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शिवसागर में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल : एक साल में 101 पॉक्सो मामले दर्ज : बाल श्रम और बाल तस्करी के मामलों में भी हुई भारी बढ़ोतरी

डीसीपीओ की चेतावनी : अपराधियों में परिचित, पड़ोसी और रिश्तेदार भी शामिल : बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ की जानकारी देना बेहद जरूरी

शिवसागर, 6 जून : शिवसागर जिले में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों ने प्रशासन, अभिभावकों और समाज के विभिन्न वर्गों की चिंता बढ़ा दी है। जिला बाल संरक्षण इकाई (District Child Protection Unit-DCPU) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बीते एक वर्ष के दौरान जिले में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच जिले में 101 पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences-POCSO) मामले दर्ज किए गए हैं, जो बाल सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक जागरूकता के सामने गंभीर चुनौती के रूप में उभरकर सामने आए हैं।

इसके अलावा बाल श्रम (Child Labour) और बाल तस्करी (Child Trafficking) से जुड़े मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और पारिवारिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

परिचित लोग ही बन रहे हैं बच्चों के लिए खतरा

जिला बाल संरक्षण अधिकारी (डीसीपीओ) डॉ. विकास रंजन कोँवर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के अधिकांश मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं होता। कई मामलों में आरोपी बच्चों के परिचित, पड़ोसी, पारिवारिक मित्र अथवा करीबी रिश्तेदार तक पाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि यही कारण है कि अभिभावकों को केवल बाहरी लोगों से ही नहीं, बल्कि बच्चों के आसपास मौजूद प्रत्येक व्यक्ति और वातावरण के प्रति भी सजग रहने की आवश्यकता है।

डॉ. कोँवर ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि परिवार, विद्यालय, समाज और समुदाय के संयुक्त प्रयासों से ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान संभव है।

‘गुड टच-बैड टच’ की जानकारी देना समय की मांग

डीसीपीओ ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को कम उम्र से ही ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में समझाना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि कौन-सा व्यवहार सामान्य है और कौन-सा व्यवहार अनुचित या खतरनाक हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार, मानसिक स्थिति, दिनचर्या और सामाजिक गतिविधियों पर नियमित रूप से ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा अचानक चुप रहने लगे, भयभीत दिखाई दे, किसी व्यक्ति से मिलने से बचने लगे या उसके व्यवहार में असामान्य परिवर्तन दिखाई दे तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

डॉ. कोँवर के अनुसार समय रहते संवाद और विश्वास का माहौल बनाकर कई गंभीर अपराधों को रोका जा सकता है।

14 वर्षीय किशोरी के कथित यौन उत्पीड़न का मामला बना चर्चा का विषय

इसी बीच जिले में एक नाबालिग किशोरी से जुड़े गंभीर मामले ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटना सामने आने के बाद उसकी माता ने 14 मई 2026 को शिवसागर सदर थाना में शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने शिवसागर सदर थाना कांड संख्या 83/26 दर्ज कर जांच प्रारंभ की। मामले की जानकारी मिलने के बाद जिला बाल संरक्षण विभाग भी सक्रिय हुआ और संबंधित किशोरी का बयान दर्ज कर आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई।

सूत्रों के अनुसार पीड़ित किशोरी को फिलहाल चिकित्सकीय निगरानी और परामर्श सहायता उपलब्ध कराते हुए सुरक्षित वातावरण में रखने के लिए कौमुदालय आश्रय गृह में रखा गया है, जहां उसकी देखभाल और काउंसलिंग की व्यवस्था की गई है।

बाल श्रम और बाल तस्करी भी बड़ी चुनौती

बाल संरक्षण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यौन अपराधों के अलावा बाल श्रम और बाल तस्करी के मामले भी चिंता का विषय बने हुए हैं। आर्थिक कठिनाइयों, जागरूकता की कमी तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण कई बच्चे शोषण और तस्करी के जोखिम में आ जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों पर विशेष निगरानी रखने की आवश्यकता है ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के शोषण से बचाया जा सके।

प्रशासन, परिवार और समाज के संयुक्त प्रयास की जरूरत

बाल संरक्षण अधिकारियों ने कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। विद्यालयों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम, अभिभावकों के लिए परामर्श सत्र, सामुदायिक निगरानी व्यवस्था तथा बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना भी उतना ही जरूरी है।

अधिकारियों ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि किसी बच्चे के साथ शोषण, हिंसा, बाल विवाह, बाल श्रम या तस्करी जैसी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिले तो तुरंत पुलिस, जिला बाल संरक्षण इकाई अथवा चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर सूचना दें।

बढ़ते आंकड़ों ने खड़े किए गंभीर सवाल

एक वर्ष में 101 पॉक्सो मामलों का दर्ज होना इस बात का संकेत है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर समाज और प्रशासन दोनों को अधिक सक्रिय और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जागरूकता, त्वरित शिकायत, पीड़ितों को समय पर सहायता और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई ही ऐसे अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है।

शिवसागर में सामने आए ये आंकड़े केवल एक जिले की तस्वीर नहीं दिखाते, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर पूरे समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करते हैं, जिस पर तत्काल और सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

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