असम के पारंपरिक वाद्ययंत्र ‘पेपा’ को मिला जीआई टैग, लोकसंस्कृति को मिली वैश्विक पहचान : जीआई टैग से खुलेगा नए बाजारों का रास्ता, युवाओं में बढ़ेगा पारंपरिक कला के प्रति आकर्षण : “यह केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, असम की आत्मा की आवाज़ है” — लोकवाद्य निर्माता द्विजेन गोगोई
बिहू की धुनों से जुड़ा पेपा अब असम की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का राष्ट्रीय प्रतीक बना

शिवसागर, 17 जून : असम की सांस्कृतिक पहचान, बिहू उत्सव की आत्मा और लोकजीवन की मधुर ध्वनि माने जाने वाले पारंपरिक लोकवाद्य ‘असम बिहू पेपा’ को भौगोलिक संकेतक यानी Geographical Indication (GI) टैग प्राप्त होने के बाद पूरे राज्य में हर्ष, गौरव और उत्साह का वातावरण है। यह उपलब्धि केवल एक लोकवाद्य को मिली मान्यता नहीं, बल्कि असम की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक शिल्पकला, सांस्कृतिक अस्मिता और पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी को मिला राष्ट्रीय सम्मान है।
पेपा को मिले इस जीआई टैग को असम की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। बिहू के उत्सवों में गूंजने वाली पेपा की विशिष्ट ध्वनि सदियों से असमिया लोकजीवन, आनंद, उत्साह और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रही है। अब इस वाद्ययंत्र को औपचारिक पहचान मिलने से इसकी मौलिकता, पारंपरिक निर्माण पद्धति और असम से जुड़े सांस्कृतिक संबंध को कानूनी एवं राष्ट्रीय मान्यता मिली है।

लोकवाद्य निर्माता द्विजेन गोगोई ने जताई खुशी
शिवसागर के प्रख्यात लोकवाद्य निर्माता एवं पारंपरिक पेपा शिल्पकार द्विजेन गोगोई ने इस उपलब्धि का स्वागत करते हुए कहा कि पेपा को जीआई टैग मिलना असम की लोकसंस्कृति और पारंपरिक कलाकारों के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन कारीगरों, कलाकारों और संस्कृति साधकों के वर्षों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद इस परंपरा को जीवित रखा।

द्विजेन गोगोई ने कहा कि पेपा केवल एक वाद्ययंत्र नहीं है, यह असम की आत्मा की आवाज़ है। इसकी ध्वनि में बिहू की उमंग, गांवों की मिट्टी, लोकजीवन की सरलता और असमिया समाज की सांस्कृतिक चेतना समाहित है। जीआई टैग मिलने से पेपा की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी।

उन्होंने कहा कि आज के समय में जब आधुनिकता के प्रभाव से कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं, ऐसे में पेपा को मिली यह मान्यता लोकवाद्य निर्माण से जुड़े कारीगरों के लिए नई आशा लेकर आई है।
पारंपरिक तकनीक से पेपा निर्माण की साधना
द्विजेन गोगोई लंबे समय से पारंपरिक पद्धति से पेपा का निर्माण कर रहे हैं। पेपा मुख्य रूप से मोह यानी भैंस के सींग तथा अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया जाता है। इसकी बनावट जितनी सरल दिखाई देती है, निर्माण प्रक्रिया उतनी ही सूक्ष्म, धैर्यपूर्ण और अनुभव आधारित होती है।
पेपा बनाने के लिए उपयुक्त आकार और मजबूती वाले सींग का चयन किया जाता है। इसके बाद उसे साफ कर आकार दिया जाता है और ध्वनि के अनुकूल तैयार किया जाता है। इसमें उपयोग होने वाला नलीनुमा भाग, पकड़ने की संरचना और ध्वनि नियंत्रण की पद्धति पूरी तरह परंपरागत ज्ञान पर आधारित होती है। हर पेपा की ध्वनि अलग-अलग हो सकती है, क्योंकि इसकी गुणवत्ता कारीगर के अनुभव, सामग्री की बनावट और निर्माण कौशल पर निर्भर करती है।
द्विजेन गोगोई जैसे लोकवाद्य निर्माता इस कला को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक साधना मानते हैं। उनका कहना है कि पेपा निर्माण में तकनीकी दक्षता के साथ लोकसंस्कृति की समझ भी आवश्यक है, क्योंकि यह वाद्ययंत्र सीधे बिहू और असमिया सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ा है।

क्या है पेपा और क्यों है इसका महत्व?
पेपा असम के सबसे लोकप्रिय और विशिष्ट लोकवाद्यों में से एक है। इसे मुख्य रूप से रंगाली बिहू, बिहू नृत्य, बिहू गीतों और पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों में बजाया जाता है। ढोल, ताल, गोगोना, टोका और बांसुरी जैसे लोकवाद्यों के साथ पेपा की ध्वनि बिहू की पहचान को पूर्णता प्रदान करती है।
पेपा की आवाज़ तीव्र, ऊर्जावान और उत्सवधर्मी होती है। जैसे ही पेपा की धुन गूंजती है, असमिया समाज में बिहू की स्मृतियां, लोकनृत्य की गति और उत्सव का वातावरण जीवंत हो उठता है। यही कारण है कि पेपा को केवल संगीत वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि असमिया लोकजीवन का सांस्कृतिक प्रतीक माना जाता है।
ग्रामीण असम में पेपा की धुन पीढ़ियों से त्योहारों, मेलों, सांस्कृतिक उत्सवों और लोकनृत्य की परंपरा से जुड़ी रही है। यह वाद्ययंत्र लोककला, लोकसंगीत और सामुदायिक उत्सवों को जोड़ने वाला माध्यम है।

जीआई टैग से पेपा की मौलिकता को मिलेगा संरक्षण
जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति, उसकी विशिष्ट गुणवत्ता, पारंपरिक पहचान और क्षेत्रीय विशेषता की आधिकारिक मान्यता है। जब किसी उत्पाद को जीआई टैग मिलता है, तो यह प्रमाणित होता है कि वह उत्पाद किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र की परंपरा, कौशल और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है।
पेपा को जीआई टैग मिलने से इसकी मौलिकता और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया को संरक्षण मिलेगा। इससे नकली, मशीन निर्मित या गलत ब्रांडिंग वाले उत्पादों पर नियंत्रण संभव होगा। असम में पारंपरिक रूप से निर्मित पेपा को अलग पहचान मिलेगी और असली कारीगरों को उनके श्रम का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग लोकवाद्य निर्माण से जुड़े कारीगरों के लिए आर्थिक सुरक्षा, बाजार विस्तार और पहचान निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

कारीगरों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर
पेपा को मिली जीआई मान्यता से इससे जुड़े कारीगरों, लोक कलाकारों और पारंपरिक शिल्पकारों के लिए नए बाजारों के रास्ते खुलने की उम्मीद है। अब असमिया पेपा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया जा सकेगा।
द्विजेन गोगोई ने कहा कि जीआई टैग मिलने के बाद पेपा की मांग बढ़ने की संभावना है। इससे कारीगरों को बेहतर आय प्राप्त होगी और युवा भी इस पारंपरिक कला से जुड़ने के लिए प्रेरित होंगे। उन्होंने कहा कि यदि सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और बाजार तंत्र मिलकर कार्य करें, तो पेपा निर्माण को एक सशक्त पारंपरिक उद्योग का रूप दिया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रशिक्षण केंद्रों, कार्यशालाओं और सांस्कृतिक मेलों के माध्यम से युवाओं को पेपा निर्माण और वादन दोनों से जोड़ा जाना चाहिए। इससे परंपरा भी बचेगी और रोजगार भी बढ़ेगा।
युवा पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने का अवसर
आधुनिक समय में नई पीढ़ी का झुकाव डिजिटल संगीत और आधुनिक वाद्ययंत्रों की ओर तेजी से बढ़ा है। ऐसे में पेपा को मिला जीआई टैग युवाओं को अपनी जड़ों, लोकसंगीत और पारंपरिक कला से जोड़ने का अवसर प्रदान करेगा।
सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि यदि स्कूलों, कॉलेजों और सांस्कृतिक मंचों पर पेपा के इतिहास, निर्माण और वादन को प्रोत्साहित किया जाए, तो नई पीढ़ी इस विरासत को गर्व के साथ आगे बढ़ा सकती है। पेपा केवल पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि असमिया पहचान का जीवंत प्रतीक है।

बिहू और पेपा का अटूट संबंध
बिहू असम का सबसे लोकप्रिय लोक उत्सव है और पेपा उसकी आत्मा मानी जाती है। रंगाली बिहू के दौरान पेपा की धुन उत्सव की शुरुआत, नृत्य की गति और गीतों की लय को जीवंत करती है। बिहू मंच पर पेपा की उपस्थिति दर्शकों को तुरंत असमिया लोकसंस्कृति से जोड़ देती है।
ढोल की थाप और पेपा की ऊर्जावान ध्वनि मिलकर ऐसा वातावरण बनाती है, जो असम की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि पेपा को असम के सांस्कृतिक प्रतीकों में विशेष स्थान प्राप्त है।
असम की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच
पेपा को जीआई टैग मिलने से असम की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने का अवसर मिलेगा। अब इस लोकवाद्य को सांस्कृतिक पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी, लोककला महोत्सवों और हस्तशिल्प बाजारों में विशेष पहचान के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है।
राज्य के सांस्कृतिक पर्यटन को भी इससे लाभ मिलने की संभावना है। जब पर्यटक असम आते हैं, तो वे बिहू, लोकसंगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक जीवनशैली को समझना चाहते हैं। ऐसे में जीआई टैग प्राप्त पेपा असम की सांस्कृतिक ब्रांडिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
अन्य असमिया उत्पादों को भी मिली जीआई मान्यता
इस वर्ष असम के कई अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी जीआई टैग प्राप्त हुआ है। इनमें कार्बी आंगलोंग के हैंडलूम उत्पाद, असम बांस शिल्प, देउरी समुदाय के हैंडलूम उत्पाद तथा असम बिहू पेपा शामिल हैं।
इन उत्पादों को मिली मान्यता असम की विविध सांस्कृतिक, जनजातीय, हस्तकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे न केवल कारीगरों को लाभ मिलेगा, बल्कि असम की सांस्कृतिक विविधता को भी व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
पहले भी असम के कई उत्पादों को मिला है जीआई टैग
असम की विरासत पहले से ही कई जीआई टैग प्राप्त उत्पादों के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान बना चुकी है। असम के पारंपरिक हस्तशिल्प, बुनाई, लोककला, कृषि उत्पाद और सांस्कृतिक वस्तुएं राज्य की विशिष्ट पहचान को आगे बढ़ा रही हैं। माजुली मुखौटा, असमिया जापी, बिहू ढोल, सार्थेबारी धातु शिल्प, माजुली पांडुलिपि चित्रकला और अन्य उत्पादों को मिली मान्यता ने असम को GI मानचित्र पर मजबूत स्थान दिया है।
पेपा को मिली नई मान्यता इस श्रृंखला को और समृद्ध बनाती है।

नकली उत्पादों पर नियंत्रण और असली कारीगरों को लाभ
जीआई टैग का एक बड़ा लाभ यह है कि इससे उत्पाद की असली पहचान सुरक्षित रहती है। पेपा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के मामले में यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई बार बाजार में मशीन से बने या असम की पारंपरिक शैली से अलग उत्पादों को भी असमिया पेपा के नाम से बेचा जाता है।
अब जीआई टैग के माध्यम से असली पेपा की पहचान, निर्माण क्षेत्र, कारीगरी और गुणवत्ता को स्पष्ट किया जा सकेगा। इससे उपभोक्ताओं को प्रमाणिक उत्पाद मिलेगा और कारीगरों को उनकी कला का उचित मूल्य मिलेगा।
सांस्कृतिक संगठनों ने बताया ऐतिहासिक उपलब्धि
स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने पेपा को मिले जीआई टैग को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि यह मान्यता केवल एक वाद्ययंत्र के लिए नहीं, बल्कि असम के लोकजीवन, बिहू संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के लिए गर्व का विषय है।
सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार और समाज को मिलकर अब इस अवसर का उपयोग पेपा निर्माण, पेपा वादन और लोकवाद्य संरक्षण को बढ़ावा देने में करना चाहिए।
संरक्षण के साथ प्रशिक्षण की भी जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि जीआई टैग मिलने के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी इस परंपरा को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने की है। इसके लिए पेपा निर्माण से जुड़े वरिष्ठ कारीगरों का दस्तावेजीकरण, प्रशिक्षण शिविर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन, बाजार उपलब्धता और सरकारी सहायता आवश्यक है।
यदि पारंपरिक कारीगरों को उचित मंच, वित्तीय सहयोग और विपणन सुविधा मिले, तो पेपा न केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रहेगा, बल्कि रोजगार का सशक्त साधन भी बन सकता है।

द्विजेन गोगोई ने सरकार और समाज से किया आह्वान
द्विजेन गोगोई ने कहा कि जीआई टैग मिलने के बाद अब आवश्यक है कि इस परंपरा को केवल समारोहों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे जीवंत सांस्कृतिक आंदोलन का रूप दिया जाए। उन्होंने कहा कि पेपा बनाने वाले कारीगरों की पहचान, प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और उत्पादों के विपणन के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा, “अगर युवा पीढ़ी पेपा को अपनाएगी, तभी यह परंपरा आने वाले समय में सुरक्षित रहेगी। जीआई टैग ने हमें अवसर दिया है, अब इसे आगे बढ़ाना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।”
असम की आत्मा की आवाज़ को मिला सम्मान
पेपा को मिला जीआई टैग असम की लोकसंस्कृति के लिए गौरवपूर्ण क्षण है। यह मान्यता बताती है कि लोककला केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक शक्ति भी है। पेपा की ध्वनि में असम की मिट्टी, बिहू की ऊर्जा, गांवों की आत्मीयता और लोकजीवन की सहजता समाहित है।
इस उपलब्धि से राज्य की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी तथा आने वाले समय में असम की पारंपरिक कलाओं को विश्व मंच पर नई ऊंचाइयां प्राप्त होंगी।
स्थानीय कलाकारों, कारीगरों और संस्कृति प्रेमियों ने आशा व्यक्त की है कि पेपा को मिली यह मान्यता असम के लोकवाद्यों, शिल्पकारों और पारंपरिक कलाकारों के लिए नई संभावनाओं का द्वार खोलेगी तथा असम की गौरवशाली विरासत को अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।




