एआई के दौर में नए आयाम तलाश रही पत्रकारिता, मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखना जरूरी: पद्मपति शर्मा : असम विश्वविद्यालय में हिंदी पखवाड़े का समारोहपूर्वक समापन—‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय पत्रकारिता’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित : व्यावसायीकरण, टीआरपी की दौड़, सोशल मीडिया और AI के बढ़ते प्रभाव पर व्यापक मंथन—तथ्यपरकता व विश्वसनीयता को बताया पत्रकारिता की सबसे बड़ी जरूरत
आचार्य आनंद शास्त्री ने प्राचीन भारतीय ज्ञान और संवाद परंपरा से जोड़ी पत्रकारिता की जड़ें—समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी पर दिया जोर : राजभाषा प्रकोष्ठ की पत्रिका ‘बराक भारती’ के प्रथम अंक का विमोचन—प्रतियोगिताओं के विजेता सम्मानित, AI पर वाद-विवाद में विद्यार्थियों ने रखे विचार

सिलचर, 28 सितंबर : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, सोशल मीडिया और तेजी से विकसित हो रही डिजिटल तकनीक के दौर में भारतीय पत्रकारिता नए आयाम तलाश रही है। पत्रकारिता के तौर-तरीके और सूचना प्राप्त करने के माध्यम भले ही तेजी से बदल रहे हों, लेकिन तथ्यपरकता, विश्वसनीयता, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं को इसकी बुनियाद बनाए रखना जरूरी है। यह विचार असम विश्वविद्यालय में आयोजित हिंदी पखवाड़ा समापन समारोह एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रमुखता से सामने आया।
असम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं राजभाषा प्रकोष्ठ की ओर से आयोजित हिंदी पखवाड़े का सोमवार को विश्वविद्यालय के प्रमेंद्र मोहन गोस्वामी सभाकक्ष में समारोहपूर्वक समापन हुआ। इस अवसर पर ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय पत्रकारिता’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें हिंदी के महत्व के साथ भारतीय पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, मीडिया के व्यावसायीकरण, टीआरपी की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया के विस्तार तथा एआई के तेजी से बढ़ते प्रभाव और उससे जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई।

वंदे मातरम् और सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के आसन ग्रहण के बाद वंदे मातरम् और सरस्वती वंदना से हुई। इसके बाद राजभाषा प्रकोष्ठ के अधिकारी डॉ. सुरेंद्र उपाध्याय ने स्वागत भाषण देते हुए अतिथियों और प्रतिभागियों का अभिनंदन किया। कार्यक्रम का संचालन एवं अतिथियों का परिचय मिली रानी पाल ने कराया, जबकि समापन अवसर पर प्रीतिराज ग्वाला ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
‘अहिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी पखवाड़े का आयोजन गर्व की बात’
राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति, उसमें आ रहे बदलाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक अहिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी के उन्नयन और उत्थान के लिए हिंदी पखवाड़े का आयोजन होना गर्व की बात है।
उन्होंने कहा कि हिंदी अब केवल भारत तक सीमित भाषा नहीं रह गई है। विदेशों में भी इसकी पहचान और स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है तथा हिंदी वैश्विक भाषा के रूप में अपनी जगह बना रही है।

टीआरपी की दौड़ में पीछे न छूट जाएं मानवीय संवेदनाएं: पद्मपति शर्मा
पद्मपति शर्मा ने मुख्यधारा की पत्रकारिता में बढ़ते व्यावसायीकरण और टीआरपी की प्रतिस्पर्धा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका प्रभाव समाचारों की प्राथमिकताओं पर भी दिखाई देता है। कई बार टीआरपी की होड़ के कारण पत्रकारिता में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूटने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि मुख्यधारा की पत्रकारिता में आए इन बदलावों का लाभ सोशल मीडिया को मिला है और लोगों के लिए सूचना प्राप्त करने के वैकल्पिक माध्यम तेजी से विकसित हुए हैं। हालांकि सोशल मीडिया के सामने विश्वसनीयता, तथ्य-जांच और फेक न्यूज जैसी गंभीर चुनौतियां भी मौजूद हैं।
गूगल के बाद अब अपनी भाषा में AI से सीधे संवाद का दौर
पद्मपति शर्मा ने एआई को पत्रकारिता और सूचना जगत में आए एक नए एवं महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पहले किसी विषय के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए लोग मुख्य रूप से गूगल का सहारा लेते थे, जबकि अब एआई चैटबॉट के जरिए अपनी भाषा में सीधे संवाद कर जानकारी प्राप्त करना संभव हो गया है।
एआई की उपयोगिता से जुड़ा अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनके बेटे ने उन्हें एआई के माध्यम से जानकारी लेने का सुझाव दिया था। इसके बाद उन्होंने एआई से बनारस में अच्छी चाट के बारे में पूछा और एआई ने तत्काल जवाब दिया। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने बताया कि नई तकनीक किस तरह आम लोगों के सूचना प्राप्त करने के तरीके को बदल रही है।

AI की संभावनाएं अपार, लेकिन फर्जी वीडियो और गलत सूचना बड़ी चुनौती
पद्मपति शर्मा ने एआई के संभावित खतरों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि तकनीक जितनी उपयोगी है, उसके इस्तेमाल में उतनी ही सावधानी बरतने की जरूरत है। एआई के माध्यम से फर्जी वीडियो, बदले हुए चेहरे और भ्रामक या गलत सूचनाएं तैयार किए जाने जैसी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के बाद एआई ने पत्रकारिता के सामने एक और नया आयाम खोल दिया है। कृषि, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। पत्रकारिता भी इस तकनीकी परिवर्तन से अछूती नहीं रह सकती।
उनका कहना था कि आने वाले समय में पत्रकारों के लिए नई तकनीक को समझना और उसका उचित इस्तेमाल करना जितना महत्वपूर्ण होगा, उतना ही जरूरी तथ्यों का सत्यापन, तथ्यपरकता और विश्वसनीयता को बनाए रखना भी होगा।

भारतीय पत्रकारिता की परंपरा केवल अंग्रेजों के दौर से नहीं: आचार्य आनंद शास्त्री
संगोष्ठी के विशेष अतिथि आचार्य आनंद शास्त्री ने भारतीय पत्रकारिता की प्राचीन परंपरा और उसके विकास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को केवल अंग्रेजों के शासनकाल में शुरू हुई परंपरा के रूप में देखना उचित नहीं है। भारतीय समाज में समाचार, संवाद और सूचनाओं के आदान-प्रदान की परंपरा प्राचीन काल से मौजूद रही है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत भाषा और प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए पत्रकारिता की ऐतिहासिक जड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने नारद मुनि को भारतीय संदर्भ में संवाद और समाचार परंपरा के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। इसके साथ ही पाणिनि की व्याकरण परंपरा का उल्लेख करते हुए भाषा, संवाद और संचार के विकास को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर देखा।
‘सूचना के साथ समाज को सही दिशा देना भी पत्रकारिता का दायित्व’
आचार्य आनंद शास्त्री ने कहा कि समाचार का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज को सही आचरण और उचित दिशा के बारे में जानकारी देना भी उसका दायित्व है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी और नैतिक दायित्व को समझते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
14 सितंबर से चला हिंदी पखवाड़ा, कई प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन
असम विश्वविद्यालय में 14 सितंबर से हिंदी पखवाड़े की शुरुआत हुई थी। पखवाड़े के दौरान विद्यार्थियों, अधिकारियों और कर्मचारियों की भागीदारी के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इनमें पत्र लेखन प्रतियोगिता, श्रुतिलेख प्रतियोगिता, अंताक्षरी प्रतियोगिता तथा मातृभाषा से संबंधित सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रमुख रहे।
राजभाषा प्रकोष्ठ की ओर से बताया गया कि पहले प्रकोष्ठ की गतिविधियां मुख्य रूप से कर्मचारियों तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब अधिकारियों के साथ विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के छात्रों को भी इन गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। आने वाले समय में इन कार्यक्रमों का दायरा और बढ़ाने की बात कही गई।

‘बराक भारती’ के प्रथम अंक का विमोचन, विजेताओं को मिले पुरस्कार
समापन समारोह का एक प्रमुख आकर्षण राजभाषा प्रकोष्ठ की पत्रिका ‘बराक भारती’ के प्रथम अंक का विमोचन रहा। उपस्थित अतिथियों ने संयुक्त रूप से पत्रिका का विमोचन किया। इसके साथ ही हिंदी पखवाड़े के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया।
AI पर वाद-विवाद में विद्यार्थियों ने रखे लाभ और चुनौतियों के पक्ष
समारोह के दौरान ‘एआई पर वाद-विवाद प्रतियोगिता’ भी आयोजित की गई। इसमें विद्यार्थियों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लाभ, उपयोगिता और संभावित चुनौतियों पर अपने विचार रखे। प्रतियोगिता के माध्यम से नई पीढ़ी और आधुनिक तकनीक के बीच तेजी से बदलते संबंधों पर चर्चा का अवसर मिला और एआई के सकारात्मक एवं चुनौतीपूर्ण दोनों पहलुओं पर विमर्श हुआ।
कुलपति राजीव मोहन पंथ ने की समारोह की अध्यक्षता
समारोह की अध्यक्षता असम विश्वविद्यालय के कुलपति राजीव मोहन पंथ ने की। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ. प्रदोष किरण नाथ, प्रोफेसर अविनाश कुमार और अलफरीद हुसैन सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा पत्रकारिता से जुड़े लोग उपस्थित रहे।
तकनीक बदलेगी पत्रकारिता का स्वरूप, लेकिन तथ्य और संवेदनाएं रहेंगी बुनियाद
हिंदी पखवाड़े के समापन अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक को एक साझा मंच पर लाकर बदलते मीडिया परिदृश्य पर व्यापक विमर्श का अवसर दिया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि एआई और नई तकनीक के प्रभाव से पत्रकारिता के काम करने के तरीके भले ही तेजी से बदल रहे हों, लेकिन तथ्य, विश्वसनीयता, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाएं पत्रकारिता की मूल बुनियाद बनी रहनी चाहिए।




