प्रलयंकारी बाढ़ में बहकर नागालैंड से असम पहुंची 53 वर्षीय हथिनी, शिवसागर में सुरक्षित बचाव : दिखौ नदी की तेज धारा ने नामसांग से बहाया, बिहुबर में किनारे लगने के बाद पैदल शिमलुगुड़ी के बालीघाट पहुंची
नाजिरा के पशु चिकित्सकों ने किया स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार : लंबी एवं जोखिमभरी यात्रा के बाद कड़ी निगरानी में रखी गई हथिनी

शिवसागर, 23 जुलाई : ऊपरी असम और पड़ोसी नागालैंड में हाल की विनाशकारी बाढ़ के बीच जीवटता और संवेदनशीलता से जुड़ी एक असाधारण घटना सामने आई है। नागालैंड के नामसांग क्षेत्र से दिखौ नदी की प्रचंड बाढ़ में बह गई 53 वर्षीय पालतू मादा हाथी असम के शिवसागर जिले में सुरक्षित मिली है। तेज जलधारा के साथ लंबी दूरी तय करने के बाद हथिनी बिहुबर क्षेत्र में नदी किनारे आ लगी, जहां से उसका बचाव किया गया। इसके बाद वह स्वयं पैदल चलते हुए शिमलुगुड़ी के बालीघाट पहुंची और फिलहाल वहीं आराम कर रही है।

नामसांग से दिखौ नदी में बह गई थी हथिनी
प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह मादा हाथी पालतू है और उसकी उम्र लगभग 53 वर्ष बताई गई है। हाल की प्रलयंकारी बाढ़ के दौरान नागालैंड के नामसांग क्षेत्र में दिखौ नदी का जलस्तर और प्रवाह अचानक अत्यधिक बढ़ गया। इसी दौरान हथिनी तेज धारा की चपेट में आ गई और बहते हुए असम की सीमा में पहुंच गई। घटना यह दर्शाती है कि बाढ़ का प्रभाव केवल मानवीय बस्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पालतू पशुओं और वन्यजीवों को भी असाधारण संकट का सामना करना पड़ा है।

बिहुबर में किनारे लगी, फिर बालीघाट तक किया पैदल सफर
बाढ़ के पानी में बहने के बाद हथिनी शिवसागर जिले के बिहुबर में किनारे पहुंची। पानी से बाहर निकलने के बाद उसने शिमलुगुड़ी स्थित बालीघाट की ओर पैदल यात्रा की। लंबी दूरी तक नदी के तेज बहाव का सामना करने और फिर पैदल चलने के कारण वह शारीरिक रूप से थकी हुई बताई जा रही है। बालीघाट पहुंचने के बाद उसे सुरक्षित स्थान पर विश्राम कराया गया तथा उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।

नाजिरा से तुरंत पहुंची पशु चिकित्सा टीम
हथिनी की जानकारी मिलते ही नाजिरा पशु चिकित्सालय और मोबाइल पशु चिकित्सा इकाई की टीम घटनास्थल पर पहुंची। चिकित्सकों ने हथिनी की सामान्य शारीरिक स्थिति, थकान तथा बाढ़ के पानी में लंबी अवधि तक रहने से उत्पन्न संभावित स्वास्थ्य समस्याओं का परीक्षण किया और तत्काल आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पशु की स्थिति को लगातार निगरानी में रखा गया है।
डॉ. मृणाल ज्योति बोरा और डॉ. लाचित बोरा ने किया परीक्षण
चिकित्सा एवं प्रतिक्रिया दल में नाजिरा मोबाइल पशु चिकित्सा इकाई के डॉ. मृणाल ज्योति बोरा, डॉ. लाचित बोरा तथा पशु चिकित्सा क्षेत्र सहायक कुमुद सैकिया और अभिलाष सैकिया शामिल थे। टीम ने हथिनी का विस्तृत निरीक्षण कर आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल प्रदान की। बाढ़ के तेज बहाव से गुजरने के कारण पशु में थकावट, निर्जलीकरण अथवा बाहरी चोटों की आशंका को ध्यान में रखते हुए उसकी स्थिति पर विशेष नजर रखी जा रही है।

स्वास्थ्य स्थिति पर रखी जा रही कड़ी नजर
प्रशासन की ओर से जारी जानकारी में हथिनी की स्वास्थ्य स्थिति को चिकित्सकीय निगरानी में बताया गया है। फिलहाल वह बालीघाट में विश्राम कर रही है और पशु चिकित्सा दल उसकी शारीरिक गतिविधि तथा स्वास्थ्य में हो रहे बदलावों का आकलन कर रहा है। चिकित्सकीय परीक्षण के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि उसे कब लंबी यात्रा के लिए सुरक्षित माना जा सकता है।
हथिनी को उसके मूल स्थान या मालिक तक वापस भेजने की आगे की प्रक्रिया के बारे में अभी कोई विस्तृत आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इस संबंध में वन, पशुपालन और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के समन्वय से आगे का निर्णय लिए जाने की संभावना है।
बाढ़ के बीच पशुओं पर भी टूटा संकट
यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब असम के कई जिलों में बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई है। 24 जुलाई को प्रकाशित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, असम में 11 जिलों के 883 गांवों में 7.21 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित थे। शिवसागर सबसे अधिक प्रभावित जिला बताया गया, जहां करीब 3.75 लाख लोग संकट से जूझ रहे थे। राज्य में 103 राहत शिविरों में 24 हजार से अधिक विस्थापित लोग रह रहे थे और 25 हजार हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र जलमग्न था।
ऐसी स्थिति में मवेशियों और अन्य पालतू पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान, चारा, स्वच्छ पानी तथा चिकित्सा उपलब्ध कराना भी राहत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद पशुओं में संक्रमण, त्वचा रोग, चोट और कमजोरी जैसी समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए प्रभावित इलाकों में पशु चिकित्सा टीमों की सक्रियता विशेष महत्व रखती है।

जीवटता की अद्भुत कहानी
तेज बहाव वाली नदी में लंबी दूरी तक बहने के बावजूद 53 वर्षीय हथिनी का सुरक्षित बचना उसकी असाधारण सहनशक्ति को दर्शाता है। बिहुबर में किनारे पहुंचने के बाद बालीघाट तक स्वयं चलकर जाना भी उसके जीवट और प्राकृतिक संघर्ष क्षमता का प्रमाण माना जा रहा है। इस घटना ने स्थानीय लोगों के बीच राहत और आश्चर्य दोनों की भावना पैदा की है।
दूसरी ओर सूचना मिलने के बाद पशु चिकित्सा टीम का शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचना और तत्काल उपचार उपलब्ध कराना प्रशासनिक तत्परता का उदाहरण है। चिकित्सकों और क्षेत्र सहायकों की टीम कठिन बाढ़ परिस्थितियों के बीच हथिनी की देखभाल में जुटी हुई है।

प्रकृति की त्रासदी के बीच उम्मीद का संदेश
नागालैंड से असम तक बाढ़ की लहरों में बहकर पहुंची इस हथिनी की कहानी प्राकृतिक आपदा की भयावहता के साथ जीवन के संघर्ष और बचाव प्रयासों की संवेदनशील तस्वीर भी प्रस्तुत करती है। जहां बाढ़ ने हजारों परिवारों, खेतों, पशुधन और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है, वहीं इस वृद्ध हथिनी का सुरक्षित मिलना राहत भरी खबर बनकर सामने आया है।
अब पशु प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों की निगाह उसके पूर्ण स्वास्थ्य लाभ पर टिकी है। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता उसे पर्याप्त विश्राम, भोजन, पानी और आवश्यक चिकित्सा उपलब्ध कराना है, ताकि बाढ़ की दर्दनाक और थकाऊ यात्रा से उबरकर वह दोबारा सामान्य स्थिति में लौट सके।




