22 वर्ष की उम्र में आस्था की कठिन साधना : मयंक सेठी ने रखा 10 दिवसीय उपवास : तेजपुर में दशलक्षण महापर्व पर तप, त्याग और आत्मसंयम का प्रेरणादायी संकल्प, निर्धारित समय में केवल जल ग्रहण कर की आराधना : युवा अवस्था में कठिन तप से दिया धर्म और संस्कारों से जुड़ने का संदेश—जैन समाज ने की साधना की सराहना
आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक चेतना का संदेश बना दस दिवसीय तप—सेठी परिवार को समाज ने दी शुभकामनाएं

तेजपुर, 29 सितंबर : जैन धर्म के पावन दशलक्षण महापर्व के अवसर पर तेजपुर शहर के महज 22 वर्षीय मयंक सेठी ने दस दिवसीय उपवास की कठिन साधना कर तप, त्याग, आत्मसंयम और धर्म के प्रति गहरी आस्था का परिचय दिया। युवा अवस्था में इस प्रकार की कठिन आराधना और दस दिनों तक संयमपूर्वक उपवास के उनके संकल्प की जैन समाज ने सराहना करते हुए इसे युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी बताया है।
मयंक सेठी, प्रकाश चंद सेठी एवं लीला देवी सेठी के पौत्र तथा राकेश सेठी एवं नीलम सेठी के पुत्र हैं। परिवार और समाज के धार्मिक एवं संस्कारपूर्ण वातावरण के बीच मयंक द्वारा दशलक्षण महापर्व के दौरान की गई इस कठिन तपस्या को धर्म के प्रति उनके समर्पण और दृढ़ संकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

दस दिनों तक अन्न का पूर्ण त्याग—निर्धारित समय में केवल जल
दस दिवसीय साधना के दौरान मयंक सेठी ने अन्न सहित किसी भी प्रकार का भोजन ग्रहण नहीं किया। इस अवधि में उन्होंने निर्धारित समय पर अत्यंत संयमित रूप से केवल जल ग्रहण करते हुए उपवास, धार्मिक आराधना और आत्मचिंतन किया। लगातार दस दिनों तक कठिन तप की इस प्रक्रिया में उन्होंने अपनी दिनचर्या को भी संयम और धार्मिक अनुशासन के अनुरूप रखा।
समाज के लोगों का कहना है कि महज 22 वर्ष की आयु में इस प्रकार की कठिन तपस्या दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मसंयम और धर्म के प्रति गहरे समर्पण को दर्शाती है। दशलक्षण महापर्व के दौरान मयंक की साधना ने तप और त्याग के आध्यात्मिक महत्व को भी रेखांकित किया।

दशलक्षण महापर्व—आत्मशुद्धि, तप और त्याग का संदेश
जैन धर्म में दशलक्षण महापर्व का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इसे केवल उपवास तक सीमित न मानकर आत्मशुद्धि, आत्मसंयम, तप, त्याग, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। पर्व के दौरान श्रद्धालु अपने आचरण और विचारों में संयम लाने के साथ आराधना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
इसी भावना के अनुरूप मयंक सेठी की दस दिवसीय साधना को धर्म के प्रति समर्पण के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। विशेष रूप से इतनी कम उम्र में उनके इस संकल्प ने नई पीढ़ी के बीच धार्मिक संस्कारों, आत्मानुशासन और त्याग के महत्व का संदेश दिया है।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बना कठिन तप
समाज के लोगों ने मयंक की तपस्या की सराहना करते हुए कहा कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं और बदलती जीवनशैली के बीच युवा पीढ़ी का अपनी धार्मिक परंपराओं और संस्कारों से जुड़कर इस तरह की कठिन साधना करना प्रेरणादायी है। दस दिनों की तपस्या के माध्यम से मयंक ने दृढ़ संकल्प, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
समाज की ओर से कहा गया कि मयंक की साधना केवल व्यक्तिगत धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे युवा वर्ग को भी अपने संस्कारों, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है।
पर्युषण पर्व पर दस लक्षण व्रत धारण कर की आराधना
सेठी परिवार की ओर से साझा संदेश में भी मयंक सेठी की इस साधना को पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर दस लक्षण व्रत धारण कर जिनेंद्र देव और धर्म के प्रति आस्था, तप एवं त्याग का अनुकरणीय उदाहरण बताया गया है। परिवार ने इस कठिन साधना के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने के उनके प्रयास को नमन किया है।
मयंक सेठी के दस दिवसीय उपवास, तप, त्याग और आराधना के लिए जैन समाज की ओर से उनका अभिनंदन किया गया तथा सेठी परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं दी गईं। परिवार और समाज ने उनके धार्मिक संकल्प की अनुमोदना करते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार धर्म और संस्कारों के मार्ग पर आगे बढ़ने की मंगलकामना की।

“तपस्वी की देखो आराधना, जिन शासन की करो साधना”
मयंक की साधना के अवसर पर “तपस्वी की देखो आराधना, जिन शासन की करो साधना। जय जयकार! जय जयकार! तपस्वी का जय जयकार!” के भाव के साथ उनकी तपस्या की अनुमोदना की गई।
दशलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर 22 वर्षीय मयंक सेठी की दस दिवसीय तपस्या ने आस्था, तप, त्याग, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देते हुए युवा पीढ़ी के सामने धार्मिक संस्कारों से जुड़े रहने का एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है।




