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शिवसागर के दिसांगमुख में ब्रह्मपुत्र का कहर : भीषण कटाव से अफला और लिगिरीबाड़ी गांवों का अस्तित्व संकट में : बरसात से पहले बढ़ी ग्रामीणों की चिंता

शिवसागर, 8 जून : शिवसागर जिले के दिसांगमुख क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी का लगातार बढ़ता कटाव स्थानीय लोगों के लिए गंभीर संकट का कारण बन गया है। दिसांगमुख के अफला और लिगिरीबाड़ी गांव सहित आसपास के विस्तृत क्षेत्रों में वर्षों से जारी नदी कटाव के चलते हेक्टेयरों उपजाऊ भूमि ब्रह्मपुत्र की धारा में समा चुकी है। बरसात के मौसम के आगमन के साथ ही क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों के बीच भय और अनिश्चितता का माहौल व्याप्त हो गया है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1996-97 से ही यह क्षेत्र भीषण कटाव की समस्या से जूझ रहा है। पिछले लगभग तीन दशकों में नदी ने धीरे-धीरे गांवों की कृषि भूमि, चरागाह, बागान तथा कई महत्वपूर्ण भू-भागों को अपने आगोश में ले लिया है। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान समय में भी लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र गंभीर कटाव की चपेट में है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि कई स्थानों पर कटाव मुख्य सुरक्षा तटबंध (माथाउरी) से मात्र 150 मीटर की दूरी तक पहुंच गया है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आगामी बरसात में तटबंध और आसपास के कई गांवों के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है।

क्षेत्र के निवासियों ने आरोप लगाया है कि जल संसाधन विभाग द्वारा वर्षों से कटाव रोकने के लिए केवल अस्थायी और सीमित उपाय किए जाते रहे हैं। उनका कहना है कि समस्या के समाधान के लिए आज तक कोई वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना लागू नहीं की गई। ग्रामीणों का आरोप है कि कटाव-रोधी कार्यों के लिए सबसे उपयुक्त माने जाने वाले शुष्क मौसम में भी विभाग द्वारा आवश्यक कदम नहीं उठाए जाते।

स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि जब तक मीडिया में समाचार प्रकाशित या प्रसारित नहीं होता, तब तक संबंधित विभाग सक्रियता नहीं दिखाता। उनका कहना है कि हर वर्ष बरसात के दौरान आपातकालीन कार्य शुरू किए जाते हैं, लेकिन इससे स्थायी समाधान नहीं निकल पाता और कटाव की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

ग्रामीण संगठनों और क्षेत्रीय नागरिकों ने राज्य सरकार तथा जल संसाधन विभाग से मांग की है कि दिसांगमुख क्षेत्र के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित कर वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए तथा ब्रह्मपुत्र के कटाव को रोकने के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी परियोजना लागू की जाए। उनका कहना है कि यदि शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कई गांवों का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।

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