विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस पर शिवसागर में जागरूकता की अनूठी पहल : मारवाड़ी महिला सम्मेलन की शिवसागर नवशक्ति सृजन शाखा द्वारा छात्राओं को स्वच्छता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास का संदेश
नाटक के माध्यम से तोड़ी गईं सामाजिक भ्रांतियां : असम की सांस्कृतिक परंपराओं से भी जोड़ा गया विषय

शिवसागर, 27 मई : विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस के अवसर पर शिवसागर में महिला स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता को केंद्र में रखकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की असम प्रांत अंतर्गत शिवसागर नवशक्ति सृजन शाखा द्वारा आयोजित इस विशेष जागरूकता अभियान में किशोरियों और छात्राओं को मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण, मानसिक जागरूकता तथा सामाजिक दृष्टिकोण के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई।
यह कार्यक्रम थानुराम गोगोई मेमोरियल हायर सेकेंडरी स्कूल परिसर में आयोजित किया गया, जहां विद्यालय की बड़ी संख्या में छात्राओं, शिक्षकों, अभिभावकों तथा महिला सम्मेलन की सदस्याओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जानकारी देना नहीं था, बल्कि समाज में इस विषय से जुड़ी झिझक, अंधविश्वास, शर्म और गलत धारणाओं को समाप्त कर किशोरियों में आत्मविश्वास विकसित करना भी था।
मुख्य आकर्षण रहा प्रभावशाली नाट्य मंचन
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण शाखा की सदस्याओं द्वारा प्रस्तुत एक प्रभावशाली नाट्य मंचन रहा। इस नाटक में अत्यंत सहज और संवेदनशील तरीके से यह दिखाया गया कि मासिक धर्म महिलाओं के जीवन की एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, जिसे शर्म, डर या छुपाने की चीज नहीं माना जाना चाहिए। नाटक में सैनिटरी पैड के सही उपयोग, समय-समय पर पैड बदलने की आवश्यकता, संक्रमण से बचाव, व्यक्तिगत स्वच्छता, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया, जिससे छात्राएं सहज रूप से विषय को समझ सकीं।
नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से यह भी दर्शाया गया कि ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म को लेकर अनेक मिथक और सामाजिक वर्जनाएं मौजूद हैं। कई स्थानों पर लड़कियों को रसोई, धार्मिक स्थलों और सामाजिक गतिविधियों से दूर रखा जाता है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार मासिक धर्म एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है और इसे लेकर किसी प्रकार की हीन भावना या सामाजिक भेदभाव उचित नहीं है।

स्वच्छता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी
विशेषज्ञों और आयोजन से जुड़ी सदस्याओं ने छात्राओं को बताया कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाए रखना महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। नियमित अंतराल पर सैनिटरी पैड बदलना, साफ पानी का उपयोग करना, संक्रमण से बचाव, आयरन एवं पोषणयुक्त भोजन लेना तथा पर्याप्त आराम करना स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। छात्राओं को यह भी समझाया गया कि यदि मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक दर्द, अनियमितता या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हों तो बिना झिझक चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
विद्यालय प्रशासन का रहा पूर्ण सहयोग
कार्यक्रम में विद्यालय प्रशासन की ओर से भी पूर्ण सहयोग प्रदान किया गया। शिक्षकों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि किशोरावस्था में छात्राओं के लिए इस प्रकार के स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम अत्यंत आवश्यक हैं। शिक्षकों ने कहा कि जब मासिक धर्म जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा होती है, तो छात्राओं में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग बनती हैं।
नेतृत्व एवं सहभागिता
कार्यक्रम में नवशक्ति सृजन शाखा की अध्यक्षा रितिका डालमिया एवं सचिव नैना राठी की विशेष उपस्थिति रही। इसके अलावा शाखा की सक्रिय सदस्याओं नेहा अग्रवाल, सोनम अग्रवाल, संध्या राठी, प्रीतिका अग्रवाल, आयुषी अग्रवाल, सुनिधि मूंधड़ा, स्वाति अग्रवाल एवं नीता अग्रवाल ने कार्यक्रम के संचालन और जागरूकता अभियान को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम की जानकारी शाखा की जनसंपर्क अधिकारी सोनम अग्रवाल द्वारा साझा की गई।

विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस का महत्व
विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष 28 मई को “विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस” मनाया जाता है। इसकी शुरुआत जर्मन संस्था WASH United द्वारा वर्ष 2014 में की गई थी। इस दिवस का उद्देश्य महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य अधिकारों, स्वच्छता, सुरक्षित सैनिटरी सुविधाओं और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना है।
जागरूकता अभियान क्यों जरूरी ?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत सहित दुनिया के कई देशों में आज भी लाखों किशोरियां मासिक धर्म से जुड़ी सही जानकारी, स्वच्छता संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, गरीबी और सामाजिक संकोच के कारण कई लड़कियां संक्रमण, एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं।
यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की विभिन्न रिपोर्टों में भी यह बात सामने आ चुकी है कि स्कूलों में पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में किशोरियां मासिक धर्म के दौरान विद्यालय नहीं जा पातीं। इसी पृष्ठभूमि में शिवसागर में आयोजित यह कार्यक्रम सामाजिक परिवर्तन और स्वास्थ्य जागरूकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
असम की संस्कृति में मासिक धर्म : सम्मान, परंपरा और स्त्रीत्व का उत्सव
कार्यक्रम के दौरान मासिक धर्म से जुड़ी असम की पारंपरिक सांस्कृतिक मान्यताओं और सामाजिक दृष्टिकोण पर भी चर्चा की गई। असमिया समाज में पहली बार मासिक धर्म शुरू होने को केवल जैविक परिवर्तन नहीं, बल्कि लड़की के जीवन में स्त्रीत्व की ओर बढ़ने के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जाता है।
असम के कई समुदायों में इस अवसर को “तुलोनी बिया” अथवा “सुआनी पूजा” के रूप में मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। असमिया भाषा में “तुलोनी” का अर्थ छोटी लड़की और “बिया” का अर्थ विवाह होता है। हालांकि यह वास्तविक विवाह नहीं होता, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से लड़की के बचपन से युवावस्था में प्रवेश का सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है।
क्या है “तुलोनी बिया” की परंपरा?
जब किसी लड़की को पहली बार मासिक धर्म होता है, तब परिवार की महिलाएं उसकी विशेष देखभाल करती हैं। पारंपरिक रूप से कुछ दिनों तक उसे विश्राम दिया जाता है और परिवार की बुजुर्ग महिलाएं उसे शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानकारी देती हैं। इस दौरान उसे पौष्टिक भोजन दिया जाता है और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है।
कुछ दिनों बाद परिवार में एक विशेष समारोह आयोजित किया जाता है। लड़की को पारंपरिक असमिया पोशाक—विशेष रूप से मेखेला-चादर—पहनाई जाती है। रिश्तेदार, पड़ोसी और परिवारजन उसे आशीर्वाद, उपहार और शुभकामनाएं देते हैं। कई स्थानों पर विवाह जैसी रस्मों का भी प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गीत, सामूहिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव का हिस्सा होते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह परंपरा असमिया समाज में स्त्रीत्व, मातृत्व और महिलाओं की जैविक क्षमता को सम्मान देने का प्रतीक रही है। भारत के कई हिस्सों में जहां मासिक धर्म को अब भी सामाजिक वर्जना माना जाता है, वहीं असम की यह सांस्कृतिक परंपरा मासिक धर्म को सामाजिक स्वीकृति और सम्मान देने का सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

बदलते समय के साथ बदल रही परंपराएं
हालांकि आधुनिक समय में “तुलोनी बिया” का स्वरूप काफी बदल चुका है। अब शिक्षित और शहरी परिवारों में इसे अत्यधिक धार्मिक या सामाजिक आयोजन के बजाय एक पारिवारिक अवसर के रूप में मनाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ संतुलित करना आवश्यक है, ताकि किशोरियों में शर्म या अलगाव की भावना उत्पन्न न हो।
अब जागरूक परिवार मासिक धर्म के दौरान स्वास्थ्य शिक्षा, मानसिक समर्थन, पोषण और स्वच्छता पर अधिक जोर दे रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक संगठनों द्वारा भी इस विषय पर खुलकर संवाद करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
कामाख्या मंदिर और मासिक धर्म की सांस्कृतिक मान्यता
असम में स्त्री शक्ति और मासिक धर्म से जुड़ी सांस्कृतिक मान्यता का सबसे बड़ा उदाहरण गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर और उससे जुड़ा “अंबुबाची मेला” माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में देवी कामाख्या रजस्वला होती हैं। इस दौरान मंदिर कुछ दिनों के लिए बंद रहता है और बाद में विशेष पूजा-अर्चना के साथ पुनः खोला जाता है।
देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस मेले में भाग लेते हैं। यह परंपरा भारतीय सांस्कृतिक धारणाओं में मासिक धर्म को देवी शक्ति, सृजन और प्रकृति की उर्वरता से जोड़ने का अनूठा उदाहरण मानी जाती है।
सामाजिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण हैं ऐसे कार्यक्रम?
विशेषज्ञों का मानना है कि मासिक धर्म से जुड़े जागरूकता कार्यक्रम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रम मासिक धर्म को प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता विकसित करते हैं। किशोरियों में आत्मविश्वास और स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाते हैं। सा ही परिवार और समाज के बीच संवाद को मजबूत करते हैं। महिलाओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। सामाजिक मिथकों और भेदभाव को कम करने में सहायता करते हैं। किशोरियों को मानसिक और सामाजिक समर्थन प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम के समापन पर छात्राओं ने मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूक रहने तथा अपने परिवार और समाज में भी इस विषय पर खुलकर संवाद करने का संकल्प लिया। आयोजन में उपस्थित लोगों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम केवल स्वास्थ्य जागरूकता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि महिलाओं के सम्मान, आत्मविश्वास और सामाजिक समानता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम हैं।
आज जब दुनिया भर में महिला स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर व्यापक अभियान चलाए जा रहे हैं, तब शिवसागर में आयोजित यह पहल सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है।




