नलबाड़ी में असमिया अस्मिता के समर्थन में AJYCP का जोरदार अभियान : असमिया भाषा में नामपट्ट नहीं लगाने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन : कई दुकानों और प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड पर पोता गया काला रंग : स्थानीय भाषा को सम्मान देने की मांग तेज
असमिया में साइनबोर्ड लगाने के लिए 15 दिनों का अल्टीमेटम : 'असमिया पहले' के नारे के साथ सड़कों पर उतरे असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद के कार्यकर्ता : प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग

नलबाड़ी, 12 जून : असमिया भाषा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा को लेकर नलबाड़ी जिले में शुक्रवार को असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद (AJYCP) ने एक व्यापक विरोध अभियान चलाया। संगठन के कार्यकर्ताओं ने उन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रदर्शन किया जिनके साइनबोर्ड पर असमिया भाषा का उपयोग नहीं किया गया था। विरोध के दौरान कार्यकर्ताओं ने कई प्रतिष्ठानों के बोर्डों पर काला रंग पोतकर अपना रोष व्यक्त किया और स्थानीय भाषा को प्राथमिकता देने की मांग उठाई।
इस अभियान ने नलबाड़ी शहर और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक चर्चा का विषय बना दिया है। ‘अजायुछाप’ का कहना है कि असम में व्यापार करने वाले सभी प्रतिष्ठानों को असमिया भाषा को सम्मान देते हुए अपने नामपट्टों पर असमिया भाषा का प्रयोग करना चाहिए। संगठन का आरोप है कि राज्य के कई शहरों और कस्बों में बड़ी संख्या में ऐसे प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं जिनके बोर्डों पर केवल अंग्रेजी या अन्य भाषाओं का प्रयोग किया गया है, जिससे असमिया भाषा की उपेक्षा हो रही है।
असमिया भाषा को सम्मान दिलाने के लिए सड़क पर उतरा संगठन
प्रदर्शन के दौरान ‘अजायुछाप’ कार्यकर्ताओं ने नलबाड़ी के विभिन्न बाजार क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने ऐसे प्रतिष्ठानों की पहचान की जिनके नामपट्टों पर असमिया भाषा का प्रयोग नहीं किया गया था। इसके बाद कई स्थानों पर प्रतीकात्मक विरोध के रूप में बोर्डों पर काला रंग लगाया गया।
कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह अभियान किसी व्यक्ति या व्यवसाय के खिलाफ नहीं, बल्कि असमिया भाषा और संस्कृति के सम्मान के लिए चलाया गया है। उनका कहना है कि असम की भूमि पर व्यापार करने वाले प्रतिष्ठानों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे राज्य की राजभाषा और स्थानीय भाषा को उचित स्थान दें।
‘अजायुछाप’ ने क्या कहा ?
असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद लंबे समय से असमिया भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाती रही है। संगठन का मानना है कि वैश्वीकरण और बाजारवाद के दौर में स्थानीय भाषाओं की पहचान को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। ‘अजायुछाप’ की स्थापना असमिया समाज के अधिकारों और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी और यह संगठन समय-समय पर भाषा, भूमि और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करता रहा है।
संगठन के नेताओं ने कहा कि अगले 15 दिनों में यदि व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्वेच्छा से अपने नामपट्टों पर असमिया भाषा शामिल नहीं करते हैं तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।
राज्यभर में पहले भी उठ चुका है यह मुद्दा
असम में नामपट्टों पर स्थानीय भाषा को प्राथमिकता देने का मुद्दा नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न सामाजिक और छात्र संगठनों ने बार-बार यह मांग उठाई है कि सभी सरकारी कार्यालयों, निजी प्रतिष्ठानों, दुकानों, शोरूमों और व्यावसायिक संस्थानों के बोर्डों पर असमिया भाषा अनिवार्य रूप से लिखी जाए।
भाषा संरक्षण से जुड़े संगठनों का तर्क है कि स्थानीय भाषा का उपयोग केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न नहीं बल्कि आम नागरिकों की सुविधा से भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीण और बुजुर्ग लोगों के लिए स्थानीय भाषा में लिखे गए नामपट्ट अधिक उपयोगी होते हैं।
स्थानीय लोगों का मिला मिश्रित समर्थन
नलबाड़ी में चलाए गए इस अभियान को लेकर स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कई नागरिकों ने ‘अजायुछाप’ की मांग को उचित बताते हुए कहा कि असमिया भाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और सभी प्रतिष्ठानों को स्थानीय भाषा में नामपट्ट लगाने चाहिए।
हालांकि कुछ व्यापारियों ने यह भी कहा कि प्रशासन को पहले जागरूकता अभियान चलाना चाहिए और उसके बाद नियमों को लागू करना चाहिए। उनका कहना है कि कई प्रतिष्ठानों ने अनजाने में केवल अंग्रेजी भाषा में बोर्ड लगाए हैं और उन्हें सुधार के लिए समय दिया जाना चाहिए।
भाषा और पहचान का प्रश्न
विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि किसी समाज की पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का आधार होती है। असमिया भाषा को लेकर समय-समय पर राज्य में कई आंदोलन हुए हैं और स्थानीय संगठनों द्वारा इसे संरक्षण देने की मांग लगातार उठाई जाती रही है।
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि तेजी से बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश में स्थानीय भाषाओं को सार्वजनिक जीवन में स्थान देना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहें।
प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग
‘अजायुछाप’ ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि ऐसे सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की पहचान की जाए जो स्थानीय भाषा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। संगठन ने प्रशासन से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर असमिया भाषा में नामपट्ट लगाना अनिवार्य करने की भी मांग की है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले दिनों में राज्य के अन्य जिलों में भी इसी प्रकार के अभियान चलाए जाएंगे।
नलबाड़ी में ‘अजायुछाप’ द्वारा चलाया गया यह अभियान एक बार फिर असम में भाषा और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को केंद्र में ले आया है। असमिया भाषा में नामपट्ट लगाने की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब व्यापक जनचर्चा का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासन और व्यापारिक समुदाय इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।




