
न्यूज डेस्क, 19 मई : भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर एक पोस्ट के माध्यम से कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने 19 मई 1961 के सिलचर गोलीकांड का हवाला देते हुए दावा किया कि नेहरू जी और कांग्रेस सरकार ने असम को टुकड़ों में बांटने, बांग्लादेशी मुसलमानों को बसाने और चीन युद्ध के समय स्थानीय असमिया लोगों से दूरी बनाने की साजिश रची थी।
दुबे ने अपनी पोस्ट में लिखा, “कांग्रेस का काला अध्याय 64। 19 मई 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी और कांग्रेस शासित असम सरकार द्वारा असम को टुकड़ों में विभाजित करने, बांग्लादेशी मुसलमानों को बसाने और स्थानीय असमिया लोगों तथा चीन युद्ध के बीच दूरी बनाने की साजिश रची गई। 1960 के दशक में भाषा के नाम पर हिंसा न केवल तमिलनाडु में हुई, बल्कि असम में भी हुई।”
सिलचर गोलीकांड : क्या हुआ था 19 मई 1961 को ?
1960 में असम सरकार ने असमिया भाषा को राज्य की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने का कानून पारित किया था, जिसका बराक घाटी (काछार जिले) के बंगाली बहुल इलाकों में भारी विरोध हुआ। बराक घाटी में हिंदू और मुस्लिम दोनों की ही लगभग 80% आबादी बंगाली भाषी थी।
19 मई 1962 को सिलचर रेलवे स्टेशन (तत्कालीन तारापुर) पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह के दौरान असम पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने भीड़ पर गोली चलाई। इस गोलीबारी में 11 बंगाली भाषी लोग शहीद हो गए, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। कई लोग घायल हुए और हजारों अस्पताल में भर्ती कराए गए। शहीदों के नाम हैं: कनाईलाल नियोगी, चंदीचरण सुत्रधार, हितेश बिस्वास, सत्येंद्र देब, कुमुद रंजन दास, सुनील सरकार, तरणी देबनाथ, सचिंद्र चंद्र पाल, बिरेंद्र सुत्रधार, सुकमल पुरकायस्थ और कमला भट्टाचार्य।
इस घटना के बाद बराक घाटी में बंगाली भाषा को जिला स्तर पर आधिकारिक दर्जा मिला। आज भी 19 मई को भाषा शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
दुबे का पूरा आरोप :
दुबे ने आगे कहा कि 1960 में कांग्रेस सरकार ने शिक्षा, लेखन और नौकरियों में असमिया भाषा अनिवार्य कर दी थी। बराक घाटी के लोग नेहरू जी से बार-बार मिलकर अपनी बात रख रहे थे, लेकिन नेहरू अडिग रहे। अंततः सिलचर फायरिंग हुई।
यह पोस्ट कांग्रेस पर लगातार हमलों की कड़ी में आती है। हाल ही में दुबे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत से जुड़े मुद्दे पर भी कांग्रेस को घेरा था।
ऐतिहासिक संदर्भ :
बराक घाटी भाषा आंदोलन (1960-61) : असम सरकार के असमिया भाषा थोपने के खिलाफ बंगाली समुदाय का आंदोलन। इसमें सत्याग्रह, पदयात्रा और हड़ताल शामिल थे। आंदोलन के बाद असम एक्ट में संशोधन कर बराक घाटी (कछार, करीमगंज, हैलाकांडी) में बंगाली को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया।
निशिकांत दुबे की इस पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है। कांग्रेस की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि असम में भाषाई और सांप्रदायिक संवेदनशीलता हमेशा से राजनीति का केंद्र रही है।
यह घटना आज भी बराक घाटी में भावनात्मक मुद्दा बनी हुई है, जहां भाषा शहीदों की याद में प्रतिवर्ष कार्यक्रम आयोजित होते हैं।




