शिवसागर से तेल निकलेगा, लेकिन असम के युवाओं को रोजगार क्यों नहीं? ओएनजीसी असम एसेट पर स्थानीय विरोधी नीति अपनाने का आरोप : आटासू ने दी बड़े जनआंदोलन की चेतावनी

शिवसागर, 23 मई : असम के शिवसागर में आयोजित ऑल असम ताई आहोम स्टूडेंट्स यूनियन (आटासू) की एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में ओएनजीसी असम एसेट प्रबंधन के खिलाफ तीखा असंतोष सामने आया। संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत गोगोई ने आरोप लगाया कि ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) की नीतियां लगातार असम विरोधी और स्थानीय युवाओं के हितों के खिलाफ होती जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि एक समय ओएनजीसी असम एसेट में 10 हजार से अधिक कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर दो हजार से भी नीचे पहुंच गई है। सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले लगभग एक दशक से नियमित भर्ती प्रक्रिया लगभग बंद पड़ी है। इससे ऊपरी असम के हजारों शिक्षित बेरोजगार युवाओं के सामने भारी संकट उत्पन्न हो गया है। आटासू नेता ने कहा कि ओएनजीसी असम की धरती से तेल और गैस निकालकर अरबों रुपये का राजस्व अर्जित कर रहा है, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के मामले में निगम लगातार पीछे हट रहा है।
प्रेस वार्ता में बसंत गोगोई ने आरोप लगाया कि ओएनजीसी अब स्थायी नियुक्तियों की जगह बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग और निजी एजेंसियों पर निर्भर होता जा रहा है। इससे स्थानीय युवाओं के लिए सरकारी क्षेत्र में स्थायी रोजगार के अवसर लगातार कम हो रहे हैं।
दरअसल ओएनजीसी के कर्मचारी संगठनों ने भी हाल के वर्षों में भर्ती प्रक्रिया फिर से शुरू करने की मांग उठाई थी। ओएनजीसी पूर्वांचल एम्प्लॉईज एसोसिएशन ने भी ओएनजीसी प्रबंधन पर आरोप लगाया था कि हजारों पद खाली होने के बावजूद भर्ती नहीं की जा रही।
कर्मचारी संगठनों के अनुसार वर्ष 2022 में ओएनजीसी असम एसेट, जोरहाट और सिलचर इकाइयों के लिए करीब 300 नियमित पदों को स्वीकृति मिली थी, लेकिन बाद में यह प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली गई।
आटासू अध्यक्ष बसंत गोगोई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे बड़ा सवाल ओएनजीसी के विभिन्न विभागों को धीरे-धीरे देहरादून स्थानांतरित किए जाने को लेकर उठाया। उन्होंने कहा कि देहरादून में ओएनजीसी का एक भी तेल रिग नहीं है, फिर भी असम से लगातार महत्वपूर्ण कार्यालय और प्रशासनिक शाखाएं वहां भेजी जा रही हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि पहले कई तकनीकी और प्रशासनिक विभागों को शिवसागर एवं नाजिरा से बाहर ले जाया गया और अब हाल ही में वित्तीय शाखा को भी देहरादून स्थानांतरित कर दिया गया है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, छोटे व्यवसाय और रोजगार पर सीधा असर पड़ रहा है।
हालांकि ओएनजीसी पूर्व में यह स्पष्ट कर चुका है कि नाजिरा स्थित असम एसेट मुख्यालय को पूरी तरह स्थानांतरित करने की कोई योजना नहीं है। कंपनी ने यह भी कहा था कि परिचालन गतिविधियों की निगरानी के लिए असम में कार्यालय जारी रहेंगे।
आटासू ने आरोप लगाया कि असम के संसाधनों का उपयोग तो यहीं से किया जा रहा है, लेकिन बड़े आर्थिक निर्णय और निविदा प्रक्रियाएं राज्य से बाहर संचालित हो रही हैं। संगठन का कहना है कि शिवसागर जैसे तेल उत्पादक क्षेत्र में महत्वपूर्ण टेंडर प्रक्रियाएं तक स्थानीय स्तर पर नहीं हो रही हैं। ओएनजीसी की आधिकारिक टेंडर प्रणाली में देशभर के विभिन्न केंद्रों से निविदाएं जारी होने की प्रक्रिया दिखाई देती है, जिसे लेकर स्थानीय संगठनों ने पहले भी असंतोष जताया है।
आटासू का कहना है कि यदि प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी निर्णय असम से बाहर होंगे तो स्थानीय व्यापारियों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और युवाओं को अपेक्षित लाभ कभी नहीं मिलेगा। संगठन ने आरोप लगाया कि ओएनजीसी की कथित स्थानीय विरोधी नीतियों के कारण शिवसागर, डिब्रूगढ़, चराईदेव, जोरहाट और तिनसुकिया जैसे जिलों में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। हजारों तकनीकी डिग्रीधारी युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।
आटासू ने कहा कि ओएनजीसी जैसी महारत्न कंपनी की जिम्मेदारी केवल तेल उत्पादन तक सीमित नहीं हो सकती। उसे स्थानीय रोजगार, कौशल विकास और क्षेत्रीय आर्थिक विकास में भी बड़ी भूमिका निभानी चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में आटासू ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि ओएनजीसी ने भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की और असम से विभागों के स्थानांतरण की नीति पर पुनर्विचार नहीं किया, तो संगठन व्यापक जनआंदोलन शुरू करेगा।
संगठन ने कहा कि यह केवल नौकरी का मुद्दा नहीं बल्कि “असम के संसाधनों, अधिकारों और युवाओं के भविष्य” की लड़ाई है। आने वाले दिनों में विभिन्न छात्र संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय जनता को साथ लेकर आंदोलन को तेज किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि ओएनजीसी और स्थानीय संगठनों के बीच रोजगार, भूमि अधिग्रहण और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर पहले भी कई बार टकराव और आंदोलन हो चुके हैं।




