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भारत की घटती जन्मदर पर एलन मस्क की चेतावनी से छिड़ी वैश्विक बहस : “जनसंख्या विस्फोट नहीं, अब जनसंख्या गिरावट का खतरा” — भारत की जन्मदर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे, भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता : TFR 2.3 से घटकर 1.9 पर पहुंची, दिल्ली में 1.2; अधिकांश राज्यों में जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे

क्या भारत भी जापान, चीन और दक्षिण कोरिया की राह पर? विशेषज्ञों ने दी चेतावनी—2100 तक आबादी में बड़ी गिरावट संभव

न्यूज डेस्क, 7 जून : दुनिया के सबसे चर्चित उद्योगपति और तकनीकी उद्यमी एलन मस्क की एक टिप्पणी ने भारत समेत पूरी दुनिया में जनसंख्या और आर्थिक भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट, संसाधनों पर बढ़ते दबाव और बढ़ती आबादी की चुनौतियों से जूझने वाले भारत के सामने अब एक बिल्कुल नई तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। ताजा आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि भारत की जन्मदर लगातार घट रही है और देश की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) अब उस स्तर से नीचे पहुंच चुकी है, जिसे किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारत की जन्मदर से जुड़े आंकड़ों पर प्रतिक्रिया देते हुए एलन मस्क ने कहा कि भारत की जन्मदर अब “रिप्लेसमेंट लेवल” से नीचे पहुंच चुकी है और सबसे अधिक शिक्षित वर्गों में यह गिरावट कई वर्ष पहले ही शुरू हो चुकी थी। मस्क लंबे समय से दुनिया में घटती जन्मदर को मानव सभ्यता के सामने उभरते सबसे बड़े खतरों में से एक बताते रहे हैं।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम अनुमानों के अनुसार भारत की आबादी लगभग 146 करोड़ (1.46 अरब) तक पहुंच चुकी है और उसने चीन को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन जनसांख्यिकीय विशेषज्ञों का कहना है कि आबादी का वर्तमान आकार और भविष्य की जन्मदर दो अलग-अलग विषय हैं। आज भले ही भारत की आबादी बढ़ रही हो, लेकिन जन्मदर में लगातार गिरावट आने वाले दशकों में देश की जनसंख्या संरचना को पूरी तरह बदल सकती है।

क्या है रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी ?

जनसंख्या वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश की आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों का जन्म आवश्यक माना जाता है। इसे रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी कहा जाता है।

यदि किसी देश की कुल प्रजनन दर लगातार 2.1 से नीचे बनी रहती है तो समय के साथ वहां युवाओं की संख्या कम होने लगती है, वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ जाता है और अंततः कुल जनसंख्या में गिरावट शुरू हो जाती है।

भारत की कुल प्रजनन दर वर्ष 2014 में लगभग 2.3 थी। वर्ष 2021 में यह घटकर 2.0 पर पहुंच गई और हालिया अनुमानों के अनुसार 2024-25 में यह लगभग 1.9 दर्ज की गई है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार है जब राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे चली गई है।

आंकड़ों में बदलता भारत

पिछले एक दशक के आंकड़े भारत में तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य की कहानी बयां करते हैं—

वर्ष –                 कुल प्रजनन दर (TFR)
1992-93 –                3.4
2005-06                  2.7
2014                        2.3
2021                        2.0
2024-25                  1.9

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार देश के अधिकांश राज्यों ने पहले ही रिप्लेसमेंट लेवल प्राप्त कर लिया है या उससे नीचे पहुंच चुके हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों—केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक—में यह दर काफी समय से 2.1 से नीचे बनी हुई है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों में भी जन्मदर लगातार गिर रही है।

दिल्ली और महानगरों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक

विशेषज्ञों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कुल प्रजनन दर लगभग 1.2 तक पहुंच चुकी है, जो कई विकसित यूरोपीय देशों के बराबर या उससे भी कम है।

मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे जैसे बड़े शहरी केंद्रों में भी जन्मदर तेजी से गिर रही है। कई महानगरों में यह दर 1.5 से 1.7 के बीच आंकी जा रही है।

जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी भारत में परिवारों का आकार तेजी से छोटा हो रहा है और बड़ी संख्या में युवा दंपति केवल एक बच्चा या बिल्कुल बच्चे न रखने का विकल्प चुन रहे हैं।

भारत में क्यों घट रही है जन्मदर ?

विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं—

– महिलाओं की शिक्षा में अभूतपूर्व वृद्धि
– महिलाओं की कार्यक्षेत्र में बढ़ती भागीदारी
– विवाह की बढ़ती औसत आयु
– देर से मातृत्व
– शहरीकरण
– महंगी शिक्षा व्यवस्था
– स्वास्थ्य और पालन-पोषण की बढ़ती लागत
– छोटे परिवार की सामाजिक स्वीकृति
– करियर को प्राथमिकता
– बदलती जीवनशैली
– आवास और जीवन-यापन की बढ़ती लागत

एलन मस्क ने भी अपनी टिप्पणी में शिक्षा को प्रमुख कारणों में से एक बताया। उनका कहना है कि अधिक शिक्षित समाजों में परिवार कम बच्चों को जन्म देते हैं और प्रत्येक बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर अधिक निवेश करना पसंद करते हैं।

क्या भारत भी जापान और चीन की राह पर ?

आज जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इटली, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती घटती जन्मदर और तेजी से बढ़ती वृद्ध आबादी है।

दक्षिण कोरिया की जन्मदर दुनिया में सबसे कम है और कई वर्षों से 1.0 से भी नीचे बनी हुई है। जापान में लाखों घर खाली पड़े हैं और कई गांव लगभग वीरान हो चुके हैं।

चीन में दशकों तक लागू रही “वन चाइल्ड पॉलिसी” के परिणाम अब स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वहां कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घट रही है जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चीन सरकार अब लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की स्थिति अभी चीन और जापान जैसी नहीं है, लेकिन वर्तमान रुझान जारी रहे तो अगले 30 से 40 वर्षों में भारत को भी समान चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की आबादी कब चरम पर पहुंचेगी ?

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत की आबादी आने वाले दशकों में बढ़ती रहेगी और लगभग 2060 के आसपास 1.67 से 1.70 अरब के बीच अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकती है।

इसके बाद आबादी में धीरे-धीरे गिरावट शुरू होने की संभावना है।

कुछ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि यदि भारत की जन्मदर लंबे समय तक 1.9 या उससे नीचे बनी रहती है, तो वर्ष 2100 तक देश की आबादी घटकर लगभग 90 से 100 करोड़ के बीच रह सकती है।

इसका अर्थ होगा कि वर्तमान आबादी की तुलना में लगभग 40 से 50 करोड़ लोगों की कमी दर्ज की जा सकती है।

घटती जन्मदर का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

विशेषज्ञों के अनुसार यदि जन्मदर लगातार कम होती रही तो इसके कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं—

श्रमिकों की कमी –  उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं की संख्या घट सकती है।

वृद्ध आबादी का बढ़ता बोझ – कम कामकाजी आबादी को अधिक बुजुर्गों की देखभाल का आर्थिक भार उठाना पड़ सकता है।

स्वास्थ्य एवं पेंशन पर दबाव – सरकारों को स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अधिक खर्च करना होगा।

आर्थिक विकास की रफ्तार में कमी – कम युवा आबादी उत्पादन, निवेश और उपभोग को प्रभावित कर सकती है।

जनसांख्यिकीय लाभांश का अंत – भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है। यदि युवाओं की संख्या कम होती है तो देश अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का बड़ा हिस्सा खो सकता है।

क्या अभी चिंता करने की जरूरत है ?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तत्काल किसी जनसंख्या संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि देश के पास अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। लगभग 65 प्रतिशत भारतीय आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि जनसंख्या संबंधी बदलाव धीरे-धीरे दिखाई देते हैं, इसलिए नीति-निर्माताओं को अभी से दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी।

रोजगार, कौशल विकास, मातृ स्वास्थ्य, वृद्धजन कल्याण, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन प्रणाली और परिवार नीति जैसे क्षेत्रों में समय रहते सुधार आवश्यक होंगे।

सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी बहस ?

एलन मस्क की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग मत सामने आए हैं।

एक वर्ग का मानना है कि घटती जन्मदर भविष्य के लिए गंभीर खतरा है और भारत को अभी से सतर्क होना चाहिए।

दूसरा वर्ग मानता है कि नियंत्रित और संतुलित जनसंख्या विकास संसाधनों पर दबाव कम करेगा, जीवन स्तर सुधारेगा और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में मदद करेगा।

कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि केवल जनसंख्या संख्या पर ध्यान देने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, उत्पादकता, नवाचार और मानव संसाधन विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।

भविष्य का भारत : अवसर या चुनौती ?

एलन मस्क की टिप्पणी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि की चुनौती से निकलकर जनसंख्या स्थिरता और फिर संभावित जनसंख्या गिरावट के दौर में प्रवेश करने जा रहा है।

आज भारत जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन के दौर में खड़ा दिखाई देता है। आने वाले वर्षों में जन्मदर, रोजगार, शिक्षा और आर्थिक नीतियों के बीच संतुलन ही तय करेगा कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय शक्ति को विकास की ऊर्जा में बदल पाता है या फिर उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाता है जो घटती आबादी और वृद्ध समाज की चुनौती से जूझ रहे हैं।

फिलहाल इतना निश्चित है कि भारत की बदलती जनसंख्या संरचना केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करने वाला एक ऐतिहासिक परिवर्तन है।

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