दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रख्यात इतिहासकार पद्मश्री डॉ. जोगेन्द्र नाथ फुकन का शिवसागर में भव्य अभिनंदन : पूर्वांचल ताई साहित्य सभा की पहल पर विशेष सम्मान समारोह आयोजित : जीवनभर की इतिहास साधना और अमूल्य योगदान को किया गया नमन
‘बोधिद्रुम’ अभिनंदन ग्रंथ और विशेष लेख संकलन का हुआ विमोचन, इतिहास-साहित्य जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों की रही गरिमामय उपस्थिति

शिवसागर, 10 जुलाई : दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास, विशेष रूप से ताई-आहोम सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ इतिहासकार एवं पद्मश्री सम्मानित डॉ. जोगेन्द्र नाथ फुकन के सम्मान में शिवसागर में एक भव्य अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया।
पूर्वांचल ताई साहित्य सभा के तत्वावधान में आयोजित यह गरिमामय कार्यक्रम वीर लाचित बरफुकन महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में इतिहास, साहित्य और संस्कृति जगत से जुड़े अनेक विद्वानों, शोधकर्ताओं और गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लेकर डॉ. फुकन के जीवनभर के योगदान को नमन किया।

ताई-आहोम इतिहास और संस्कृति को नई पहचान दिलाने में डॉ. फुकन की अहम भूमिका
कार्यक्रम का आयोजन डॉ. जोगेन्द्र नाथ फुकन द्वारा लंबे समय से किए जा रहे ऐतिहासिक अनुसंधान, साहित्यिक योगदान और समाज को दिए गए अमूल्य योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से किया गया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि डॉ. फुकन ने अपने गहन शोध और लेखन के माध्यम से असम के गौरवशाली इतिहास, ताई-आहोम विरासत और दक्षिण-पूर्व एशियाई सांस्कृतिक संबंधों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वक्ताओं ने उल्लेख किया कि उनके ऐतिहासिक अध्ययन ने न केवल असम के इतिहास को और अधिक समृद्ध बनाया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक तथ्यों, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित रखने का महत्वपूर्ण मार्ग भी प्रशस्त किया है।

‘बोधिद्रुम’ अभिनंदन ग्रंथ एवं विशेष प्रबंध संकलन का विमोचन
इस विशेष अवसर पर पद्मश्री डॉ. जोगेन्द्र नाथ फुकन के जीवन, व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी इतिहास साधना को समर्पित अभिनंदन ग्रंथ ‘बोधिद्रुम’ का विधिवत विमोचन किया गया।
इसके साथ ही एक विशेष प्रबंध संकलन का भी लोकार्पण किया गया, जिसमें इतिहास, साहित्य, संस्कृति और शोध से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। उपस्थित विद्वानों ने इन प्रकाशनों को इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान बताया।
असम की बौद्धिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं डॉ. फुकन — वक्ता
पूर्वांचल ताई साहित्य सभा के अध्यक्ष अतुल फुकन की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने डॉ. फुकन के योगदान को असम की बौद्धिक और सांस्कृतिक संपदा बताया।
उन्होंने कहा कि डॉ. फुकन जैसे विद्वानों ने इतिहास को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज को अपनी जड़ों, संस्कृति और गौरवशाली विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
इतिहास और साहित्य जगत की नामचीन हस्तियों की रही उपस्थिति
इस गरिमामय समारोह में प्रख्यात इतिहासकार डॉ. दयानंद बरगोहांई, डॉ. निरोद बरुआ, डॉ. पुण्यधर गोगोई, डॉ. रमेश बरपात्रगोहांई, जोगेश मोहन, तिलेश्वर मोहन, वीर लाचित बरफुकन महाविद्यालय के प्रिंसिपल डॉ. पंकज ज्योति हजारिका सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति, साहित्यकार, शोधकर्ता और संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।
नई पीढ़ी को इतिहास और संस्कृति संरक्षण से जुड़ने का आह्वान
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि पद्मश्री डॉ. जोगेन्द्र नाथ फुकन का जीवन और कार्य नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उन्होंने युवाओं से इतिहास अध्ययन, शोध कार्यों और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान करते हुए कहा कि अपनी विरासत को जानना और उसे सुरक्षित रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
समारोह का समापन डॉ. फुकन के दीर्घकालीन योगदान के प्रति सम्मान, आभार और असम की ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।




