शिवसागर के ऐतिहासिक बोरपुखुरी में दिखी दुर्लभ विशालकाय कछुए की जलक्रीड़ा : भीषण गर्मी के बीच शिवदोल के पीछे पूजा घाट पर कैमरे में कैद हुआ अद्भुत नज़ारा : प्रकृति प्रेमियों में उत्सुकता : एक क्विंटल से अधिक वजन होने की संभावना; संरक्षण की उठी मांग

शिवसागर, 20 जून : असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल शिवसागर के प्रसिद्ध बोरपुखुरी (शिवसागर टैंक) में इन दिनों एक दुर्लभ और मनमोहक दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। भीषण गर्मी के बीच विशाल जलाशय के शांत जल में एक विशालकाय कछुए की जलक्रीड़ा ने स्थानीय लोगों, पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इस दुर्लभ दृश्य के सामने आने के बाद बोरपुखुरी एक बार फिर प्रकृति और जैव विविधता को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
शिवदोल के पीछे पूजा घाट पर दिखाई दिया विशाल कछुआ
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह अद्भुत दृश्य बोरपुखुरी के किनारे स्थित ऐतिहासिक शिवदौल मंदिर परिसर के पीछे बने पूजा घाट पर देखने को मिला। श्रद्धालु और पर्यटक जब घाट पर मौजूद थे, तभी जलाशय में अचानक हलचल दिखाई दी। कुछ ही देर बाद पानी की सतह पर एक विशालकाय कछुआ नजर आया।
घाट पर मौजूद कई लोगों ने अपने मोबाइल फोन और कैमरों में इस दृश्य को कैद कर लिया। देखते ही देखते इसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिससे लोगों में उत्सुकता और बढ़ गई।

श्रद्धालुओं द्वारा डाले गए भोजन के लिए सतह पर आया कछुआ
स्थानीय लोगों का कहना है कि पूजा घाट पर आने वाले श्रद्धालु अक्सर जलाशय में मछलियों और अन्य जलचरों के लिए खाद्य सामग्री डालते हैं। माना जा रहा है कि भोजन ग्रहण करने के उद्देश्य से ही यह विशाल कछुआ पानी की गहराइयों से सतह पर आया था।
कछुए की गतिविधियों को देखकर वहां मौजूद लोग आश्चर्यचकित रह गए। कई लोगों ने इसे वर्षों बाद देखा गया सबसे बड़ा कछुआ बताया।
दुर्लभ या विलुप्तप्राय प्रजाति होने की संभावना
प्रकृति प्रेमियों और स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कछुआ संभवतः किसी दुर्लभ या अब बहुत कम दिखाई देने वाली प्रजाति का हो सकता है। हालांकि वन विभाग या वन्यजीव विशेषज्ञों की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक पहचान नहीं की गई है।
इसके आकार और शरीर की बनावट को देखते हुए स्थानीय लोगों का अनुमान है कि इसका वजन एक क्विंटल से भी अधिक हो सकता है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह बोरपुखुरी में पाए जाने वाले सबसे बड़े कछुओं में से एक हो सकता है।
आहोम युग की ऐतिहासिक धरोहर है बोरपुखुरी
शिवसागर का बोरपुखुरी केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि असम के गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रतीक है। इसका निर्माण अठारहवीं शताब्दी में अहोम रानी अंबिका द्वारा कराया गया था। लगभग 120 एकड़ क्षेत्र में फैला यह विशाल जलाशय शिवसागर शहर की पहचान माना जाता है।
बोरपुखुरी के किनारे स्थित शिवदोल, विष्णुदोल और देवीदोल मंदिर इसे धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान करते हैं। वर्षभर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।
जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र
विशेषज्ञों के अनुसार बोरपुखुरी केवल ऐतिहासिक महत्व का स्थल नहीं है, बल्कि यह अनेक प्रकार की मछलियों, कछुओं, अन्य जलचर जीवों और प्रवासी पक्षियों का भी महत्वपूर्ण आवास है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बड़े और दुर्लभ कछुए की उपस्थिति इस जलाशय की समृद्ध जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन का सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि ऐतिहासिक जलाशय आज भी कई महत्वपूर्ण जीवों को आश्रय प्रदान कर रहे हैं।
संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की उठी मांग
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और प्रकृति संरक्षण से जुड़े लोगों ने इस घटना के बाद वन विभाग से कछुए की पहचान और संरक्षण के लिए विशेष पहल करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि यह वास्तव में कोई दुर्लभ या विलुप्तप्राय प्रजाति है, तो इसके संरक्षण के लिए तत्काल वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।
उन्होंने बोरपुखुरी की जैविक संपदा के व्यापक सर्वेक्षण और नियमित निगरानी की भी मांग की है, ताकि यहां मौजूद दुर्लभ जीव-जंतुओं का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
कछुए की जलक्रीड़ा का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। लोग इसे शिवसागर की प्राकृतिक धरोहर और पर्यावरणीय समृद्धि का जीवंत उदाहरण बता रहे हैं।
कई लोगों ने इसे “बोरपुखुरी का रहस्यमय प्रहरी” और “शिवसागर की जीवित प्राकृतिक विरासत” तक बताया है। सोशल मीडिया पर इस दृश्य को लेकर हजारों लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और इसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है।
प्राकृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश
बोरपुखुरी में विशालकाय कछुए की यह दुर्लभ उपस्थिति एक बार फिर इस बात का प्रमाण है कि ऐतिहासिक जलाशय केवल सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि जैव विविधता के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इनके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन पर ध्यान दिया जाए, तो आने वाली पीढ़ियां भी ऐसे दुर्लभ जीवों और प्राकृतिक चमत्कारों को देख सकेंगी।
शिवसागर के बोरपुखुरी में दिखाई दिया यह विशालकाय कछुआ फिलहाल लोगों की जिज्ञासा, आकर्षण और प्रकृति के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता का प्रतीक बन गया है।




