हसन दिहलवी के जीवन और साहित्यिक योगदान का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा ने अमीर हसन दिहलवी के जीवन और कृतित्व को अपने गंभीर शोध का विषय बनाया था। इतने पुराने ऐतिहासिक कालखंड से जुड़े फारसी कवि और विद्वान को शोध का विषय बनाना उनकी व्यापक बौद्धिक दृष्टि को दर्शाता है।
डॉ. सैकिया ने कहा कि यह शोध आज भी नई पीढ़ी के शोधार्थियों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।

लंदन विश्वविद्यालय से हासिल की डॉक्टरेट
समारोह में बताया गया कि डॉ. बोरा ने लंदन विश्वविद्यालय में अमीर हसन दिहलवी के जीवन और कृतित्व पर शोध कर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी। उनका शोध प्रोफेसर डेनिसन रॉस के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ था।
डॉ. सैकिया ने कहा कि डॉ. बोरा की उपलब्धियां केवल डॉक्टरेट हासिल करने तक सीमित नहीं थीं। शिक्षा, शोध, इतिहास और प्रशासन के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया।

ढाका विश्वविद्यालय में निभाई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
डॉ. बोरा के शैक्षणिक एवं प्रशासनिक जीवन का उल्लेख करते हुए डॉ. सैकिया ने कहा कि ढाका विश्वविद्यालय में फारसी और उर्दू विभाग से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने अध्यापन और शोध के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई।
समारोह में बताया गया कि 1943 में उन्हें ढाका विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति की जिम्मेदारी भी मिली थी।
उनकी विद्वता केवल भाषा और साहित्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि इतिहास के गंभीर अध्ययन में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा।

‘बहारिस्तान-ए-गायबी’ के अनुवाद से मिली विशेष ख्याति
ढाका विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा ने मुगलकाल से संबंधित महत्वपूर्ण फारसी ऐतिहासिक ग्रंथ ‘बहारिस्तान-ए-गायबी’ का फारसी से अंग्रेजी में अनुवाद किया था।
समारोह में वक्ताओं ने बताया कि इस ग्रंथ में जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल के दौरान असम, बंगाल, बिहार और उड़ीसा से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं तथा मुगल अभियानों का विस्तृत विवरण मिलता है।
इस महत्वपूर्ण ग्रंथ के अनुवाद ने इतिहास के क्षेत्र में डॉ. बोरा की विद्वता को विशेष पहचान दिलाई।

देश के विभाजन के विरोधी थे डॉ. बोरा
डॉ. सैकिया ने डॉ. बोरा के अखंड भारत संबंधी विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डॉ. बोरा देश के विभाजन के विरोधी थे और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में भी इस विषय पर उनके विचार स्पष्ट थे।
उनके जीवन के अंतिम चरण से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए समारोह में वक्ताओं ने दावा किया कि लखनऊ में एक इतिहास सम्मेलन में भाषण देने के बाद कथित तौर पर उन्हें विष मिला दूध दिया गया था, जिसके बाद कम उम्र में उनका निधन हुआ। इस प्रसंग को समारोह में वक्ताओं के दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया।

‘आधुनिक भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण विद्वान थे डॉ. बोरा’—डॉ. जितेन हजारिका
डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा साहित्य पुरस्कार प्रदान करते हुए डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जितेन हजारिका ने कहा कि डॉ. बोरा आधुनिक भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण विद्वानों में शामिल थे और फारसी तथा उर्दू साहित्य के प्रकांड अध्येता थे।
उन्होंने कहा कि डॉ. बोरा ने स्कूली जीवन से ही अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया था। बाद में कॉटन कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय से फारसी विषय में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। उसी दौर में उन्होंने कानून की परीक्षा भी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की।
ढाका विश्वविद्यालय में कुछ समय अध्यापन के बाद वे उच्च अध्ययन और शोध के लिए लंदन गए, जहां किए गए उनके शोध ने उन्हें असम के शैक्षणिक इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाया।
असम साहित्य सभा के सबसे कम उम्र के अध्यक्षों में थे शामिल
डॉ. हजारिका ने असम साहित्य सभा के साथ डॉ. बोरा के जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1940 में जोरहाट में आयोजित असम साहित्य सभा के अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ. बोरा ने की थी।
उन्होंने कहा कि डॉ. बोरा असम साहित्य सभा के सबसे कम उम्र के अध्यक्षों में विशिष्ट स्थान रखते थे और उनका अध्यक्षीय संबोधन उनके व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचायक था।
‘उदार, धर्मनिरपेक्ष और देशभक्त व्यक्तित्व थे डॉ. बोरा’
डॉ. जितेन हजारिका ने डॉ. बोरा को उदार, धर्मनिरपेक्ष और देशभक्त व्यक्तित्व बताते हुए सामाजिक समन्वय और सद्भाव को लेकर उनके विचारों को विशेष रूप से रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि असम साहित्य सभा के मंच से डॉ. बोरा ने हिंदू और मुसलमान दोनों को भारत की संतान बताते हुए समाज में विभाजन पैदा करने वाली शक्तियों से सावधान रहने की अपील की थी।
डॉ. बोरा का मानना था कि लेखकों को अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में समन्वय, भाईचारा और सामाजिक सद्भाव मजबूत करना चाहिए। डॉ. हजारिका के अनुसार, डॉ. बोरा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में यह विचार भी रखा था कि स्वदेश प्रेम किसी एक जाति, धर्म अथवा समुदाय की एकाधिकार संपत्ति नहीं है।
‘चिर चेनेही मोर भाषा जननी’ के सामूहिक गायन से कार्यक्रम का शुभारंभ
शिवसागर प्रेस क्लब सभागार में आयोजित समारोह की शुरुआत ‘चिर चेनेही मोर भाषा जननी’ गीत के सामूहिक गायन से हुई।
इसके बाद शिवसागर युवादल के उपाध्यक्ष एवं चिंतनशील लेखक देव हजारिका ने डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर श्रद्धांजलि अर्पित की। टीआरबी की कक्षा 11 की छात्रा सामरीन सादिक ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।
नई पीढ़ी तक डॉ. बोरा की विरासत पहुंचाने पर जोर
अरुणोदय साहित्य सभा के अध्यक्ष मणिरुल इस्लाम बोरा ने स्वागत भाषण देते हुए डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा की स्मृति को जीवंत रखने तथा नई पीढ़ी को उनके साहित्यिक, ऐतिहासिक और शैक्षणिक योगदान से परिचित कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन असम साहित्य सभा के कार्यनिर्वाहक सदस्य संतोष दत्ता ने किया।
समारोह में डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा स्मृति रक्षा समिति के अध्यक्ष एवं विशिष्ट कवि-साहित्यकार प्रेम गोगोई तथा शिवसागर जिला साहित्य सभा के अध्यक्ष योगेश किशोर फुकन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। आयोजन से जुड़े दायित्वों में भी प्रेम गोगोई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम में शिवसागर जिला साहित्य सभा और विभिन्न शाखा साहित्य सभाओं के पदाधिकारी, साहित्यकार, निबंधकार, लेखक, समाजसेवी, पत्रकार तथा बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।
साहित्य, शोध और सामाजिक सद्भाव की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश
समारोह में वक्ताओं ने इतिहास, प्राच्यविद्या, फारसी-उर्दू साहित्य, शिक्षा और सामाजिक समन्वय के क्षेत्र में डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा के योगदान को याद करते हुए उनकी बौद्धिक विरासत पर नए सिरे से शोध और विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. ज्योतिप्रसाद सैकिया को ‘डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा साहित्य पुरस्कार-2026’ प्रदान किए जाने के साथ समारोह ने जहां डॉ. बोरा की स्मृति और बहुआयामी योगदान को रेखांकित किया, वहीं साहित्य, शोध, इतिहास, तर्कशील चिंतन और सामाजिक सद्भाव की उस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश भी दिया, जिसे डॉ. मयिदुल इस्लाम बोरा ने अपने जीवन और कृतित्व के माध्यम से समृद्ध किया।




