शिवसागर में बाढ़ के स्थायी समाधान और ऐतिहासिक रंगपुर की सुरक्षा की उठी आवाज, वैज्ञानिक जल-प्रबंधन पर जोर : तीन संगठनों की संयुक्त प्रेस वार्ता : 19 जुलाई की विनाशकारी बाढ़ के वास्तविक कारणों की वैज्ञानिक जांच की मांग : खेतों में अब भी जलभराव का दावा : नामदांग-डिमौ नदियों की वैज्ञानिक खुदाई, पुराने जलमार्गों के पुनर्जीवन और अतिक्रमण हटाने पर जोर
रंगघर-तलातल घर समेत ऐतिहासिक धरोहरों पर जलभराव से खतरे की चेतावनी : 10 सूत्री मांगपत्र प्रशासन को सौंपा : दीपज्योति गोगोई बोले—बाढ़ प्रभावित परिवारों को आर्थिक रूप से दोबारा खड़ा करना सरकार की जिम्मेदारी, यूट्यूबर या सामाजिक संगठनों की नहीं

शिवसागर, 4 सितंबर : ऊपरी असम में 19 जुलाई को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब शिवसागर में बाढ़ के स्थायी समाधान, वैज्ञानिक जल-प्रबंधन और आहोम राजाओं की ऐतिहासिक राजधानी रंगपुर की अमूल्य विरासत की सुरक्षा को लेकर व्यापक पहल की मांग उठी है। शुक्रवार को ऐतिहासिक तलातल घर परिसर में आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में पाटकाई सभ्यता सुरक्षा समन्वय मंच (Patkai Civilization Protection Coordination Forum-PCPCF), रूपही-जेरेंगा सुरक्षा समिति और रंगपुर प्राचीन कीर्ति-चिह्न संरक्षण समिति ने बाढ़ के वास्तविक कारणों की वैज्ञानिक जांच और पूरे क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक जल-प्रबंधन योजना तैयार करने की मांग की।

तीनों संगठनों ने कहा कि बाढ़ की समस्या का समाधान केवल तात्कालिक राहत या नदियों की सामान्य सफाई तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए नदी तंत्र, पुराने प्राकृतिक जलमार्गों, आर्द्रभूमियों, कृषि क्षेत्रों, अतिक्रमण, सड़क-पुल जैसी संरचनाओं और पूरे रंगपुर क्षेत्र की जलनिकासी व्यवस्था का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
23 अगस्त की सार्वजनिक सभा से बना साझा मंच
पाटकाई सभ्यता सुरक्षा समन्वय मंच का गठन 23 अगस्त 2026 को नाजिरा के एमसी क्लब में दो सौ से अधिक नागरिकों, विशेषज्ञों और जागरूक लोगों की मौजूदगी में आयोजित ‘ऊपरी असम की विनाशकारी बाढ़ की विभीषिका: वैज्ञानिक विश्लेषण और भविष्य-दृष्टि’ विषयक सार्वजनिक सभा के प्रस्तावों के आधार पर किया गया था।
मंच का उद्देश्य 19 जुलाई की विनाशकारी बाढ़ के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन कराने के साथ पाटकाई पर्वतीय क्षेत्र की तलहटी में विकसित हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता, स्थानीय लोगों की जमीन, आजीविका, प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकी और ऐतिहासिक विरासतों की रक्षा के लिए विभिन्न संगठनों को साझा मंच पर लाना बताया गया।
‘किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं, बाढ़ के वास्तविक कारणों की हो वैज्ञानिक पहचान’
मंच के संयोजक देबांग सौरभ गोगोई ने कहा कि संगठन किसी क्षणिक आंदोलन या केवल पर्यावरणीय विरोध तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य भूमि अधिकार, स्थानीय आजीविका, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिक संतुलन और ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक तथा जनभागीदारी आधारित प्रयास करना है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि बाढ़ जैसे गंभीर संकट का समाधान किसी मंत्री, विधायक या एक-दो व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराने भर से संभव नहीं है। वैज्ञानिक रूप से यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि अत्यधिक वर्षा के अलावा कोयला, पत्थर या बालू खनन, नदी प्रवाह में बदलाव, प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों में अवरोध, अतिक्रमण अथवा अन्य मानवीय गतिविधियों ने आपदा की गंभीरता बढ़ाने में कोई भूमिका निभाई या नहीं।
मंच ने इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन में सरकार को पूर्ण सहयोग देने की बात कही।
19 जुलाई की बाढ़ की व्यापक वैज्ञानिक जांच की मांग
संयोजक दीपज्योति गोगोई ने कहा कि 19 जुलाई की विनाशकारी बाढ़ के वास्तविक कारणों को अब तक पर्याप्त वैज्ञानिक आधार पर स्पष्ट नहीं किया गया है। दुनिया के विभिन्न बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की तरह यहां भी वर्षा, नदी प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र और भू-आकृतिक परिवर्तनों का विशेषज्ञों के माध्यम से अध्ययन कराया जाना चाहिए।
उन्होंने अवैध कोयला खनन, नदी तंत्र में कथित हस्तक्षेप, विभागीय लापरवाही और कथित ठेकेदार-केंद्रित कार्यप्रणाली की भी निष्पक्ष जांच की मांग की। मंच का कहना है कि यदि जांच में किसी मानवीय गतिविधि या प्रशासनिक चूक से आपदा की गंभीरता बढ़ने के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदारी तय कर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
‘बाढ़ पीड़ितों को फिर खड़ा करना सरकार की जिम्मेदारी’
दीपज्योति गोगोई ने बाढ़ प्रभावित परिवारों के दीर्घकालिक पुनर्वास पर विशेष जोर देते हुए कहा कि केवल कुछ किलो चावल-दाल उपलब्ध करा देना या बैंक खाते में 15 हजार रुपये भेज देना स्थायी पुनर्वास नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि जिन परिवारों के घर, खेत, पशुधन, रोजगार और आजीविका बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, उन्हें आर्थिक रूप से दोबारा खड़ा करने की मूल जिम्मेदारी सरकार की है। उनके अनुसार, यह जिम्मेदारी किसी यूट्यूबर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अथवा गैर-सरकारी सामाजिक संगठन पर नहीं डाली जा सकती।
मंच ने आजीविका पुनर्निर्माण, कृषि सहायता, टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और प्रभावित परिवारों के लिए दीर्घकालिक पुनर्वास नीति तैयार करने की मांग की।
डेढ़ महीने बाद भी खेतों में पानी जमा होने का दावा
रूपही-जेरेंगा सुरक्षा समिति के सचिव मनोरंजन बरगोहाईं ने दावा किया कि 19 जुलाई की बाढ़ के डेढ़ महीने से अधिक समय बाद भी रूपही पथार, जेरेंगा पथार, डिमौ पथार और मेटेका पथार के कई हिस्सों से पानी पूरी तरह नहीं निकल पाया है।
उनके अनुसार, जोकतली, मेटेका बनगांव, शलगुड़ी मौजा और आसपास के कृषि क्षेत्रों में लंबे समय से जलभराव के कारण किसान खेती नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र में अवरोध, नदियों-नालों की कमजोर होती क्षमता और जलमार्गों पर कथित अतिक्रमण को समस्या के प्रमुख कारणों में गिनाया।
समिति ने पुरानी नदी धाराओं, प्राकृतिक नालों, जलाशयों और आर्द्रभूमियों को पुनर्जीवित कर क्षेत्र की प्राकृतिक जलनिकासी क्षमता बहाल करने की मांग की।
रंगघर और तलातल घर की सुरक्षा को लेकर चिंता
रंगपुर प्राचीन कीर्ति-चिह्न संरक्षण समिति के सचिव अनुप गोगोई ने ऐतिहासिक रंगघर और तलातल घर के आसपास लगातार पानी जमा रहने को लेकर गंभीर चिंता जताई।
उनका कहना था कि अनियंत्रित जलभराव और पुराने प्राकृतिक निकासी मार्गों के कमजोर अथवा नष्ट होने से इन अमूल्य ऐतिहासिक स्थापत्य धरोहरों को दीर्घकाल में खतरा हो सकता है। इसलिए किसी भी बाढ़ नियंत्रण या विकास परियोजना में पुरातात्विक धरोहरों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इतिहासकार जितेन बरपात्रगोहाईं ने भी रंगपुर की ऐतिहासिक, भौगोलिक और पारिस्थितिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक संरक्षण योजना बनाने पर जोर दिया।
आहोमकालीन प्राकृतिक जल-प्रबंधन व्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर जोर
संगठनों का कहना है कि आहोम स्वर्गदेवों के समय रंगपुर नगर की योजना में प्राकृतिक नदियों, जलाशयों और जलनिकासी प्रणालियों का विशेष ध्यान रखा गया था। बाद के वर्षों में अनियंत्रित निर्माण, अतिक्रमण और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते कई परंपरागत जलमार्ग कमजोर या बाधित हो गए।
इसी कारण मंच ने आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के साथ ऐतिहासिक जलनिकासी व्यवस्था का अध्ययन कर उपयोगी पुराने जलमार्गों को पुनर्जीवित करने की मांग की है।
नामदांग नदी की वैज्ञानिक खुदाई और स्लुइस गेट पर पुनर्विचार की मांग
संयुक्त मंच ने नामदांग नदी की व्यापक वैज्ञानिक खुदाई की मांग की। संगठनों के अनुसार नदी से सिल्ट हटाने, उसकी वहन क्षमता बढ़ाने और दिखौ नदी से प्राकृतिक संपर्क बेहतर करने की जरूरत है।
मंच ने वर्तमान नामदांग स्लुइस गेट को जलवैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर अधिक उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करने की संभावना पर विचार करने का सुझाव दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि किसी भी खुदाई या संरचनात्मक कार्य के दौरान स्वर्गदेव रुद्र सिंह के शासनकाल में 1703 में निर्मित ऐतिहासिक नामदांग पत्थर पुल की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
संगठनों ने नामदांग नदी की खुदाई से जुड़े सरकारी दावों का भी स्वतंत्र तकनीकी एवं स्थल-आधारित मूल्यांकन कराने की मांग की।
नामदांग के पानी के रंग में कथित बदलाव की जांच की मांग
प्रेस वार्ता में नामदांग नदी के पानी के रंग में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया। प्रतिनिधियों ने दावा किया कि नदी के पानी में कुछ स्थानों पर हरेपन जैसा बदलाव दिखाई दे रहा है।
मंच ने कहा कि यदि इसका संबंध ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में खनन, प्रदूषण अथवा किसी अन्य पर्यावरणीय बदलाव से है तो इसकी स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच की जानी चाहिए। पानी की गुणवत्ता के साथ संभावित पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य प्रभाव का परीक्षण कराने की भी मांग की गई।
डिमौ नदी सहित प्राकृतिक जलधाराओं को पुनर्जीवित करने की मांग
संगठनों ने डिमौ नदी की खुदाई पूरी करने और उसके प्राकृतिक जलप्रवाह को बहाल करने पर जोर दिया। मंच के अनुसार डिमौ, मेटेका, रूपही और जेरेंगा क्षेत्रों में जमा पानी की निकासी के लिए नदी और उससे जुड़े जलमार्गों की गहराई तथा चौड़ाई का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।
इसके साथ पाभोजान, सोलाजान, आइला और कछारीजान समेत अन्य प्राकृतिक जलधाराओं में कथित अवरोध एवं अतिक्रमण हटाने की मांग की गई।
पाभोगढ़ की ओर जाने वाले मार्ग पर छोटे कल्वर्ट के स्थान पर पूर्ण लंबाई का पुल बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया, ताकि पानी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो।
छोटे कल्वर्ट की जगह पर्याप्त क्षमता वाले पुलों का प्रस्ताव
मंच का दावा है कि कई स्थानों पर मौजूदा छोटे कल्वर्ट भारी मात्रा में पानी निकालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इस कारण सोलाजान अलिसिगा, पाभोजान, डाउकी आली और केरीमेरी गढ़ सहित महत्वपूर्ण जलनिकासी मार्गों पर पर्याप्त चौड़ाई वाले पुल बनाने की मांग की गई।
नामदांग पत्थर पुल के निकट चार लेन राष्ट्रीय राजमार्ग के हिस्से में भी प्राकृतिक जलप्रवाह को बनाए रखने के लिए उच्च क्षमता वाला पुल अथवा उपयुक्त जलनिकासी ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया गया।
पुराने जलमार्ग खोलकर रूपही पथार का पानी निकालने का प्रस्ताव
रूपही पथार और आसपास के क्षेत्रों से पानी निकालने के लिए पुराने प्राकृतिक जलमार्गों को पुनर्जीवित करने की मांग की गई। इसके तहत पहरादार आली के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग-37 से सटे मेसिजान, न-आली क्रिश्चियन गांव में दिखौ नदी की पुरानी छोड़ी गई धारा तथा जयसागर तीनआली के बरआली स्थित पुल से जुड़े नाले समेत पुराने निकासी मार्गों की खुदाई, सफाई और अतिक्रमण हटाने का प्रस्ताव रखा गया।
संगठनों का मानना है कि इससे रूपही पथार के साथ रंगघर और तलातल घर के आसपास के जलभराव को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा आइला, गेला नामदांग, कछारीजान, न-खना, कोमोराजान और मिटोंग नदी के अग्रभाग की वैज्ञानिक खुदाई कर पानी को प्राकृतिक नदी तंत्र की ओर प्रवाहित करने की व्यवस्था की मांग की गई।
रूपही-जेरेंगा पथार में नए निर्माण और भूमि श्रेणी परिवर्तन पर रोक की मांग
संयुक्त मंच ने ऐतिहासिक रूपही पथार और जेरेंगा पथार में नए निर्माण तथा भूमि की श्रेणी में परिवर्तन पर रोक लगाने की मांग की है। संगठनों के अनुसार इन क्षेत्रों की प्राकृतिक जलधारण और जलनिकासी क्षमता को संरक्षित रखना आवश्यक है।
रूपहीजान और मिसाजान को महत्वपूर्ण प्राकृतिक जलमार्ग के रूप में मान्यता देकर संरक्षित करने की मांग भी की गई।
मंच ने रूपही बिल और रूपही पथार में जमा पानी को रंगघर के लिए संभावित खतरा बताते हुए मुख्य निकासी मार्ग में टूटे बेजबरुआ कल्वर्ट के स्थान पर पुल बनाने और मानकाटा तीनआली के निकट एटी रोड के छोटे कल्वर्ट को आधुनिक, अधिक चौड़े पुल से बदलने की मांग की।
अतिक्रमण हटाने और आर्द्रभूमियों को बचाने पर जोर
तीनों संगठनों ने प्राकृतिक नालों, पुराने जलमार्गों, नदी किनारों और तटबंधों के आसपास हुए कथित अवैध निर्माण की पहचान कर कानूनसम्मत कार्रवाई की मांग की।
मंच के अनुसार दिखौ, नामदांग और अन्य नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र, छोटी जलधाराओं, आर्द्रभूमियों तथा परंपरागत जलनिकासी मार्गों को अतिक्रमण मुक्त किए बिना स्थायी समाधान हासिल करना कठिन होगा।
जिले के प्राकृतिक बिल, आर्द्रभूमि और जलाशयों को बाढ़ नियंत्रण के महत्वपूर्ण प्राकृतिक साधन बताते हुए इनके संरक्षण और पुनर्जीवन की भी मांग की गई। इन क्षेत्रों में मिट्टी भराव, अवैध कब्जे और अनियोजित निर्माण को रोकने के लिए प्रशासन से स्पष्ट नीति बनाने का आग्रह किया गया।
Remote Sensing और GIS से पुराने नदी मार्गों की मैपिंग का प्रस्ताव
मंच ने दिखौ और उसकी सहायक नदियों के पुराने जलमार्गों यानी Palaeochannels की पहचान के लिए Remote Sensing और GIS तकनीक का उपयोग करने की मांग की।
प्रतिनिधियों का कहना है कि वैज्ञानिक तरीके से पुराने नदी मार्गों का नक्शा तैयार किया जाए और भविष्य में उन पर अतिक्रमण या निर्माण रोकने के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए। इससे प्राकृतिक जलनिकासी व्यवस्था को दीर्घकाल तक संरक्षित रखने में सहायता मिल सकती है।
पूरे रंगपुर क्षेत्र के Comprehensive Hydrological Assessment की मांग
संयुक्त मंच की 10 सूत्री मांगों में सबसे महत्वपूर्ण मांग पूरे रंगपुर और आसपास के क्षेत्र का Comprehensive Hydrological Assessment कराने की है।
इसके तहत प्राकृतिक जलप्रवाह, अवरुद्ध बिंदुओं, कमजोर जलनिकासी संरचनाओं, बाढ़ संभावित इलाकों, नदियों-नालों की वर्तमान वहन क्षमता, आर्द्रभूमियों और पुराने जलमार्गों का वैज्ञानिक एवं तकनीकी अध्ययन कर दीर्घकालिक बाढ़ शमन योजना तैयार करने की मांग की गई है।
संगठनों ने कहा कि जलविज्ञान आधारित योजना, कानूनी जवाबदेही, सतत विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पुनर्जीवन, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और स्थानीय जनभागीदारी उनके आगामी प्रयासों के प्रमुख आधार होंगे।

10 सूत्री मांगपत्र प्रशासन को सौंपा
मंच के अनुसार रूपही और जेरेंगा पथार की जलनिकासी, नामदांग एवं डिमौ नदियों की वैज्ञानिक खुदाई, प्राकृतिक जलमार्गों से अतिक्रमण हटाने, रंगघर-तलातल घर की सुरक्षा, पुराने नदी मार्गों की वैज्ञानिक मैपिंग, आर्द्रभूमियों के संरक्षण और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के स्थायी समाधान सहित 10 सूत्री मांगपत्र जिला आयुक्त के माध्यम से संबंधित प्रशासनिक एवं सरकारी स्तर तक भेजा जा चुका है।
संगठनों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और स्थायी समाधान हासिल करना है। उन्होंने सरकार की रचनात्मक पहल में सहयोग देने की बात भी कही। हालांकि प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि जनहित, पर्यावरण और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा से जुड़ी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं होती है तो स्थानीय लोगों के सहयोग से लोकतांत्रिक आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।
तीनों संगठनों के प्रतिनिधि रहे मौजूद
संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में पाटकाई सभ्यता सुरक्षा समन्वय मंच के संयोजक देबांग सौरभ गोगोई, दीपज्योति गोगोई, उद्दीप ज्योति गोगोई और मनोरंजन फुकन; रंगपुर प्राचीन कीर्ति-चिह्न संरक्षण समिति के सचिव अनुप गोगोई और अध्यक्ष फुलबर दिहिंगिया; रूपही-जेरेंगा सुरक्षा समिति के सचिव मनोरंजन बरगोहाईं, हीरेन दुवरा तथा इतिहासकार जितेन बरपात्रगोहाईं समेत अन्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
तीनों संगठनों ने एक स्वर में कहा कि शिवसागर को भविष्य की बाढ़ से बचाने के साथ ऐतिहासिक रंगपुर, कृषि भूमि, प्राकृतिक जलमार्ग और स्थानीय आजीविका की रक्षा के लिए तात्कालिक उपायों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक, समन्वित और दीर्घकालिक जल-प्रबंधन नीति की आवश्यकता है।




