ओएनजीसी की कथित असम-विरोधी नीतियों के खिलाफ शिवसागर में आटासू का धरना : असम की तेल-संपदा को निजी हाथों में सौंपने की साजिश का आरोप, प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की मांग : मुख्यमंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेजा 10 सूत्रीय ज्ञापन, आंदोलन तेज करने की चेतावनी
“असम की संपदा से कमाई, लेकिन असमियों की अनदेखी” : बसंत गोगोई

शिवसागर, 19 जून : असम की प्राकृतिक संपदा, स्थानीय अधिकारों और रोजगार नीति के मुद्दे को लेकर सदौ ताई अहोम छात्र संस्था (आटासू) एक बार फिर मुखर हो गई है। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) की कथित असम-विरोधी नीतियों, स्थानीय लोगों की उपेक्षा तथा असम की तेल-संपदा को क्रमशः कमजोर करने के आरोप लगाते हुए संगठन ने गुरुवार को शिवसागर नगर में धरना-प्रदर्शन किया।
आटासू की केंद्रीय समिति के नेतृत्व में आयोजित इस विरोध कार्यक्रम में संगठन के केंद्रीय एवं जिला स्तर के अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों ने ओएनजीसी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए स्थानीय युवाओं के अधिकारों की रक्षा और असम की संपदा पर असमवासियों के अधिकार सुनिश्चित करने की मांग उठाई।

“असम की संपदा से कमाई, लेकिन असमियों की अनदेखी” : बसंत गोगोई
धरना कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आटासू के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत गोगोई ने आरोप लगाया कि ओएनजीसी ने असम की धरती से तेल और प्राकृतिक गैस निकालकर हजारों करोड़ रुपये का लाभ अर्जित किया है, लेकिन राज्य के शिक्षित युवाओं के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है।
उन्होंने कहा कि ओएनजीसी में नौकरी पाने के लिए असम के हजारों छात्र-छात्राएं वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन संस्था ने लगभग पूरी तरह नई भर्ती प्रक्रिया बंद कर दी है। इससे राज्य के योग्य और शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसरों से वंचित होना पड़ रहा है।
गोगोई ने आरोप लगाया कि पिछले लगभग दो दशकों से ओएनजीसी भर्ती प्रक्रिया, ठेका आवंटन तथा अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की लगातार उपेक्षा कर रही है।

महत्वपूर्ण कार्यालय देहरादून स्थानांतरित करने का आरोप
आटासू ने आरोप लगाया कि ओएनजीसी ने असम एसेट के कई महत्वपूर्ण कार्यालयों और प्रशासनिक इकाइयों को रणनीतिक रूप से देहरादून स्थानांतरित कर दिया है। संगठन का दावा है कि असम में नई नियुक्तियां बंद रखी गई हैं, जबकि अन्य राज्यों में भर्ती कर बाद में कर्मचारियों को असम में स्थानांतरित किया जा रहा है।
संगठन का कहना है कि इस नीति के कारण असम के प्रतिभाशाली युवाओं को रोजगार के अवसरों से वंचित होना पड़ रहा है।

“ओएनजीसी को कमजोर कर निजीकरण की तैयारी”
बसंत गोगोई ने कहा कि एक समय ओएनजीसी असम एसेट में लगभग 10 हजार कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन वर्तमान में यह संख्या घटकर करीब 1,800 रह गई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ओएनजीसी ने कई तेल क्षेत्रों को अलाभकारी बताकर निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया, जबकि वही कंपनियां उन क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उत्पादन कर रही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संस्था को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर कर निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट का आरोप
आटासू ने ओएनजीसी अस्पतालों की स्थिति पर भी चिंता जताई। संगठन के अनुसार, अनुभवी स्थानीय चिकित्सकों का अन्य राज्यों में तबादला कर दिया गया है और उनकी जगह अपेक्षाकृत कम अनुभवी बाहरी चिकित्सकों को नियुक्त किया गया है।
संगठन का दावा है कि इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हुई है और ओएनजीसी कर्मचारियों के साथ-साथ स्थानीय जनता को भी परेशानी उठानी पड़ रही है।

प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की मांग
बसंत गोगोई ने मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में हस्तक्षेप करने और ओएनजीसी की कथित असम-विरोधी नीतियों की समीक्षा कराने की मांग की।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो राज्यव्यापी जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।

मुख्यमंत्री को सौंपा गया 10 सूत्रीय ज्ञापन
धरना कार्यक्रम के उपरांत आटासू की केंद्रीय समिति ने मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा को संबोधित एक 10 सूत्रीय ज्ञापन जिला प्रशासन के माध्यम से भेजा। ज्ञापन की प्रतिलिपि ओएनजीसी असम एसेट के कार्यकारी निदेशक उदय पासवान को भी प्रेषित की गई।
ज्ञापन पर केंद्रीय अध्यक्ष बसंत गोगोई, शिवसागर जिला समिति के अध्यक्ष अखिल अहोम, संयुक्त सचिव पार्थ गोगोई, देवजीत चांगमाई, महिला मंच की अध्यक्षा विकिरानी मोहन, कार्यकारी अध्यक्षा परी गोगोई, संयुक्त सचिव अंकिता गोगोई तथा वर्षा चांगमाई के हस्ताक्षर हैं।

असम में ओएनजीसी के ऐतिहासिक योगदान का भी उल्लेख
ज्ञापन में ओएनजीसी के असम में ऐतिहासिक योगदान का भी उल्लेख किया गया है। संगठन ने बताया कि वर्ष 1958 में नाजिरा में ओएनजीसी असम बेस की स्थापना की गई थी। 9 जून 1959 को दिसांगमुख में पहली बार तेल अन्वेषण ड्रिलिंग शुरू हुई थी।
इसके बाद 7 दिसंबर 1960 को रूसी निर्मित ‘URALMASH’ रिग की सहायता से रुद्रसागर में ऐतिहासिक तेल खोज हुई और 12 मार्च 1966 से वहां व्यावसायिक उत्पादन प्रारंभ हुआ। बाद में लाकवा और गेलेकी जैसे तेल क्षेत्रों ने असम की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की।
आटासू की प्रमुख 10 मांगें
1. कार्यालयों का स्थानांतरण बंद किया जाए
ओएनजीसी असम एसेट के केंद्रीय, विभागीय और अनुसंधान कार्यालयों को शिवसागर अथवा असम से बाहर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए।
2. 100 प्रतिशत स्थानीय भर्ती सुनिश्चित हो
लंबे समय से बंद भर्ती प्रक्रिया पुनः शुरू कर सभी रिक्त पदों पर स्थानीय शिक्षित बेरोजगार युवाओं की नियुक्ति की जाए।
3. निजीकरण की प्रक्रिया रोकी जाए
ओएनजीसी को कमजोर कर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कथित नीति समाप्त की जाए।
4. शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाए
तेल क्षेत्रों और औद्योगिक प्रदूषण से प्रभावित इलाकों में जल शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित कर प्रत्येक परिवार को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
5. पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष योजना
व्यापक वृक्षारोपण और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
6. स्थानीय कला एवं संस्कृति का संरक्षण
बुनाई, कुटीर उद्योग तथा अन्य पारंपरिक सांस्कृतिक गतिविधियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
7. खेल अवसंरचना का विकास
स्थानीय युवाओं के लिए खेल मैदान और खेल सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
8. ठेका आवंटन की व्यवस्था नाजिरा से संचालित हो
बाहरी राज्यों से ठेका नियंत्रण की व्यवस्था समाप्त कर पूर्व की तरह नाजिरा स्थित असम एसेट कार्यालय से ही ठेके आवंटित किए जाएं।
9. ओएनजीसी अस्पतालों को सुदृढ़ किया जाए
अनुभवी चिकित्सकों की नियुक्ति सुनिश्चित कर अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।
10. चाऊलुंग चुकाफा मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल का विस्तार
प्रस्तावित 300 बिस्तरों की व्यवस्था लागू की जाए तथा अस्पताल में व्याप्त अनियमितताओं और अत्यधिक उपचार खर्च पर नियंत्रण किया जाए।
मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा
आटासू ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक संगठन जनता के सहयोग से ओएनजीसी के खिलाफ लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रखेगा।




