शिवसागर में आस्था, तप और आत्मसंयम के साथ दशलक्षण महापर्व—21 वर्षीय हर्षित जैन की दस दिवसीय कठिन तपस्या बनी प्रेरणा : लगातार 10 दिनों के उपवास के बाद भव्य पारणा—श्री दिगंबर जैन समाज ने सम्मान पत्र प्रदान कर युवा तपस्वी हर्षित जैन का किया अभिनंदन : ‘उपवास केवल अन्न का त्याग नहीं, क्रोध, अहंकार और नकारात्मक विचारों पर विजय की भी साधना’—हर्षित जैन
अनंत चतुर्दशी पर भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक की विशेष आराधना—कलशाभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजा और संध्या आरती का आयोजन : अहिंसा, जीव दया और शाकाहार का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान

शिवसागर, 26 सितंबर : श्री दिगंबर जैन समाज, शिवसागर की ओर से जैन धर्म का पावन दशलक्षण महापर्व श्रद्धा, तप, त्याग, संयम और भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। पर्व के दौरान प्रतिदिन आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आत्मशुद्धि, आत्मसंयम, क्षमा, त्याग और उच्च नैतिक मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का संदेश दिया जा रहा है। इसी धार्मिक वातावरण के बीच इस वर्ष शिवसागर के 21 वर्षीय युवा हर्षित जैन की लगातार दस दिनों की कठिन उपवास साधना समाज के लिए विशेष प्रेरणा का केंद्र बनी है।

दस दिवसीय तपस्या की पूर्णाहुति, भव्य पारणा के साथ अभिनंदन
दशलक्षण महापर्व के दौरान हर्षित जैन ने लगातार दस दिनों तक उपवास की कठिन साधना की। शनिवार को उनकी दस उपवास की तपस्या की पूर्णाहुति के अवसर पर भव्य पारणा संपन्न हुआ। श्री दिगंबर जैन समाज, शिवसागर की ओर से युवा तपस्वी का अभिनंदन करते हुए उनकी कठिन साधना की भूरि-भूरि अनुमोदना की गई।

आधुनिक जीवन की सुख-सुविधाओं और व्यस्तताओं के बीच 21 वर्षीय हर्षित का लगातार दस दिनों तक उपवास करना समाज में आत्मसंयम, दृढ़ संकल्प और आध्यात्मिक साधना के उदाहरण के रूप में देखा गया। उनकी तपस्या को लेकर परिवार के साथ-साथ जैन समाज में भी श्रद्धा और उत्साह का वातावरण रहा।

‘वास्तविक उपवास अपने भीतर के विकारों के त्याग की साधना’ : हर्षित जैन
अपनी तपस्या का अनुभव साझा करते हुए हर्षित जैन ने कहा कि शुरुआत में बिना अन्न के दस दिन बिताने की कल्पना कठिन लग रही थी, लेकिन प्रभु भक्ति से मिले आत्मबल ने इस साधना को आगे बढ़ाने में शक्ति प्रदान की। धीरे-धीरे भूख-प्यास का अहसास भी गौण होता चला गया।

हर्षित के अनुसार, इस तपस्या ने उन्हें यह अनुभव कराया कि वास्तविक उपवास केवल भोजन का त्याग करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार और नकारात्मक विचारों का त्याग करना भी साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा और तपस्या की सफलता का श्रेय भगवान महावीर की कृपा के साथ अपने पूरे परिवार के अटूट सहयोग और आशीर्वाद को दिया।

परिवार ने की तपस्या की अनुमोदना
हर्षित जैन के पिता माणिक चंद जैन, माता चंद्रकला जैन, चाचा-चाची मनोज जैन एवं उषा जैन तथा पंकज जैन एवं पूजा जैन सहित परिवार के अन्य सदस्यों ने उनकी कठिन साधना की अनुमोदना करते हुए उनके आध्यात्मिक जीवन की निरंतर उन्नति की मंगलकामना की।

परिवार के लिए भी यह अवसर विशेष भावनात्मक और धार्मिक महत्व का रहा। दस दिनों की साधना पूर्ण होने पर परिवार के सदस्यों ने इसे प्रभु कृपा और हर्षित के आत्मसंयम एवं दृढ़ संकल्प का परिणाम बताया।

सम्मान पत्र देकर युवा तपस्वी का अभिनंदन
दशलक्षण महापर्व-2026 के अवसर पर श्री दिगंबर जैन समाज, शिवसागर की ओर से शहर के एटी रोड स्हटेस्टेशन चाराली स्थित मैसर्स नेमचंद माणिकचंद एंड कंपनी परिसर स्थित जैन चेतालय में आयोजित विशेष कार्यक्रम में हर्षित जैन को सम्मान पत्र प्रदान कर उनकी तपस्या का अभिनंदन किया गया। सम्मान पत्र में माणिक चंद जैन एवं चंद्रकला जैन के सुपुत्र हर्षित जैन को श्रद्धा, संयम, नियम और आत्मनियंत्रण के साथ दशलक्षण व्रत सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर हार्दिक बधाई दी गई।

समाज ने उनकी तपस्या को आत्मविजय की दिशा में प्रेरणादायी कदम बताते हुए उनके जीवन में सद्गुण, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का प्रकाश सदैव बना रहने की मंगलकामना की।

‘युवा पीढ़ी के लिए तप, संयम और आत्मानुशासन का प्रेरक संदेश’ : अशोक बाकलीवाल
इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन समाज, शिवसागर के अशोक बाकलीवाल ने हर्षित जैन की दस दिवसीय तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि इतनी कम आयु में कठोर साधना का संकल्प लेकर उसे सफलतापूर्वक पूर्ण करना दृढ़ इच्छाशक्ति और धर्म के प्रति गहरी आस्था का परिचायक है।

उन्होंने कहा, “हर्षित जैन की तपस्या केवल उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धि नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए तप, संयम, त्याग और आत्मानुशासन का प्रेरक संदेश भी है। दशलक्षण पर्व हमें अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह जैसे विकारों पर विजय प्राप्त कर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।”

बाकलीवाल ने कहा कि जैन धर्म में तपस्या का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल बनाने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की साधना है। उन्होंने हर्षित के उज्ज्वल एवं धर्ममय भविष्य की मंगलकामना करते हुए युवाओं से दशलक्षण महापर्व के मूल संदेशों को अपने जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

बड़ी संख्या में समाजबंधुओं और मातृशक्ति की उपस्थिति
इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन समाज, शिवसागर के अशोक बाकलीवाल, धरमचंद जैन, बसंत सरावगी, पीयूष जैन, राजेश जैन, अनिल जैन, नरेंद्र काला, पंकज जैन, बिपिन जैन, अशोक जैन, यश बाकलीवाल और हितेश जैन सहित बड़ी संख्या में समाजबंधु एवं मातृशक्ति उपस्थित रहे।

सभी ने हर्षित जैन की कठिन तपस्या की अनुमोदना करते हुए उनके आध्यात्मिक जीवन की निरंतर उन्नति की मंगलकामना की।

अनंत चतुर्दशी पर भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक की आराधना
दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व है। समाज की ओर से अनंत चतुर्दशी पर्व एवं भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक की अग्रिम शुभकामनाएं देते हुए समाजबंधुओं से धर्माराधना में सहभागी बनने का आह्वान किया गया है।
इस अवसर पर प्रातः श्रीजी का कलशाभिषेक एवं शांतिधारा की जाएगी। इसके बाद नित्य नियम पूजा तथा शाम को आरती का आयोजन होगा। भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में विशेष धर्माराधना भी की जाएगी।

आत्मशुद्धि और आत्मविजय का पर्व है दशलक्षण
दशलक्षण महापर्व सामान्यतः भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इस अवधि में धर्म के दस उत्तम लक्षणों की आराधना करते हुए साधक अपने भीतर के विकारों को दूर करने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
यही कारण है कि इस पर्व में पूजा-अर्चना के साथ तप, त्याग, क्षमा, संयम और आत्मानुशासन का विशेष महत्व रहता है। श्री दिगंबर जैन समाज की ओर से पर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखते हुए आत्मशुद्धि, आत्मनियंत्रण और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की साधना के रूप में अपनाने पर जोर दिया गया।

उत्तम आकिंचन्य का संदेश—‘कुछ भी मेरा नहीं’
दशलक्षण महापर्व के दौरान उत्तम आकिंचन्य धर्म के आध्यात्मिक संदेश को भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया। इसका मूल भाव है—‘कुछ भी मेरा नहीं है।’
यह सिद्धांत मन के भीतर की ममता तथा बाहरी संपत्ति और परिग्रह के प्रति अत्यधिक मोह को त्यागने की प्रेरणा देता है। इसके अनुसार आसक्ति दुःख का कारण बन सकती है, जबकि इच्छाओं और मोह से मुक्त होकर आत्मा की पवित्रता की ओर बढ़ना साधना का प्रमुख उद्देश्य है। इसका संदेश है कि वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर निहित है।

अनंत चतुर्दशी पर ‘शाकाहार दिवस’—अहिंसा और जीव दया का संदेश
दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन की धार्मिक आराधना को एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश से भी जोड़ा गया है। जैन विकास मंडल पिछले कई वर्षों से अनंत चतुर्दशी को ‘शाकाहार दिवस’ (Vegetarian Day) के रूप में मनाता आ रहा है। इस वर्ष भी मंडल के कार्यकर्ता अपने-अपने स्तर पर शाकाहार के प्रचार-प्रसार और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने का प्रयास करेंगे।
शाकाहार प्रचार-प्रसार समिति ने समाज के सभी वर्गों से जीव दया के इस पुनीत अभियान में सहयोग करने की अपील की है। समिति ने लोगों से अपने आसपास के नागरिकों को शाकाहार के प्रति जागरूक करने तथा अहिंसा और जीव दया के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का आग्रह किया है।
श्री दिगंबर जैन समाज के लिए दशलक्षण महापर्व धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला के साथ स्वयं के भीतर झांकने, आत्मा की शुद्धि करने और जीवन में क्षमा, संयम, त्याग, आत्मानुशासन तथा मोह-परिग्रह से मुक्ति जैसे आध्यात्मिक मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर है। इसी भावना के बीच शिवसागर में युवा हर्षित जैन की दस दिनों की कठिन तपस्या ने विशेष प्रेरणा का संचार किया है। उनकी तपस्या की अनुमोदना के साथ समाज ने आत्मशुद्धि, अहिंसा, जीव दया और शाकाहार के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया है।




