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राजस्थान राज्यसभा चुनाव 2026 : बीजेपी में टिकट की जंग तेज : राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनिया समेत कई बड़े नाम दौड़ में : भाजपा संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच लगातार मंथन का दौर जारी : अनुभवी नेताओं पर दांव लगाए या भविष्य के संगठनात्मक नेतृत्व को आगे बढ़ाए

18 जून के चुनाव से पहले राजस्थान भाजपा में बढ़ी हलचल, जातीय समीकरण और संगठनात्मक संतुलन बने सबसे बड़े फैक्टर

न्यूज डेस्क, 24 मई : राजस्थान में होने वाले राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर भारतीय जनता पार्टी में सियासी हलचल तेज हो गई है। जून में राज्यसभा की तीन सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले भाजपा संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच लगातार मंथन का दौर जारी है। उम्मीदवारों के चयन को लेकर दिल्ली से लेकर जयपुर तक बैठकों, रणनीतिक चर्चाओं और राजनीतिक लॉबिंग ने जोर पकड़ लिया है।

इस बार का चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ राज्यसभा सीट जीतने का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2028 राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन और भविष्य के नेतृत्व को स्थापित करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर जातीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, संगठनात्मक निष्ठा और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद को लेकर गहन चर्चा चल रही है।

राजस्थान विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर भाजपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। हालांकि पार्टी इस बार आक्रामक रणनीति अपनाते हुए तीनों सीटों पर दावा ठोकने की तैयारी में बताई जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा तीसरी सीट पर भी रणनीतिक मुकाबले के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है।

किन सीटों पर होगा चुनाव ?

राजस्थान से जिन राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें भाजपा के राजेंद्र गहलोत और रवनीत सिंह बिट्टू शामिल हैं। पार्टी अब नए चेहरों के जरिए संगठन और समाज दोनों को संतुलित करने की रणनीति पर काम कर रही है।

सूत्रों के अनुसार भाजपा इस बार अनुभवी नेताओं, संगठन से जुड़े चेहरों और सामाजिक समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन कर सकती है।

भाजपा में सबसे ज्यादा चर्चा : राजेंद्र सिंह राठौड़ और सतीश पूनिया

राजस्थान भाजपा में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा दो बड़े नेताओं राजेंद्र सिंह राठौड़ और सतीश पूनिया को लेकर हो रही है। दोनों नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में तेजी से उभरे हैं और पार्टी के भीतर इसे “अनुभव बनाम संगठन” की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है।

राजेंद्र सिंह राठौड़ : अनुभव और राजनीतिक पुनर्वास का बड़ा चेहरा

राजेंद्र सिंह राठौड़ राजस्थान भाजपा के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे सात बार विधायक रह चुके हैं और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं।

2023 विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें कोई बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं मिली, जिसके बाद से उनके राजनीतिक पुनर्वास की चर्चा लगातार जारी है। पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग मानता है कि राठौड़ जैसे अनुभवी नेता को संसद में भेजना भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।

राठौड़ की दावेदारी क्यों मजबूत मानी जा रही?

राजेंद्र राठौड़ की राजपूत समुदाय में मजबूत पकड़ है। साथ ही उन्हें विधानसभा और संगठन दोनों का लंबा अनुभव है। उनकी छवि प्रदेश बीजेपी के एक आक्रामक और रणनीतिक वक्ता की है। राठौड़ के दिल्ली नेतृत्व से मजबूत संपर्क हैं। इसके अलावा उनके साथ भाजपा के पुराने कोर नेतृत्व का भरोसा भी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा “अनुभव और संसदीय आक्रामकता” को प्राथमिकता देती है तो राठौड़ सबसे मजबूत दावेदार बन सकते हैं।

सतीश पूनिया : संगठन और आरएसएस की पसंद?

पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का नाम भी राज्यसभा की दौड़ में तेजी से उभरा है। वर्तमान में वे हरियाणा भाजपा के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

आरएसएस पृष्ठभूमि और वैचारिक राजनीति से जुड़े होने के कारण पूनिया को भाजपा के भविष्य के बड़े नेताओं में गिना जाता है। पार्टी का एक वर्ग मानता है कि उन्हें राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका दी जा सकती है।

पूनिया के पक्ष में बड़े फैक्टर

आरएसएस और संगठन में मजबूत पकड़ के साथ ही जाट समुदाय में उनका प्रभाव। युवा और वैचारिक भाजपा चेहरे की पहचान वाले पूनिया पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के भी करीबी माने जाते हैं। साथ ही उनकी मीडिया और राजनीतिक बहसों में प्रभावी उपस्थिति है।

हालांकि 2023 विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद पूनिया लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जा रही है।

भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल : अनुभव या भविष्य?

राजस्थान भाजपा में इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि पार्टी अनुभवी नेताओं पर दांव लगाएगी या भविष्य के संगठनात्मक नेतृत्व को आगे बढ़ाएगी।

अगर राठौड़ को मौका मिला तो संदेश होगा कि वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करने के साथ ही राजपूत समीकरण साधने की कोशिश को बल मिलेगा। इसके अलावा पार्टी एक अनुभवी संसदीय चेहरा दिल्ली भेजना चाहती है।

अगर पूनिया को टिकट मिला तो संकेत होंगे कि जाट वोट बैंक पर फोकस के साथ ही बिजनेस संगठन आधारित राजनीति को बढ़ावा दे रही है। साथ ही नई पीढ़ी के नेतृत्व को राष्ट्रीय राजनीति में आगे लाना भी बड़ा संदेश साबित हो सकता है।

महिला चेहरे और ओबीसी समीकरण पर भी नजर

भाजपा इस बार महिला उम्मीदवार उतारकर “नारी शक्ति” का बड़ा राजनीतिक संदेश भी दे सकती है। पार्टी महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण की राजनीति को और मजबूत करने के लिए किसी महिला चेहरे पर गंभीरता से विचार कर रही है।

इसके साथ ही ओबीसी और क्षेत्रीय संतुलन भी उम्मीदवार चयन में अहम भूमिका निभा सकते हैं। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार पार्टी सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए चौंकाने वाले नाम भी सामने ला सकती है।

दिल्ली दरबार में बढ़ी हलचल

राजस्थान भाजपा के कई बड़े नेता लगातार दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात कर रहे हैं। टिकट के लिए लॉबिंग का दौर तेज हो चुका है। जातीय प्रभाव, संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक सक्रियता को आधार बनाकर नेता अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।

सूत्रों का कहना है कि अंतिम सूची जारी होने तक कई नए नाम भी अचानक सामने आ सकते हैं। चूंकि बीजेपी सभी को चौंकाने वाले निर्णय लेने के लिए जानी जाती है।

कांग्रेस भी तलाश रही मजबूत चेहरा

उधर कांग्रेस भी अपनी संभावित एक सीट को बचाने के लिए रणनीति बनाने में जुटी हुई है। पार्टी में वर्तमान राज्यसभा सांसद नीरज डांगी, राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा और वरिष्ठ नेता सीपी जोशी जैसे नाम चर्चा में बने हुए हैं। कांग्रेस के भीतर स्थानीय नेतृत्व बनाम हाईकमान की पसंद को लेकर बहस जारी है। जहां एक वर्ग स्थानीय चेहरे को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है, वहीं केंद्रीय नेतृत्व संसद में मजबूत और आक्रामक वक्ता को आगे लाने के पक्ष में माना जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह चुनाव?

राजस्थान का यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ संसदीय चुनाव नहीं बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए भविष्य की राजनीति तय करने वाला माना जा रहा है।

इस चुनाव से तय होगा राजस्थान भाजपा में भविष्य के नेतृत्व के साथ ही पार्टी संगठन बनाम वरिष्ठ नेतृत्व की ताकत में किसको अधिक महत्व दिया जाता है। 2028 के विधानसभा चुनाव की रणनीति के तहत पार्टी की जातीय समीकरणों की साधने की दिशा भी तय होगी।
साथ ही केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएं भी साफ हो जाएगी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार उम्मीदवारों का चयन ही सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश साबित होगा।

चुनाव आयोग द्वारा 18 जून 2026 को मतदान की तारीख घोषित किए जाने के बाद अब राजस्थान की राजनीति और गर्मा गई है। अगले कुछ दिनों में उम्मीदवारों के नामों की आधिकारिक घोषणा के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों में सियासी गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है — क्या भाजपा अनुभव पर भरोसा करेगी या संगठन के नए चेहरों को आगे बढ़ाएगी? आने वाले दिनों में इसी सवाल का जवाब राजस्थान की राजनीति की नई दिशा तय करेगा।

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